Saturday, December 19, 2020

अदम गोंडवी जी की स्मृति में

अदम गोंडवी जी की स्मृति में

 आलेख:  
फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता है जहाँ कोई
समझ लेना वो डगर अदम के गाँव जाती है

ब्रजेश कानूनगो

जन कवि अदम गोंडवी को याद करना एक मायने में उस आवाज को याद करने जैसा है जिसके शब्दों में देश के गरीबों, मजदूरों,किसानों और आम लोगों की पीड़ा और उनके कष्टों की गूँज सुनाई देती थी.
वे ऐसे कवि और शायर थे जिनके चले जाने के बाद उस हिन्दुस्तानी जबान का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ऐसा साहित्यकार चला गया , जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े मुश्किलजदा आदमी के संघर्षों की भाषा रही है. कविता की इस भाषा में तो जैसे उनके बाद बहुत बड़ा शून्य सा महसूस होता है.

न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से
कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से

अदब का आईना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

जिंदगी और मौत के बीच अनेक मुश्किलों का सामना और संघर्ष करते हुए हमारे दौर का यह महान जनकवि गत १८ दिसंबर २०११ को अपनी गजलों और कविताओं की पूंजी हमारे लिए छोडकर चला गया. अदम के जाने के बाद उस अलहदा काव्य परम्परा पर भी प्रश्न चिन्ह लगता दिखाई देता है जो दुष्यंत कुमार  के बाद रामनाथसिंह याने अदम गोंडवी ने आगे बढ़ाई थी.

काजू भुने प्लेट में,व्हिस्की गिलास में ,राम राज उतरा है आज विधायक निवास में.
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, यह बात कह रहा हूँ मै होशो हवास में.

अदमजी की समूची शख्शियत अनकी कविता के नायक के जीवन की तरह थी. सादा सा कुर्ता ,मटमैली सी धोती और गले में मफलर ,उन्हें देखकर लगता जैसे कोई किसान सीधे अपने खेतों से चला आ रहा हो. जैसे भीतर वैसे ही बाहर, एक दम रफ टफ से. वे असली धरती पुत्र थे, लेकिन उनकी आवाज देश की आवाज बन गई थी. शायरी की गूँज देश की सीमा लांघकर पूरी दुनिया के कानों तक अपनी तरंगे पहुंचाने में कामयाब हो रही थीं. तमाम शोहरत के बावजूद वे इसका कोई निजी लाभ लेने का मानस कभी नहीं बना पाए. अपने गाँव ,अपनी मिट्टी ,अपने लोगों के मोह से सदा वे बंधे रहे,यही कारण रहा कि कभी वे समझौ़ता परस्ती के शिकार नहीं हुए. शायद यही बात थी जो उन्हें ताकत देती थी और वे बेबाक,दोटूक और सीधे सीधे अपनी खरी-खरी शायरी में अभिव्यक्त कर पाते थे.

वो जिसके हाथ में छाले हैं,पैरों में बिवाई है,उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है.
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का,उधर लाखों में गांधीजी के चेलों की कमाई है.
 
वे उस जमाने के कबीर थे. फक्कड मिजाज अदम अपनी कविताओं में भी खुरदरे दिखाई देते थे. कबीर की तरह वे अनपढ भले ही नहीं थे लेकिन उनकी प्राइमरी तक की  पढाई को आज के संदर्भों में पढ़े-लिखे के पैमाने पर भला कैसे फिट बैठाया जा सकता है. उनकी शायरी में आज की स्थितियों और चालाकियों पर जो टिप्पणियाँ दिखाई देतीं हैं उनसे उनका व्यापक वैचारिक दृष्टिकोण और विचारधारा स्पष्ट होती है. मतभेदों और साम्प्रदायिक विचारों को छोडकर अदम गरीबी के खिलाफ मिलजुलकर लड़ाई लड़ने  का आह्वान करते हैं.

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये .

