Tuesday, April 24, 2018

निरीक्षण और तैयारी बैठक



निरीक्षण और तैयारी बैठक  

गृहपत्रिका के नए अंक के लिए पर्वतारोही जीएम के जांबाजी अनुभवों को अभिव्यक्त करता एक साहसी लेख लिखने के बाद रात कोई दो बजे आंख लगी थी बकुलेश की।  जीएम बरदलोईजी की आत्मा को अपनी देह में प्रवेश कराके कलम की नोक की सहायता से  कागज की बर्फीली चट्टानों में पैर जमाते हुए कोई तीन हजार शब्दों का पहाड़ चढने के बाद उसने आखिर झंडा गाड़ दिया था। 
झंडा गाड़ने और उठाने में बड़ा फर्क होता है। आमतौर पर झंडा उठाना कार्य के शुभारंभ का द्योतक होता है जबकि झंडा गाड़ देना कार्य की पूर्णता और समापन की घोषणा करता है। बकुलेश की व्यथा यह थी कि झंडा गाड़ देने के बावजूद उसके कार्य का समापन कभी होता नहीं था।
सुबह के दस बजे होंगे फोन की घंटी बजी। हड़बड़ाकर बिस्तर छोड़ा और फोन उठाया। बॉस कृष्णनजी  थे दूसरी ओर.                                        
'
बकुल, आज थोड़ा जल्दी पहुंच जाओ दफ्तर। जीएम का मैसेज आया है, संसदीय समिति का निरीक्षण दौरा होना है। मैं भी पहुंच रहा हूँ। अर्जेंट मीटिंग बुलाई है सीजीएम साहब ने बोर्ड रूम में ठीक ग्यारह बजे।'  कृष्णन जी की आवाज में घबड़ाहट बहुत साफ सुनाई दे रही थी। 
संसदीय समिति के निरीक्षण दौरे के समाचार से ही उच्च प्रबंधन की देह में रक्तचाप के दौरे पड़ने लगते हैं।
‘सुनो, वसुधा आज एकता को स्कूल बस तक तुम छोड़ आना, स्कूटर से मैं जल्दी निकल रहा हूँ, और हाँ लंच बॉक्स मत रखना, मीटिंग में लंच पैकेट आ जायेगे आज. बकुलेश ने पत्नी को सूचना दी और बाथरूम में घुस गया.
प्रधान कार्यालय में नियुक्ति में एक ये बड़ा फ़ायदा रहता है कि महीने में कोई दस बारह शानदार लंच तो कार्यालय के खर्च पर ही हो जाते हैं. बकुलेश के लिए यह संख्या कभी कम नहीं होती. उसका विभाग ही ऐसा है कि मीटिंग भले ही किसी भी विभाग की क्यों न हो, राजभाषा ‘हिन्दी’ का प्रतिनिधित्व होना तो अनिवार्य ही होता है. राजभाषा विभाग का प्रमुख कोई भी रहे लेकिन उच्च प्रबंधक की ओर से सन्देश जाता था कि बकुलेश मीटिंग में अवश्य उपस्थित रहे. केंद्र सरकार के निर्देश हैं और वैधानिक आवश्यकता भी है कि बैठक का कार्यवृत्त हिन्दी में तैयार किया जाए. अंगरेजी में चलने वाली बैठकों को हिन्दी में सुनने की कला बकुलेश ने बड़ी मेहनत से अर्जित कर ली थी. बैठक की कार्यवाई गौर से सुनने, नोट्स लेने और राजभाषा अधिनियम की आवश्यकताओं के अनुसार रिपोर्ट तैयार करने में एक विशेषज्ञ के तौर पर वह अपनी पहचान बनाने में सफल हो गया था.
घर से बैंक के प्रधान कार्यालय का भवन लगभग चार किलोमीटर के फासले पर ही था. पौने ग्यारह बजे बकुलेश बोर्ड रूम में उपस्थित हो गया था. दामोदरजी राउंड टेबल को कपडे से साफ़ करके कुर्सियों के आगे टेबल पर पद नामों की द्विभाषी पट्टियां व्यवस्थित कर रहे थे. बोर्ड रूम की देख भाल इन्ही के जिम्मे थी. बैठक शुरू हो जाने के बाद रूम से लगे चाय घर में ये फिर सदस्यों के लिए चाय-बिस्कुट,पानी आदि के इंतजाम में व्यस्त हो जाते थे. बकुलेश की सीट बैठक की अध्यक्षता करने वाले अधिकारी के ठीक पीछे नियत थी. उसके बगल में अध्यक्ष अधिकारी के निजी सचिव को बैठना होता है. एक तरह से ये दोनों बैठक के आँख कान होते हैं. बैठक के दौरान ये समूची गतिविधि को अपने भीतर खींचते हैं और बाद इन्हें पूरी बैठक की कार्यवाई को बाहर उंढेलना होता है. बुकुलेश अंगरेजी में ग्रहण करता था और हिन्दी में समूची कार्यवाही को कागज़ पर उगल देता था. एक तरह से वह मानवीय भाषा कन्वर्टर था.

