Sunday, May 21, 2017

रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

पुस्तक समीक्षा
रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

रजनी रमण शर्मा

गुजरे समाजों की तुलना में आज का हमारा समाज, बल्कि पूरी दुनिया में जो ग्लोबल समाज विद्यमान है, वह बहुत नया है,यों कहें कि हर दिन वह और भी नया होता जा रहा है. मेरा मानना है कि इस समाज के विराट हिस्से में न थमने वाला कोलाहल है, अकुलाहट है, हलचल है, पर इन हलचलों में कहीं एक ठहराव भी नजर आता है. इस शीतल ठहराव में कवि,कथाकार,व्यंग्यकार, ब्रजेश कानूनगो की छोटी-बड़ी कहानियों की किताब ‘रिंगटोन’, अपने चारों ओर बिखरे परिद्रश्य को पूरी क्षमता के साथ स्थापित करती है.
‘रिंगटोंन’ संग्रह में कुल पच्चीस कहानियां हैं. संकलन की अपेक्षाकृत बड़ी कहानियां भी दो-ढाई मुद्रित पृष्ठों से अधिक लम्बी नहीं हैं. यह यह संतोषजनक और आज के पाठक की प्रवत्ति के अनुकूल है.

वर्त्तमान समय की पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति और समाज के बीच के अंतर्विरोधों के बीच से उत्पन्न व्यक्तित्व विघटन की समस्या ‘रिंगटोन’, ‘जन्मदिन’, तथा ‘मोस्किटो बाइट’ जैसी कहानियों में पूरी शिद्दत के साथ सामने आती हैं. अलग हटकर ‘जन्मदिन’ को एन्जॉय करने धनपति सेठ अनाथालय में टी-शर्ट और महंगी टाफियाँ का वितरण करते हैं. बेटे का जन्मदिन जो है. दूसरी ओर शिवकुमार जो अनाथालय का प्रतिभाशाली विद्यार्थी है, अपने दसवें जन्म दिन के लिए हवेली में मनने वाले जन्म दिन का सपना भर देखने को अभिशप्त है. ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे शक्ति दें ताकि मेहनत करके जीवन में आगे बढ़ सके.

शीर्षक कहानी ‘रिंगटोन’ लेंडलाइन टेलीफोन से स्मार्ट फोन तक के समय और संवेग को कथा माध्यम से उजागर करने का काम बखूबी किया गया है. आधुनिकीकरण और विकास के साथ नई समस्याएँ भी आती हैं तो साहित्य में भी उनका आना लाजिमी है. इसी तरह ‘माँस्किटो बाइट’ में बेटा सोफ्टवेयर इंजीनियर है, बहू मल्टीनेशनल में वित्तीय सलाहकार, पोता साहित्यकार मधुकर जी के पास. बहू विमेन हॉस्टल में और पुत्र अमरीका में. एक दिन दादा को बेटे का फोन आता है कि वे अपने पोते रूपम को होस्टल में डाल दें क्योंकि घर पर रहकर उसे हिन्दी की आदत पड़ जायेगी तो बाद में उसके कैरियर में बाधक होगी. यहाँ सवाल हिन्दी का नहीं है. अपनी भाषा से दूर हो जाना अपनी संस्कृति से दूर हो जाना है. संस्कृति विहीन समाज का निर्माण करना ही बाजार का उद्देश्य है. भाषा नहीं तो समाज नहीं. सचेत होना होगा.
भाषा के बाद सवाल आता है ‘सभ्यता’ का. यह वह दौर है जब पहले से चली आ रही परम्पराओं, मान्यताओं, व्यवस्थाओं और व्यवहार आदि को नकारने और परिवर्तित भी किया जा रहा है. ‘सभ्यता’ कहानी में मम्मी-पापा के अनपेक्षित आदेश से ताऊ जी के चरण छूने वाली छोटी बच्ची पारुल अपनी पीठ थपथपाने पर बेधडक कहती है-‘लड़कियों की पीठ पर हाथ नहीं रखना चाहिए, बेड मैनर्स ताऊजी!’ सोच के इस समय में वास्तविकताएं तो चालाकियों के आवरण में कहीं दुबक ही जाती हैं. संग्रह की कहानियां ‘विश्वास’,’रोशनी के पंख’,’पिछली खिड़की’, इसकी गवाही देती हैं. बाल श्रमिक नंदू की ‘तस्वीर’ मंत्री को चाय का गिलास थमाते हुए अखबार में छप जाती है, किन्तु दूसरे ही दिन बाल श्रम क़ानून के भय के कारण मालिक उसे दूकान से निकाल देता है.

संग्रह की कई कहानियों में अपनी जड़ों, शहर,बस्ती और अपने परिवेश से दूर होने और अलगाव के दुखों और अतीत की स्मृतियों की अभिव्यक्ति बहुत मार्मिक और उद्वेलित कर देने वाले तरीके से हुई है. ‘संगीत सभा’,’घूँसा’,’भिन्डी का भाव’ आदि ये ऐसी ही कुछ ख़ूबसूरत कहानियां हैं. ये कहानियां माध्यम वर्ग की आडम्बर युक्त सामाजिक संरचना के विरुद्ध सवाल भी उठाने का प्रयास करती हैं. कहानियों में तकलीफों और असामंजस्य की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई है.
‘ज्वार भाटा’,’उजाले की ओर’, प्रेअरानास्पद हैं लेकिन ‘समाधि’ और ‘केकड़ा’ कहानियां पाठकों को झकझोर देती हैं.