अदम गोंडवी की कविता में आलोचकों को कविता के व्यंजना धर्म का अनुशासन दिखाई नहीं दिया लेकिन  उन्होने  इस बात की कभी चिंता नहीं पाली. उनकी अभिधा ,व्यंजना पर भारी पडती है.सीधे-सीधे उनकी शायरी धधकते अंगारों की तरह आक्रमण करती है. किसी तरह के  मुगालते  या संकोच का वे अवसर नहीं देते बल्कि जो कुछ कहना होता है सीधे  शब्दों में सुना देते हैं. एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-

सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखेंगे ,
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे.
महज तनख्वाह में निबटेंगे ,क्या नखरे लुगाई के,
हजारों रास्ते हैं सिन्हा साहब की कमाई के
मिसेज सिन्हा के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं,
पिछली बाढ के तोहफे हैं ये कंगन कलाई के.

अंत में एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-

मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की
आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की ?
इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की
याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की

धीमी आंच पर विचारों का परिपाक तैयार करके  गरमागरम परोसने वाले इस कवि की शायरी का विद्रोही तेवर अब हमें दिखाई नहीं दे सकेगा. व्यवस्था फिलहाल भले ही थोड़ी राहत महसूस करे लेकिन कोई आश्चर्य नहीं  होगा जब अदम गोंडवी की कविता की गूँज  प्रतिरोध के नए सुरों का आधार बनकर कविता का कोई नया और सार्थक राग बन जाए.

प्रस्तुति - ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, May 12, 2020

कृषि की ओर लौटेंगे ग्रामीण युवा

उत्तर कोरोना काल में
कृषि की ओर लौटेंगे ग्रामीण युवा
ब्रजेश कानूनगो

पिछले कुछ वर्षों में कृषि भूमि स्वामियों की सबसे विकट समस्या जो आमतौर से उनसे सुनने को मिलती रही है, वह खेती करने में युवा श्रमिकों की कमी होना होती है।
भरपूर मजदूरी देने के उपरांत खेतों में काम करने वाले युवा मजदूर उपलब्ध नहीं होते हैं। ग्रामीण युवकों का कृषि इतर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन इसके पीछे बड़ा कारण माना जा सकता है।

उधर सरकारी नीतियों में युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करने से वे कृषि कार्य के अलावा स्वयं का छोटा मोटा व्यवसाय शुरू कर गांव में दुकान खोलकर बैठ जाते हैं। बाद में न तो उनका व्यवसाय उस तरह सफल हो पाता है जिस तरह अपने पुश्तैनी कार्य से मुक्त होकर फायदे की उम्मीद पाल बैठते हैं। स्वरोजगार योजनाओं के तहत बैंकों को ऋण स्वीकृत करने के अनाप शनाप लक्ष्य आबंटित की वजह से पात्र अपात्र हितग्राहियों के चयन में अक्सर गुणवत्ता प्राथमिकता में नहीं रह पाती। परिणामतः छोटे से गांव में अनेक युवक बैंकों से सरकारी ऋण योजनाओं का लाभ लेकर असफल व्यवसाय का भार ढोते हुए ऋण माफी या किसी समझौता योजना के इंतजार में मजबूर और निष्क्रिय से हो जाते हैं।

ग्रामीण क्षेत्र के श्रमिकों को मनरेगा एवं उसी तरह की अन्य योजनाओं में भी तय दिनों का रोजगार और राशि मिलने से भी ग्रामीण युवाओं की कृषि श्रम में भागीदारी घटती गई है। अनेक अन्य कारण भी होते ही हैं जिनसे ग्रामीण क्षेत्रों के युवकों ने न सिर्फ अपने परंपरागत कृषि कार्य,गांव, प्रदेश तक से पलायन किया है बल्कि खेतों में काम करने की उनकी क्षमता और रुचि में भी चिंताजनक कमी आई है। ऐसा केवल खेती के संदर्भ में ही नहीं हुआ है बल्कि प्रत्येक ग्रामीण कुटीर उद्योग, हस्तकला, चर्म उद्योग,हथकरघा, जूता निर्माण आदि जैसे बुनियादी कामधन्धों पर ग्रामीण युवकों के शहरों और महानगरों की ओर पलायन का बुरा असर पड़ा है। विकास और प्रगति के तथाकथित महान ध्येय के नाम पर इस पर कोई ध्यानाकर्षण टिप्पणी करना या सुधार का मशवरा दिया जाना वर्तमान समय में असंभव तो नहीं मगर जोखिम भरा अवश्य हो जाता है।