ग्यारह बजते ही बोर्ड रूम की सारी कुर्सियां विबिन्न विभाग प्रमुखों से भर गईं थीं. सीजीएम के आने के पहले ही तीन महाप्रबंधकों ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया. बैठक का संयोजन महाप्रबंधक (योजना) ने किया था इसलिए मुख्य महाप्रबंधक याने सीजीएम की अगवानी भी उन्हें करनी थी. वे स्वयं उनके महाकक्ष तक गए उन्हें लिवाने. बैठक की अध्यक्षता सीजेएम को ही करनी थी.
सीजीएम रामदयाल जी ने जैसे ही बोर्ड रूम में प्रवेश किया सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. निजी सचिव ने कुर्सी पीछे खींच कर उन्हें सुविधाजनक रूप से आसंदी ग्रहण करने में सहयोग कर अपना पेशेवर कर्तव्य निभाया.
सीजीएम के चेहरे पर कभी-कभार ही प्रफुल्लता देखने को मिलती थी. बहुत स्नेही और प्यारा स्वभाव होने के बावजूद न जाने ऐसी क्या बात थी कि उनके चेहरे पर हमेशा एक प्रकार की उदासी छाई रहती थी. बकुलेश ने भी सामने पड़ते ही नमस्कार किया तो सीजीएम ने मुस्कुराते हुए स्नेह से अपना हाथ उसके दाहिने कंधे पर रख दिया. बकुलेश अपने दाहिने हाथ से ही सीजीएम के लिए बहुत मेहनत से लेख आदि तैयार किया करता था. कंधे पर धरे सीजीएम के हाथ ने प्रेरणा और प्रोत्साहन की ऐसी  अदृश्य ऊर्जा का संचार हुआ कि बकुलेश का चेहरा किसी महाप्रबंधक की तरह चमक उठा.

‘आई वेलकम...’ महाप्रबंधक (योजना) ने बैठक की कार्यवाई शुरू की. बकुलेश ने हिन्दी में सुनना शुरू किया. थोड़ी देर में ही महाप्रबंधक हिन्दी में बोलने लगे.  ‘राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक में आप सबका स्वागत करता हूँ... गृह मंत्रालय से सूचना आई है कि अगले माह की दस तारीख को  नगर में स्थित बैंक शाखाओं में हिन्दी में होने वाले कामकाज और नियम, अधिनियमों के अनुपालन कार्य के निरीक्षण हेतु एक उच्च संसदीय दल आ रहा है. हमारे बैंक के प्रधान कार्यालय को इसके संयोंजन और व्यवस्थाओं का दायित्व सौंपा गया है. इसी की तैयारी हेतु आज यह महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गयी है....’  यहाँ बकुलेश को कोई ख़ास दिक्कत नहीं हो रही थी क्योंकि जो कुछ महाप्रबंधक महोदय द्वारा कहा जा रहा था वह विषयवस्तु उसी ने कई बार तैयार करके बैठकों हेतु उपलब्ध कराई थी. और आज चूंकि बैठक ही हिन्दी के कार्यान्वयन के सन्दर्भ में हो रही थी तो हिन्दी तो प्रयोग में लानी ही थी.
‘माथुरजी  पॉइंट पर आओ!’ सीजीएम ने भूमिका लम्बी होते देख संयोजक को टोंका.
‘जी,सर!’ जीएम थोड़े खिसिया गए. 

पॉइंट याने मुद्दे की बात ये थी कि संसदीय समिति नगर के कार्यालयों में हिंदी में होने वाले कामकाज से संतुष्ट होकर श्रेष्ठ रिपोर्ट बनाये। चिंता इस बात की भी थी कि इतने सारे प्रयासों के बावजूद कार्यालयीन  कामकाज में हिंदी का प्रयोग लक्ष्य के अनुसार हो नहीं पा रहा था। जबकि हिंदी भाषी क्षेत्रों में सौ प्रतिशत कामकाज राजभाषा में ही किया जाना अपेक्षित है।
वैसे त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट में सारे कार्यालय लक्ष्य प्राप्त कर लेने की सूचना देते है किंतु वस्तुस्थिति इससे बिल्कुल भिन्न होती है। संसदीय समिति से ये सब छुपाना बहुत कठिन होता है। किसी भी हालत में गलत बयानी से संकट की स्थिति बन जाने की पूरी आशंका रहती है। कार्यवाही होने पर कार्यालय प्रधान की नौकरी तक खतरे में  पड़ सकती है। 

'
भाई, जैसे भी हो आप लोग समिति को पूरी तरह संतुष्ट करके विदा करें। सरकार को श्रेष्ठ रिपोर्ट ही जाना चाहिए।' सीजीएम ने लगभग अंतिम आदेश सुनाते हुए कहा।

'
सर, समिति के सदस्यों को यदि हम अच्छे से इन्टरटेंन करें तो वे अच्छी रिपोर्ट दे देते हैं।' मार्केटिंग विभाग के प्रमुख मल्होत्राजी ने थोड़ा संकोच के साथ अपनी बात आगे बढ़ाई 'सर मैं जब पंजाब के एक बैंक में प्रतिनियुक्ति पर था तो संसदीय समिति को निरीक्षण कराने का मौका मुझे मिला था। निरीक्षण बैठक तो अपनी जगह अच्छी ही होती है फिर भी समिति के सदस्यों को हमने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के दर्शन कराए थे। उसके बड़े अच्छे परिणाम आये सर। निरीक्षण रिपोर्ट भी बढ़िया प्रस्तुत की गई।

'
तो देखिए माथुरजी, कुछ इस एंगल से भी सोंचकर देखें आप।' सीजीएम बोले।

'
सर,लेकिन नियमानुसार यह सब नहीं किया जा सकता। होटल में भी उन्हें नही ठहरा सकते,सरकारी गेस्ट हाउस बुक करना पड़ता है। हाँ यदि किसी कारण से वह उपलब्ध न हो तो ही फाइव स्टार होटल में व्यवस्था की जा सकती है।' माथुर साहब ने स्पष्ट किया।

'
सर, अगले माह नगर के सारे सरकारी गेस्ट हाउस बुक हैं। उन्हीं दिनों प्रदेश सरकार 'इन्वेस्टर मीट' आयोजित कर रही है, इसलिए मंत्री गण और सरकारी अधिकारियों के लिए पहले से ही सारे बुक हो चुके हैं।' प्रधान कार्यालय के जनसंपर्क अधिकारी ने नई और हितकारी जानकारी दी।

'
तो फिर माथुरजी, सरकारी अतिथि गृहों की अनुपलब्धता का एक लेटर सक्षम अधिकारी से प्राप्त कर लो। इसके साथ सबसे बढ़िया होटल के कमरे बुक कर लीजिए। बैठक भी वहीं के हॉल में हो जाएगी। सब तरह से यह ठीक होगा।सीजीएम ने समर्थन का ठप्पा लगा दिया। 

'
सर, बैठक के अगले दिन शनिवार है, समिति के माननीय सदस्यों को हम ज्योतिर्लिंग महांकाल बाबा के दर्शन करा सकते हैं। मल्होत्रा जी ने फिर उत्साहित होते हुए सुझाव दिया।

'
सर जो वहां न जाना चाहें उन्हें माँ अहिल्या के किले और पावन नर्मदा घाट दर्शन के लिए महेश्वर भी ले जा सकते हैं। समिति के सदस्य वहां माहेश्वरी साड़ियों के निर्माण का भी जायजा ले सकेंगे।' पीआरओ बोले।

'
हाँ, सर ये बढ़िया रहेगा।' स्टाफ प्रशिक्षण केंद्र की प्रमुख सुश्री कमला जरीवाला बेहद खुश होकर बोल पड़ी।

बैठक में हंसी की एक लहर सी दौड़ गई। लेकिन हमेशा की तरह सीजीएम साहब के चेहरे पर मुरदनगी बनी रही।

आखिर में सबको काम बांट दिए गए। मानव संसाधन प्रभारी के जिम्मे एस्कॉर्ट अधिकारियों की व्यवस्था,  मल्होत्रा जी के जिम्मे ज्योतिर्लिंग दर्शन और सुश्री जरीवाला को महेश्वर के साड़ी बुनकरों से समिति के सदस्यों की मुलाकात करवाने के आदेश हो गए। जनसंपर्क विभाग को अच्छी उत्कृष्ट एसी गाड़ियों की व्यवस्था देखनी थी। निरीक्षण के लिए हिंदी और अंग्रेजी में द्विभाषिक रूप से  प्रस्तुत किये जाने वाले  प्रपत्रों, रिपोर्टों और बैठक आयोजन और समन्वय का भार ग़ैरहिंदी भाषी राजभाषा प्रभारी श्री कृष्णन जी के कंधों पर था, वे भाग्यशाली रहे उनके पास बकुलेश जैसा कर्मठ जिन्न उपलब्ध था । किसी को कोई दिक्कत नहीं थी।  पदोन्नति सूची पर आखिरी हस्ताक्षर सीजीएम साहब के जो होते थे। कैरियर की सबको चिंता रहती है.

आभार प्रदर्शन के साथ बैठक खत्म हुई। दो बज चुके थे। लंच हमेशा की तरह बहुत स्वादिष्ट था।
०००००
                     


Monday, April 23, 2018

हिमालय चढ़ता भूत लेखक


व्यंग्य कथा
हिमालय चढ़ता भूत लेखक
ब्रजेश कानूनगो

बकुलेश आज फिर परेशान हो गया है. जब तब उसे अक्सर ऐसी कष्टदायक स्थितियों से गुजरते रहना पड़ता है. वैसे इन सब से कोई ख़ास दिक्कत भी नहीं है लेकिन एक सामान्य कर्मचारी की भी अपनी खुशियाँ और काम करने की कुछ सीमाएं भी होती हैं. लिखना, अनुवाद करना आदि जैसे काम उसकी नौकरी का हिस्सा हैं. यह सब तो करना ही करना है. गैर हिन्दी भाषी एमडी को हिन्दी में भाषण अनुवाद करके देना जरूर उसकी ड्यूटी में आता है, चेयरमेन के आगमन पर भाषण तैयार करना भी सामान्य काम काज है लेकिन यह तो उसका शोषण ही कहा जाएगा कि जीएम को किसी चौराहे की रोटरी का उदघाटन करना हो तो वहां स्थापित होने वाली प्रतिमा के जीवन चरित्र और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में आलेख तैयार करके उन्हें समय पर हस्तगत किया जाए. तैयारी के लिए इतना अध्ययन तो उसने कभी अपनी पढाई के दौरान भी नहीं किया था. लेकिन आज तो हद ही हो गयी थी.