कोरोना महामारी के इस असाधारण समय में बिना पूर्व तैयारी के लॉकडाउन जैसे उपायों से प्रभावित श्रमिकों के बड़ी संख्या में अपने गांवों की ओर वापिस लौटने की घटनाएं भी असाधारण ही हैं। आज के हालात में तो तमाम मुश्किलों के बीच उनके मन में बस किसी भी कीमत पर अपने पुश्तैनी घर,गांव लौटना ही नजर आता रहा है। ऐसे में नए कामधंधों की बात सोचना तो बहुत दूर की बात नजर आती है।

अब इस विकट परिस्थिति में राज्य सरकारों की नीतियां क्या रहेंगी इस पर सबकी नजर रहेगी। देखना होगा कि अपने घर प्रदेश लौटने वाले श्रमिकों के लिए कौनसी नई योजनाएं लाई जाती हैं जिससे वे अपनी मातृभूमि में ही रहकर रोजगार के साथ अपने परिवार का जीवन सुखमय बना सकें।

विशेषज्ञ तो यही कह रहे कि कोरोना जनित परिस्थितियों से देश की दशा और अर्थव्यवस्था कई वर्षों पीछे चली जायेगी। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि कोरोना काल के बाद बीती सदी के समय की जीवन शैली के साथ साथ हमारे बुनियादी काम धन्धों की चमक पुनः लौट सकेगी?  प्रश्न यह भी है कि क्या उत्तरकोरोना समय में खेतों, सड़कों,रेल पटरियों, खदानों, वस्त्र निर्माण आदि में मशीनों की बजाए मानवीय श्रम को महत्व मिल सकेगा? शहरों, कस्बों में बंद पड़े कारखानों और कपड़ा मिलों में पिछली सदी की तरह चौबीसों घंटे उत्पादन प्रक्रिया शुरू होगी और क्षेत्र के युवा बेरोजगारों के हुनर को स्थानीय स्तर पर ही मौक़ा मिल सकेगा? जिससे अन्य प्रदेशों में पलायन करने की विवशता उनके समक्ष उपस्थित न हो सके। कारखानों के सायरन की आवाज से आत्मनिर्भरता का उद्घोष हो सकेगा। इन प्रश्नों के उत्तर निश्चित ही अभी आने वाले समय के गर्भ में हैं।

अभी कुछ भी कहा जाना थोड़ा मुश्किल भी है। सबसे पहली चिंता और चुनौती तो इस वैश्विक कोरोना प्रकोप से देश प्रदेश के नागरिकों को स्वस्थ और सुरक्षित रखते हुए जन जीवन को पुनः पटरी पर लाने की ही होगी। फिर भी गाँवों की ओर लौटे हमारे इन भूमिपुत्र भाइयों के कल्याण और अर्थव्यवस्था में पूर्व की तरह उनके योगदान को सुनिश्चित करने के लिए विचार करना तो अभी से शुरू कर दिया जाना चाहिए।

ब्रजेश कानूनगो

क्षेत्रीय अखबारों का दबदबा फिर बढ़ेगा?


आंचलिकता से महकते
क्षेत्रीय अखबारों का दबदबा फिर बढ़ेगा?
ब्रजेश कानूनगो  

वैश्वीकरण और बाजारवाद के आगमन के बाद भारत में जो अनेक  परिवर्तन देखे गए उनमें से एक यह भी था कि जो भाषाई अखबार अपने अंचल के पाठकों के दिलों पर राज करते थे, वे अपने आपको राष्ट्रीय बनाने के चक्कर में विस्तारित तो अवश्य हुए लेकिन अपनी विशिष्ठ देशज सुगन्ध खोते चले गए.