संस्थान की विभागीय गृह पत्रिका के सम्पादन की जवाबदारी बकुलेश के पास थी. ये अलग बात है कि सम्पादक की जगह नाम उसके बॉस का ही जाता था. सम्पादकीय और वरिष्ठ अधिकारियों के प्रेरक संदेशों के लेखन के साथ-साथ प्रूफ रीडिंग तक का काम बकुलेश को ही करना पड़ता था. अभी थोड़े दिन पहले ही सीजीएम का सन्देश आया था कि पत्रिका में ‘मोर्निग वाक’ के महत्त्व पर एक लेख आना चाहिए. पत्रिका के मुख्य परामर्शदाता का सन्देश बकुलेश के इमिजिएट बॉस ही नहीं बल्कि पूरे संस्थान के लिए किसी प्रशासनिक निर्देश से कम नहीं होता. इस बात को कोई भी नौकरीपेशा जीव भलीभांति समझ सकता है. यह बकुलेश की अपने काम के प्रति निष्ठा और समर्पण ही था कि उसने रातभर जाग कर ‘सुबह की सैर’ निबंध लिखा, जो सीजीएम के रंगीन चित्र के साथ पत्रिका के ठीक मध्य के चिकने पन्नों में प्रकाशित हुआ.

ये तो फिर भी मामूली बात थी. इससे भी बड़कर तो तब हुआ था जब वरिष्ठ महाप्रबंधक अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से सरकारी खर्च पर पारिवारिक छुटियाँ मनाकर लौटे थे और उन्होंने कुछ तस्वीरें भेज कर पत्रिका के सम्पादक जी को निर्देश दिया कि इन्हें भी लगाइए गृहपत्रिका में.
सम्पादक वरिष्ठता में मुख्य प्रबंधक थे, उनके पदौन्नति साक्षात्कार अगले माह ही होने वाले थे. पत्रिका और हिन्दी-विंदी के जबरन माथे पड़े औपचारिक किन्तु वैधानिक काम से मुक्ति भी चाहते थे. एक रास्ता यह भी था कि यातो प्रतिष्ठित और टैक्स फ्री आय वाले ऑडिट विभाग में चले जाएँ, लेकिन इसमें हर पंद्रह दिन महीने में घर से दूर रहना जरूरी हो जाता. पदौन्नति हो जाती है तो सहायक महाप्रबंधक बनते ही किसी क्षेत्रीय कार्यालय में नियंत्रक बन कर सम्मानजनक स्थिति पाने के पूरे चांस थे. इसलिए ‘अंडमान निकोबार यात्रा-वृत्तांत’ उनकी खुशियों का खाता खोलने में सक्षम हो सकता था. यह बकुलेश का दुर्भाग्य ही कहिये कि न तो आजादी के पहले ‘काला पानी’ जेल यात्रा का गौरव उसे या उसके पुरखों को मिला था और न ही आजादी के बाद ‘अंडमान की समुद्री हवाओं’, के स्पर्श का हनीमून सुख का अवसर अब तक पाया था.
बॉस तो फिर बॉस होता है. बॉस का बॉस ईश्वर होता है. बकुलेश को बॉस ने विभाग में पदभार ग्रहण करते ही चमका दिया था- ‘भले ही तुम एमडी के मेसेज लिखते होंगे, लेकिन तुम्हारी सीआर याने गोपनीय चरित्रावली मुझे ही लिखना है’. बकुलेश समझदार था और बॉस की समझाइश को उसने तावीज बनाकर अपनी दाहिनी भुजा में बाँध लिया था. इसी हाथ में कलम पकड़कर बकुलेश कागज़ पर सृजन की गंगा बहा देता था. इसबार उसने गृहपत्रिका के पन्नों पर अंडमान के समुद्र के साथ साथ सेलुलर जेल के ऐतिहासिक गौरव और समुद्र के भीतर के कोरल्स के सौन्दर्य की अद्भुत छटा बिखेर देने में कोई कसर नहीं छोडी थी. यात्रा-वृत्तांत लेख के हर पेरा के बाद महाप्रबंधक और उनके  परिवार का प्रकृति के सौन्दर्य से आत्मरत प्रफुल्लित हरेक चित्र सम्पादक बॉस की आँखों में एक ख़ास तरह की चमक पैदा कर रहा था.  आमतौर पर यह चमक किसी पदौन्नति परीक्षा में सफल हुए अधिकारी की आँखों में दिखाई देती है. लेख ने चमत्कार किया और एक माह बाद पत्रिका के सम्पादक पदौन्नत हो गए. जैसी करनी वैसी भरनी तर्ज पर वे संस्थान के अंडमान क्षेत्रीय कार्यालय के प्रमुख नियुक्त कर दिए गए.

विज्ञान में स्नातक बकुलेश को अभी और हिन्दी सेवा करनी थी, इसलिए न तो प्रमोशन हुआ और नहीं मुक्ति मिली. उसने यथास्थिति में सुख के रास्ते तलाश लिए और हिन्दी में एमए करने के लिए विश्वविद्यालय में प्रायवेट छात्र के रूप में दाखिला ले लिया. इधर विभागीय हिन्दी पत्रिका के सम्पादन के लिए एक दक्षिण भारतीय पदौन्नति आकांक्षी प्रबंधक की नियुक्ति हो गयी. इस बीच बकुलेश की पूछपरख अब विभाग और उच्च प्रबंधन में काफी बड गयी थी. लेकिन परेशानियों का क्या कभी अंत हुआ है...
आज महाप्रबंधक बरदोलाईजी का सन्देश आया है. बकुलेश परेशान है... बरदोलाईजी पर्वातारोहण करके हाल ही में लौटे हैं. बकुलेश को आज रात घर पर हिमालय चढ़ना होगा. पत्रिका का नया अंक कल प्रेस में जाना है. 