अनेक संस्करणों के साथ पृष्ठों की संख्या भी छह आठ पृष्ठों से बढ़ते हुए पहले 12 हुई फिर कुछ अखबार तो 32 पृष्ठों तक के निकलने लगे. बात यहीं तक नहीं रही. इनके साथ 4 से 8 पृष्ठों तक के सप्लीमेंट्स भी चलन में आएइस सब के पीछे अखबारों को मिलने वाले विज्ञापनों की बहुत बड़ी भूमिका रही है

जो आंचलिक अखबार कभी प्रति कॉपी 15 पैसों का मिल जाया करता था उसकी कीमत 3 से लेकर 5 रुपयों तक पहुंच गई.  कुछ अखबार तो सप्लीमेंट वाले दिन इससे भी अधिक कीमत वसूलने लगे. समाचारों से अधिक अखबारों की दिलचस्पी अधिकाधिक विज्ञापन हासिल करने में रहने लगी. हालांकि इस बीच छपाई की नई टेक्नोलोजी का भी खूब विकास और उपयोग होने लगा लेकिन अखबारों को होने वाली इस अतिरिक्त आय का लाभ अखबार के पाठकों को कभी नहीं मिल सका, बल्कि उनकी पाठकीय सामग्री धीरे धीरे कम होकर उसकी स्पेस सिकुड़ती चली गई.  समाचार,विचार सामग्री और विज्ञापनों की स्पेस का अनुपात गड़बड़ा गया. जो कभी लगभग 60/40 बनाए रखना अपनी जिम्मेदारी मानकर चलते थे व्यावसायिक लाभ की दृष्टि से यह अनुपात थोड़ा गड़बड़ाने भी लगा. सबसे पहले रचनात्मक सामग्री विस्थापित हुई बाद में विचार पक्ष भी घटता चला गया.

विश्वव्यापी कोविद19 महामारी के बीच देश-प्रदेश के शहरों को छोड़कर अपने गांव की तरफ जा रहे मजदूरों के दिल दहला देने वाले कारुणिक पलायन पर पिछले दिनों एक आलेख लिखा और सोशल मीडिया पर लगाया तो एक मित्र ने सुझाव दिया कि यह एक बड़ा अच्छा मुद्दा है और मैं इस लेख को संपादित करके जाने माने बड़े अखबार में प्रेषित कर दूँ. बेशक उन्होंने बड़ी अच्छी सलाह दी थी लेकिन मुझे लगता है कि अब वे दिन गए जब अखबारों में छपे हमारे किसी लेख या विचार का यथोचित संज्ञान लिया जाता है. हालांकि मित्र भी ठीक ही सोच रहे थे कि यदि यह मुद्दा अखबार में छपा तो उन लोगों तक जरूर पहुंचेगा जो नीति निर्धारित करते हैं क़ानून बनाते हैं और वह इस दिशा में कुछ कर सकेंगे, कुछ योजना बना सकेंगे तो बेहतर होगा. निसंदेह यह अक्सर हुआ भी करता था कि हमारे समाचार पत्रों को पढ़कर या उसमें जो विचार लेख के रूप में आते थे, उनसे शासन प्रशासन को थोड़ी मदद मिल ही जाया करती थी. अब समाचार पत्रों के वे दिन नहीं रहे. अब ज़माना सोशल मीडिया का है. सोशल मीडिया की ख़बरें और संदेशों के आधार पर लोगों की भावनाएं और इच्छाएँ सरकारों तक पहुँचने लगी हैं. और यह बड़ा दुखद है कि कई जिम्मेदार लोग अपने वक्तव्यों में सोशल मीडिया की ख़बरों की बिना सत्यता की छानबीन किए मुख्य आधार बना लेते हैं. अब यह अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं रहा कि अब बहुत कुछ समाचार पत्रों में जो छपता है ज्यादातर उसमें वही होता है जो सरकार कर और कह रही होती हैं, इसके अलावा बहुत कम ऐसा होता है जिसमें सरकार को सलाह दी गई हो. कोई अब कहता ही नहीं कि आप यह करें या आपने यह गलत किया है. यह वह दौर है जब कई अखबार वही छापना पसंद करते हैं जो प्रबंधकों को या अखबार को नुकसान न पहुंचाता हो. दूसरे शब्दों में कहें कि अखबारों के जो कंटेंट हैं, विषय वस्तु है, जो विचार हैं उनके अनुसार सरकारें नहीं चला करतीं. उनका कोई उपयोग अपनी योजनाओं में भी शायद ही कभी करती हैं बल्कि अब अखबारों में वह सब छपता है जो प्रशासन और सरकार लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं या लोगों को पढ़वाना चाहती हैं.
जिन राजनीतिक दलों के पास सत्ता  होती है वे अपने पक्ष में अखबार के पाठकों को अपने वोटर के रूप में बदल डालने की युक्ति में लगे दिखाई देते हैं. अब  वे दिन लद गए जब समाचार पत्र की अपनी निषपक्षता हुआ करती थी, अब अपवाद स्वरूप ही ऐसा कहीं भले दिख जाए. समाचार पत्रों की कभी अपनी विशिष्ठ नीति हुआ करती थी, समाज कल्याण के व्यापक उद्देश्य से लोकतंत्र का यह चौथा खंभा अब उस भूमिका में नहीं है.

हिंदी अखबारों की बात करें तो मुझे ऐसा लगता है उत्तर कोरोना काल में निश्चित रूप से उनमें भी बहुत बड़ा परिवर्तन देखा जा सकेगा. आज की परिस्थिति में या आज से पहले इन दिनों से पहले जब अखबारों का विस्तार हुआ,  पृष्ठों की संख्या 30, 32, 36 तक चली गई थी वह पुनः 4 या 6 पृष्ठों में सिमट आये तो कोइ आश्चर्य नहीं होगा. कभी ऐसा क्षेत्रीय भाषाई अखबारों में हुआ करता था, जब मात्र 6 पृष्ठों में हमें इतनी पठनीय सामग्री पढ़ने को मिल जाती थी कि दिनभर की वैचारिक संतुष्टि हो जाती थी. लेकिन बाद में जैसे-जैसे बाजारवाद आया और अखबार धीरे धीरे व्यावसायिक पेम्पलेट में बदलते गए. अखबारों की स्पेस का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन में खपने लगा. हकीकत यह भी थी कि अखबारों के राष्ट्रीय विस्तार और प्रबंधन में जो लागत आ रही होती है उसका खर्च बड़े संस्थानों, घरानों और सरकारों से विज्ञापनों के रूप में होनेवाली कमाई से ही उठाया जा सकता है. इस तरह बड़े बड़े अखबारों में अधिकांश सामग्री विज्ञापनों के रूप में हमारे सामने आती रही हैं या कहें कि जो खबरें आती हैं वह भी एक तरह से किसी चीज का परोक्ष विज्ञापन ही होता रहा है. मार्केटिंग का एक साधन अखबार भी बन गए. इतने बड़े लंबे चौड़े अखबार में पठनीय सामग्री के नाम पर जो कुछ मिलता रहा है उसमें रचनात्मक साहित्य और वैचारिक सामग्री में धीरे-धीरे कमी सी होती गई और जो हिंदी अखबारों में पूरे के पूरे पृष्ठ पर ऐसी सामग्री हुआ करती थी. वह खत्म होते गए या एक चौथाई प्रश्नों में सिमट गए या किसी अन्य संस्करण से कॉपी पेस्ट होने लगे. रचनात्मक व्यक्तियों की आंचलिक भागीदारी सीमित होती गयी.

लेकिन क्या अब उम्मीद की जा सकती है कि जब सब कुछ बदल रहा है, बीता हुआ कल लौट रहा है, आंचलिकता की सुगंध लिए छोटे छोटे अखबारों का दौर फिर लौट आयेगा. आज  थोड़ा मुश्किल जरूर लगता है लेकिन एक सुखद कल्पना तो कर ही सकते हैं. पिछले दिनों हमने अभी हाल ही में देखा कि जो बड़े अखबार हैं धीरे धीरे क्षेत्रीय अखबारों में बदलते रहे हैं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की वजह से भी थोड़ा बहुत उन्हें अपने को बदलना भी पड़ा है. क्योंकि जो खबरें टीवी चैनलों पर चौबीसों घंटे पल-पल की मिलती रहती हैं वे सुबह अखबारों में बासी हो जाती हैं. हर जिले का अलग पेज छापकर वितरित करना अखबारों के आंचलिक अखबारों में बदलते जाने का संकेत ही नहीं यह एक सुखद विवशता भी कही जा सकती है. यहाँ एक बास्केट में सभी अंडे रखने वाली कहावत बड़े अखबारों पर भी लागू होती है. कोई माने या न माने  मगर आंचलिक और छोटे अखबार सच्ची और ईमानदार पत्रकारिता की राह सुनिश्चित करते हैं. यदि ऐसा हुआ तो शायद पाठकों का भला ही होगा.