ब्रजेश कानूनगो   
      
            


Wednesday, June 21, 2017

नामजद परिहास

नामजद परिहास
व्यंग्य में नेताओं के नामों का उल्लेख

इन दिनों अखबारी व्यंग्य लेखन में एक बात जो विशेष रूप से नजर आती है कि अब राजनेताओं  के नामों का उल्लेख बहुतायत से किया जाने लगा है। केजरीवाल, राहुल, मोदी, ममता, मुलायम   आदि का उल्लेख व्यंग्य रचना में सीधे सीधे होने लगा है।

मेरा मानना है कि यह विधा के सौंदर्य की दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। सड़क के प्रदर्शनोंआंदोलनों में नाम के उल्लेख के साथ जिंदाबादमुर्दाबाद की परंपरा रही है,लेकिन व्यंग्य एक साहित्यिक विधा है और उसकी अपनी गरिमा होती है।

ऐसा नहीं है कि व्यक्तिगत रूप से व्यंग्य नहीं लिखे गए, खूब लिखे गए लेकिन वहां भी इस तरह सीधे सीधे नाम नहीं लिया गया। व्यंग्य में व्यक्ति की प्रवत्ति पर व्यंग्य होना ही चाहिए, हास्य भी होना ठीक है लेकिन नामजद परिहास या मखौल उड़ाए जाने को मैं निजी तौर पर ठीक नहीं मानता।
इन दिनों विशेषकर राजनेताओं के व्यक्तिगत नामों के उल्लेख के साथ उनके मखौल उड़ाते हुए किसी भी लेख को प्रकाशन की लगभग गारंटी की तरह माना जाने लगा है,उसमें भी केजरीवाल और राहुल के नामों को स्टार का दर्जा प्राप्त हैं।

हो तो यह भी रहा है कि यदि लेख की प्रकृति गैर राजनीतिक होती है फिर भी किसी तरह इन नामों को घुसेड़ देने के प्रयास दिखाई दे जाते हैं,जबकि विषय वस्तु से उसका कोई ताल मेल ही नहीं होता।
शरद जोशी जी सहित सभी श्रेष्ठ व्यंग्यकारों ने राजनेताओं को लेकर तीखे व्यंग्य लिखे हैं मगर वहां भी व्यक्ति नहीं बल्कि प्रवत्ति पर निशाना लगाया गया। और वे सहज रूप से है- परिहास के साथ विसंगति और अटपटे आचरण पर कटाक्ष की तरह आते थे। मखौल की तरह तो कदापि नहीं। व्यंग्य को नामजद गालियों की दिशा में जाते देख दुःख होता है। बाकी तो जो है सो है ही।

ब्रजेश कानूनगो


आलोचना में हिंदी शब्दों की खोज

आलोचना में हिंदी शब्दों की खोज 
ब्रजेश कानूनगो

एक साहित्यिक वाट्सएप समूह पर युवा कथाकार की कहानी पर सदस्यों की टिप्पणियां पढ़ते हुए एक सामान्य जिज्ञासा और प्रश्न सामने आया ।
'
क्या आलोचना में हिंदी शब्द स्वाभाविक रूप से अभी भी प्रयुक्त किये जाने से अपेक्षित प्रभाव नही छोड़ पाते ?'

मुझे कहानी पर अपनी बात कहते हुए अधिक ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल हिंदी में करना पड़ा, जबकि आगे साथियों ने अंग्रेजी के कुछ शब्दों के प्रयोग से बात को बहुत सहजता से संक्षिप्त में स्पष्ट कर दिया। कुछ बहुत प्रभावी शब्दों ने मुझे समृद्ध भी किया।

डीटेलिंग,अंडरटोन,क्राफ्टिंग,ट्रीटमेंट  आदि जैसे बहुत से  अंग्रेजी के शब्द आलोचना में बहुत प्रयोग में आते हैं। साहित्य ही नहीं अन्य कला समीक्षाओं में भी  अंग्रेजी शब्दावली का खूब प्रयोग हो रहा है और समझ के स्तर पर ये अधिक ग्राह्य भी हो रहे हैं। इनका विरोध नहीं है, बस इतनी ही ताकत के हिंदी पर्याय की खोज और प्रयोग की चिंता स्वाभाविक  है।

अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी भाषा की ख़ासियत ही यह है कि यह आम प्रचलित शब्दों का समावेश करते हुए विकसित हुई है।  चाहे वह उर्दू हो, अवधी या ब्रजभाषा हो या फ़ारसी और अन्य विदेशी भाषाओं से आये शब्द हों। कई वर्षों तक हिंदी अधिकारी की तरह कार्य  करते हुए मैंने स्वयं भी 'प्रयोजन मूलक हिंदी' को बढ़ावा देते हुए अक्सर ऐसे बचावी तर्क दिए हैं। सच तो यह भी है कि अनुवाद और अंग्रेजी का सहारा लेकर चलने से संभवतः हमने हिंदी को नुकसान ही पहुंचाया है।

बेशक़ अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल पर सवाल उठाया जा सकता है, स्वीकार और नकार पर बहस हो सकती है, होती भी रही है। पिछली कई  सदियों के  औपनिवेशवाद ने हिंदी पर अपना असर तो छोड़ा ही है कि अनेक दूसरी भाषाओं के  शब्द रोजमर्रा की भाषा में घुलमिल गए है। फिर भी भाषाई शुचिता के अंतर्गत सवाल उठना भी बेहद लाज़िमी है।
भाषाई शुचिता और शुद्धता और आग्रह जो अकसर दुराग्रह की सीमा तक पहुंच जाता है, खतरनाक भी हो जाता है। कभी कभी लगता है इसलिए ये जो घालमेल, मेल मिलाप फिलहाल ज्यादा हितकारी होगा। लेकिन क्या यहां रुक जाना चाहिए?

अगर रोजमर्रा की हिंदी में आलोचना में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी शब्दों की तरह हिंदी के शब्द प्रयुक्त होते रहते तो वे भी उतनी ही सहजता से आते जितनी आसानी से ये डिटेलिंग या क्राफ्ट, अंडरटोन, ट्रीटमेंट आदि आ जाते हैं।

भले ही दूसरी भाषा का अधिक समर्थ शब्द आकर्षित करता हो, हिंदी में हमें अपनी खोज और प्रयोग लगातार जारी रखना चाहिए। हमारा थोड़े से प्रयास काम को आगे बढ़ा सकते हैं।क्राफ्ट के लिए 'बुनावट' का प्रयोग भी होता है और वह ठीक और प्रभावी भी है। ट्रीटमेंट के लिए 'निर्वाह', विषय वस्तु का निर्वाह। भाव भी शब्दों के अधिकाधिक प्रयोग से प्रबल होने लगते हैं।अनुवाद की बजाए शायद स्वतंत्र शब्द सत्ता की खोज जरूरी है। और फिर सम्पूर्ण कथ्य और वाक्य विन्यास के बाद ही शब्दों के अर्थ भी व्यापकता में खुलते जाते हैं।

यह विडंबना है कि 'फिजिकली चेलेंज पर्सन के लिए अभी तक हम कोई उचित संतोषजनक शब्द अब तक खोज नही पाए हैं।विकलांग- अपमान जनक हो जाता है और दिव्यांग- ईश्वरीय।

आलोचना में अंग्रेजी के खूबसूरत और सटीक शब्दों के इस्तेमाल का विरोध नहीं है, बस इतने ही सटीक हिंदी पर्याय की खोज और प्रयोग की चिंता है। इस ताकत को आलोचना की हिंदी शब्दावली में भी आना चाहिए। यदि हम कुछ कर सकते हैं तो जरूर किया जाना चाहिए। क्या कहते हैं आप!!

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क, कनाड़िया रोड, इंदौर- 452018




Sunday, May 21, 2017

रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

पुस्तक समीक्षा
रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

रजनी रमण शर्मा

गुजरे समाजों की तुलना में आज का हमारा समाज, बल्कि पूरी दुनिया में जो ग्लोबल समाज विद्यमान है, वह बहुत नया है,यों कहें कि हर दिन वह और भी नया होता जा रहा है. मेरा मानना है कि इस समाज के विराट हिस्से में न थमने वाला कोलाहल है, अकुलाहट है, हलचल है, पर इन हलचलों में कहीं एक ठहराव भी नजर आता है. इस शीतल ठहराव में कवि,कथाकार,व्यंग्यकार, ब्रजेश कानूनगो की छोटी-बड़ी कहानियों की किताब ‘रिंगटोन’, अपने चारों ओर बिखरे परिद्रश्य को पूरी क्षमता के साथ स्थापित करती है.
‘रिंगटोंन’ संग्रह में कुल पच्चीस कहानियां हैं. संकलन की अपेक्षाकृत बड़ी कहानियां भी दो-ढाई मुद्रित पृष्ठों से अधिक लम्बी नहीं हैं. यह यह संतोषजनक और आज के पाठक की प्रवत्ति के अनुकूल है.

वर्त्तमान समय की पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति और समाज के बीच के अंतर्विरोधों के बीच से उत्पन्न व्यक्तित्व विघटन की समस्या ‘रिंगटोन’, ‘जन्मदिन’, तथा ‘मोस्किटो बाइट’ जैसी कहानियों में पूरी शिद्दत के साथ सामने आती हैं. अलग हटकर ‘जन्मदिन’ को एन्जॉय करने धनपति सेठ अनाथालय में टी-शर्ट और महंगी टाफियाँ का वितरण करते हैं. बेटे का जन्मदिन जो है. दूसरी ओर शिवकुमार जो अनाथालय का प्रतिभाशाली विद्यार्थी है, अपने दसवें जन्म दिन के लिए हवेली में मनने वाले जन्म दिन का सपना भर देखने को अभिशप्त है. ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे शक्ति दें ताकि मेहनत करके जीवन में आगे बढ़ सके.