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर 452018
मो 9893944294


Friday, May 1, 2020

जन्मदिन मुबारक प्रिय 'अधबीच'

21 अप्रैल 2020 विशेष :
जन्मदिन मुबारक प्रिय 'अधबीच' 


वाट्सएप पर चल रहे व्यंग्यकारों के एक समूह पर जब यह सूचना आई कि कल से नईदुनिया का लोकप्रिय दैनिक स्तंभ 'अधबीच' बंद किया जा रहा है तो सभी मित्रों का दिल बैठ सा गया और दिन भर कॉलम को लेकर इसके ऐतिहासिक महत्व और आवश्यकता पर काफी चर्चाएं होती रहीं।
हालांकि यह सूचना एक अप्रैल के दिन आई थी इसलिए थोड़ा असमंजस तो अवश्य था लेकिन विश्वास कर लेने की भरपूर स्मृतियां भी थीं। पूर्व में भी यह स्तंभ कभी स्थगित रहा तो कभी इसका शीर्षक परिवर्तित किया जाता रहा था। कभी 'मध्य' तो कभी 'आठवा सुर' शीर्षक से भी रोचक रचनाएं इसमें प्रकाशित की जाती रहीं। सो अधिकांश लोगों ने विश्वास करके दुख जाहिर किया। और जब पता चला कि यह मात्र 'अप्रैल फूल' की एक चुहल थी तो सबने संतोष की सांस ली।

दरअसल, 21 अप्रैल 1981 के दिन इस लोकप्रिय कॉलम की शुरुआत तत्कालीन संपादक स्व राजेन्द्र माथुर जी की पहल पर हुई थी। इस तरह इस वर्ष 21 अप्रैल को 'अधबीच' कॉलम ने 39 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और चालीसवाँ गौरवशाली वर्ष प्रारम्भ हो रहा है।
जो वरिष्ठ पाठक नईदुनिया को अपने बचपन से पढ़ते आ रहे हैं वे जानते हैं कि नईदुनिया परिवार ने अपने पाठकों को सदैव अपने परिवार का सदस्य माना है। बहुत से तो ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल नईदुनिया पढ़ते हुए ही अपनी भाषा को संवारा और और पाठक से धीरे धीरे एक रचनाकार के रूप में विकसित होते चले गए। इन अर्थों में अपने पाठकों को लेखकों में रूपांतरित करने में नईदुनिया विशेषकर 'संपादक के नाम पत्र' तथा 'अधबीच' स्तंभ की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

यद्यपि 'अधबीच' को मोटेतौर पर व्यंग्य विधा का एक नियमित कॉलम मान लिया गया है लेकिन यह यहीं तक सीमित नहीं है। नईदुनिया में अधबीच प्रकाशन का एक वर्ष पूर्ण होने पर एक धन्यवाद पत्र तत्कालीन प्रधान संपादक स्व. राजेन्द्र माथुर जी ने इसमें सहयोग करने वाले रचनाकारों को लिखा था। 
इस पत्र में अधबीच को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था- 'रोचक प्रसंग,अटपटेआचरण,मानवीय दुर्बलताएँ,खप्त, सामाजिक रूढ़ियों, जंग लगी परम्पराओं, अंधविश्वासों पर लिखे आलेखों का 'अधबीच' में स्वागत है,पैतरा  व्यंग्यात्मक भी हो सकता है या विनोदपूर्ण भी,या हास्य लिए हुए, यदा कदा सीधा सपाट भी हो सकता है। विषय अखबारों में चमकने वाली खबरों ,सुर्खियों से भी लिए जा सकते हैं। कैनवास विशाल है। जरूरत है सजीव रंगों की। अधबीच की रचनाओं में ताजगी हो,लोकोपकार की भावना हो और सबसे जरूरी पठनीयता हो।

निसंदेह 'अधबीच' की परिभाषा के तहत ही इसे पढ़ा जाना चाहिए। यह भी बहुत दिलचस्प बात है कि बहुत से नए पाठक तो 'अधबीच' को एक स्वतंत्र विधा की तरह ही देखने लगे हैं। 
इस लोकप्रिय और रोचक स्तंभ की लंबी उम्र के लिए इसके चालीसवें जन्मदिन पर बहुत सारी शुभकामनाएं।

ब्रजेश कानूनगो