शीर्षक कहानी ‘रिंगटोन’ लेंडलाइन टेलीफोन से स्मार्ट फोन तक के समय और संवेग को कथा माध्यम से उजागर करने का काम बखूबी किया गया है. आधुनिकीकरण और विकास के साथ नई समस्याएँ भी आती हैं तो साहित्य में भी उनका आना लाजिमी है. इसी तरह ‘माँस्किटो बाइट’ में बेटा सोफ्टवेयर इंजीनियर है, बहू मल्टीनेशनल में वित्तीय सलाहकार, पोता साहित्यकार मधुकर जी के पास. बहू विमेन हॉस्टल में और पुत्र अमरीका में. एक दिन दादा को बेटे का फोन आता है कि वे अपने पोते रूपम को होस्टल में डाल दें क्योंकि घर पर रहकर उसे हिन्दी की आदत पड़ जायेगी तो बाद में उसके कैरियर में बाधक होगी. यहाँ सवाल हिन्दी का नहीं है. अपनी भाषा से दूर हो जाना अपनी संस्कृति से दूर हो जाना है. संस्कृति विहीन समाज का निर्माण करना ही बाजार का उद्देश्य है. भाषा नहीं तो समाज नहीं. सचेत होना होगा.
भाषा के बाद सवाल आता है ‘सभ्यता’ का. यह वह दौर है जब पहले से चली आ रही परम्पराओं, मान्यताओं, व्यवस्थाओं और व्यवहार आदि को नकारने और परिवर्तित भी किया जा रहा है. ‘सभ्यता’ कहानी में मम्मी-पापा के अनपेक्षित आदेश से ताऊ जी के चरण छूने वाली छोटी बच्ची पारुल अपनी पीठ थपथपाने पर बेधडक कहती है-‘लड़कियों की पीठ पर हाथ नहीं रखना चाहिए, बेड मैनर्स ताऊजी!’ सोच के इस समय में वास्तविकताएं तो चालाकियों के आवरण में कहीं दुबक ही जाती हैं. संग्रह की कहानियां ‘विश्वास’,’रोशनी के पंख’,’पिछली खिड़की’, इसकी गवाही देती हैं. बाल श्रमिक नंदू की ‘तस्वीर’ मंत्री को चाय का गिलास थमाते हुए अखबार में छप जाती है, किन्तु दूसरे ही दिन बाल श्रम क़ानून के भय के कारण मालिक उसे दूकान से निकाल देता है.

संग्रह की कई कहानियों में अपनी जड़ों, शहर,बस्ती और अपने परिवेश से दूर होने और अलगाव के दुखों और अतीत की स्मृतियों की अभिव्यक्ति बहुत मार्मिक और उद्वेलित कर देने वाले तरीके से हुई है. ‘संगीत सभा’,’घूँसा’,’भिन्डी का भाव’ आदि ये ऐसी ही कुछ ख़ूबसूरत कहानियां हैं. ये कहानियां माध्यम वर्ग की आडम्बर युक्त सामाजिक संरचना के विरुद्ध सवाल भी उठाने का प्रयास करती हैं. कहानियों में तकलीफों और असामंजस्य की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई है.
‘ज्वार भाटा’,’उजाले की ओर’, प्रेअरानास्पद हैं लेकिन ‘समाधि’ और ‘केकड़ा’ कहानियां पाठकों को झकझोर देती हैं.

संग्रह की कहानी ‘रंग-बेरंग’ को रेखांकित किया जाना बहुत जरूरी है. कसारिया और हरे रंग के कपडे का थान खरीदकर उनकी झंडियाँ बनाने वाला बूढ़ा दरजी अपने पोते के लिए दो मीटर सफ़ेद कपड़ा कफ़न के लिए खरीदता है,जो दंगों की चपेट में आ गया है. यह कहानी हमें बैचैन कर देती है.जब तक सामने रहती है राहत की सांस नहीं लेने देती. मन और शरीर रोष और तनाव से भर उठते हैं.

कथाकार ब्रजेश कानूनगो के पात्र वास्तविक जीवन के द्वंद्व,,असंतोष,असहमति,और नकार से उबलते, खीजते,छटपटाते हुए हैं. नए कथ्य, नए जीवनानुभाव, निजी अनुभूतियों, परिवेश और भौगोलिक गंधों की ईमानदार प्रस्तुतियां हैं ‘रिंगटोन’ की छोटी-बड़ी कहानियां. इनमें क्रोध कम है लेकिन शिल्प और कहने का बेहद कारगर तरीका है, जो सीधे कथ्य को दिलो-दिमाग तक पहुँचाने में सफल हो जाता है. ‘रिंगटोन’ संग्रह की कहानियों में सामाजिक विसंगतियों के विरोध में एक प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) भी है. ब्रजेश भावुकता का सहारा नहीं लेते,विवेक और तर्क उनकी कहानियों में मौजूद दिखाई देते है. एक सजग कथाकार के रूप में हमारे सामने एक ऐसे संग्रह के जरिये आते हैं ,जिनमें रिश्तों की ऊष्मा,भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से हमारा साक्षात्कार होता है.

(पुस्तक- रिंगटोन (छोटी-बड़ी कहानियां) ,लेखक- ब्रजेश कानूनगो, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, बाईस गोदाम,जयपुर-302006. मूल्य-रु 100 मात्र)

रजनी रमण शर्मा
42, मिश्र नगर, इंदौर-452009
मो 9826390787   

   





Monday, April 10, 2017

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स 


1

अंधेरों के खिलाफ कवि  

अन्धकार है तो कहीं न कहीं जरूर रात घिर आई होती है। अन्धेरा क्या सचमुच इतना बुरा है? उजाले क्या हमेशा अच्छे ही होते हैं।अँधेरे के भी कुछ उजले पक्ष होते हैं,तो उजाला भी कई अंधेरों को लेकर आता है।

अँधेरा,उजाला व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकता है और समय सापेक्ष भी।तुम्हारा उजाला मेरा अँधेरा बन सकता है।उसका अंधेरा तुम्हारे लिये रौशनी लेकर आ सकता है।

कितने हैं जो दूसरों के अंधेरों में मोमबत्तियां लेकर पहुँचते है? ज्यादातर लोग किसी अन्य के इन्तजार में अपने उजालों की अय्याशी में मस्त रहते है।कोई सूरज निकलेगा और सुबह होगी तो उजियारा बिखरेगा।
अंधियारा मिटाना किसी और की जिम्मेदारी समझ हर कोई हाथ बांधे खड़ा रहता है।

विख्यात शायर जनाब राहत इंदौरी का एक शेर देखिए-

जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जायेगी।।

राहत जी का शेर दिशा देता है। कवि जुगनुओं को साथ लेकर अँधेरे की दीवार को भेदना चाहता है। इसमें सामूहिकता और कमजोर की एकजुटता की ताकत को रेखांकित किया गया है।

ये अँधेरा क्यों समाप्त करना चाहता है कवि? कहीं न कहीं इसके पीछे अँधेरे के खिलाफ प्रतिरोध की भावना समाहित है।प्रतिबद्धता और उसकी पक्षधरता के दर्शन का पता चलता है।

कवि के शब्द कविता में आकर अश्म बन जाते हैं जो भाषा और विचार की रगड़ में  छोटी सी चिंगारी का सबब बनते हैं। समाज में उजाले के संचार का वातावरण निर्मित करते हैं।

कविताओं में जब भी थोड़ी सी ऐसी चमक दिखाई देती  है, तो वह भरोसा पैदा करती है कि अभी कवि अपने काम में लगा हुआ है। लेकिन तिमिर की मजबूत दीवार भेदने के लिए ये कोशिशें नाकाफी है। जुगनू हों या मोमबत्तियां, इनको एक साथ इकट्ठा होने से ही प्रकाश का बड़ा घेरा सम्भव होता है।

जब दृष्टि धुंधला रही हो,अंधेरा घना हो तो अधिकतम उजियारे के बंदोबस्त में  कविता की रोशन मोमबत्तियां अधिकतम चाहिए।

कवि को अपने अंधेरों से खुद तो लड़ना होता ही है, साथ ही दूसरों को साथ लेकर बड़ी लड़ाई में भी भाग लेना जरूरी होता है।

00000

2

संवेदनाएँ कवि का ईश्वर होती हैं !

एक साहित्यिक वाट्सएप ग्रुप में 'ईश्वर' विषय पर कविता लिखने को सदस्य कवियों को कहा गया था।

'
ईश्वर' पर कविता लिखना.. ! ईश्वर को जाने बगैर। कितना जानते हैं हम ईश्वर कोईश्वर कहने को एक,लेकिन रूप अनेक। यही सुनते गुनते आये बचपन से।

किस ईश्वर पर लिखें कविताउस पर!  जो निराकार है? या उस पर जो किसी पत्थर की मूरत में पूजा जा रहा है। याकि जो कण कण में व्याप्त है।

यदि वह कण कण में, हरेक प्राणी मात्र में विद्यमान है तो क्यों दुखी है,क्यों कष्ट में है,क्यों परेशान है ईश्वर ?
तो क्या उन दुखों पर कविता लिखी जाए?
क्यों प्रताड़ित है वह, क्यों उसका शोषण है, क्यों गैर बराबरी है समाज के हरेक ईश्वर में।

ख़ुशी है जहां, वहां शायद ईश्वर बसा है। दुःख है तो ईश्वर नदारद  है। सुख दुख सब उसी की सौगात है।क्या यही भरम है। असली ईश्वर फिर है कहाँ?

ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान। तो फिर यह 'भगवान' कौन हुआ? रामदीन की बगीची में इस्माइल की बकरी के घुस जाने पर सब्जीयों की तरह क्यों कट जाते हैं लोग। जिनमें ईश्वर या अल्ला या दोनों बसे हैं।

कौनसा रंग ईश्वर को प्रिय है? हरा? केशरिया? सफ़ेद? जो कफ़न का भी है और समुच्चय भी है इंद्रधनुष के रंगों का। सुर्ख रंग आंसुओं का क्यों हो जाता है ईश्वर के बंदों की आँखों में। क्यों फांसी पर चढ़ जाते हैं अन्नदाता ईश्वर?

हुसैन के चित्रों में ईश्वर दीखता था किसी को। फिर भी निर्वासन का दंड भोगता है कलाकार। ईश्वर को देखने की दृष्टि ईश्वर नहीं देता। ईश्वर की कविता में जोखिम है। ईश्वर पर लिखते हुए अक्सर भजन हो जाती हैं कविताएँखतरा है यही।

कोई चाहे न चाहे कविता में  दुःख और करुणा आ ही जाएंगी । सुख होगा, खुशी होगी तो ईश्वर की कविता में वह आध्यात्मिक या दार्शनिक  हो जाएंगे।

कविता यदि सच्ची होगी फिर वह किसी भी विषय पर क्यों न लिखी गई हो, 'ईश्वर' पर हो न हो , संवेदनाओं की अभिव्यक्ति वहां जरूर होगी। संवेदनाएं कवि का असली ईश्वर होती हैं।


ब्रजेश कानूनगो
503,
गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाड़िया रोड, इंदौर-452018