संग्रह की कहानी ‘रंग-बेरंग’ को रेखांकित किया जाना बहुत जरूरी है. कसारिया और हरे रंग के कपडे का थान खरीदकर उनकी झंडियाँ बनाने वाला बूढ़ा दरजी अपने पोते के लिए दो मीटर सफ़ेद कपड़ा कफ़न के लिए खरीदता है,जो दंगों की चपेट में आ गया है. यह कहानी हमें बैचैन कर देती है.जब तक सामने रहती है राहत की सांस नहीं लेने देती. मन और शरीर रोष और तनाव से भर उठते हैं.

कथाकार ब्रजेश कानूनगो के पात्र वास्तविक जीवन के द्वंद्व,,असंतोष,असहमति,और नकार से उबलते, खीजते,छटपटाते हुए हैं. नए कथ्य, नए जीवनानुभाव, निजी अनुभूतियों, परिवेश और भौगोलिक गंधों की ईमानदार प्रस्तुतियां हैं ‘रिंगटोन’ की छोटी-बड़ी कहानियां. इनमें क्रोध कम है लेकिन शिल्प और कहने का बेहद कारगर तरीका है, जो सीधे कथ्य को दिलो-दिमाग तक पहुँचाने में सफल हो जाता है. ‘रिंगटोन’ संग्रह की कहानियों में सामाजिक विसंगतियों के विरोध में एक प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) भी है. ब्रजेश भावुकता का सहारा नहीं लेते,विवेक और तर्क उनकी कहानियों में मौजूद दिखाई देते है. एक सजग कथाकार के रूप में हमारे सामने एक ऐसे संग्रह के जरिये आते हैं ,जिनमें रिश्तों की ऊष्मा,भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से हमारा साक्षात्कार होता है.

(पुस्तक- रिंगटोन (छोटी-बड़ी कहानियां) ,लेखक- ब्रजेश कानूनगो, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, बाईस गोदाम,जयपुर-302006. मूल्य-रु 100 मात्र)

रजनी रमण शर्मा
42, मिश्र नगर, इंदौर-452009
मो 9826390787   

   





Monday, April 10, 2017

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स 


1

अंधेरों के खिलाफ कवि  

अन्धकार है तो कहीं न कहीं जरूर रात घिर आई होती है। अन्धेरा क्या सचमुच इतना बुरा है? उजाले क्या हमेशा अच्छे ही होते हैं।अँधेरे के भी कुछ उजले पक्ष होते हैं,तो उजाला भी कई अंधेरों को लेकर आता है।

अँधेरा,उजाला व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकता है और समय सापेक्ष भी।तुम्हारा उजाला मेरा अँधेरा बन सकता है।उसका अंधेरा तुम्हारे लिये रौशनी लेकर आ सकता है।

कितने हैं जो दूसरों के अंधेरों में मोमबत्तियां लेकर पहुँचते है? ज्यादातर लोग किसी अन्य के इन्तजार में अपने उजालों की अय्याशी में मस्त रहते है।कोई सूरज निकलेगा और सुबह होगी तो उजियारा बिखरेगा।
अंधियारा मिटाना किसी और की जिम्मेदारी समझ हर कोई हाथ बांधे खड़ा रहता है।

विख्यात शायर जनाब राहत इंदौरी का एक शेर देखिए-

जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जायेगी।।

राहत जी का शेर दिशा देता है। कवि जुगनुओं को साथ लेकर अँधेरे की दीवार को भेदना चाहता है। इसमें सामूहिकता और कमजोर की एकजुटता की ताकत को रेखांकित किया गया है।

ये अँधेरा क्यों समाप्त करना चाहता है कवि? कहीं न कहीं इसके पीछे अँधेरे के खिलाफ प्रतिरोध की भावना समाहित है।प्रतिबद्धता और उसकी पक्षधरता के दर्शन का पता चलता है।

कवि के शब्द कविता में आकर अश्म बन जाते हैं जो भाषा और विचार की रगड़ में  छोटी सी चिंगारी का सबब बनते हैं। समाज में उजाले के संचार का वातावरण निर्मित करते हैं।

कविताओं में जब भी थोड़ी सी ऐसी चमक दिखाई देती  है, तो वह भरोसा पैदा करती है कि अभी कवि अपने काम में लगा हुआ है। लेकिन तिमिर की मजबूत दीवार भेदने के लिए ये कोशिशें नाकाफी है। जुगनू हों या मोमबत्तियां, इनको एक साथ इकट्ठा होने से ही प्रकाश का बड़ा घेरा सम्भव होता है।

जब दृष्टि धुंधला रही हो,अंधेरा घना हो तो अधिकतम उजियारे के बंदोबस्त में  कविता की रोशन मोमबत्तियां अधिकतम चाहिए।

कवि को अपने अंधेरों से खुद तो लड़ना होता ही है, साथ ही दूसरों को साथ लेकर बड़ी लड़ाई में भी भाग लेना जरूरी होता है।

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2

संवेदनाएँ कवि का ईश्वर होती हैं !

एक साहित्यिक वाट्सएप ग्रुप में 'ईश्वर' विषय पर कविता लिखने को सदस्य कवियों को कहा गया था।

'
ईश्वर' पर कविता लिखना.. ! ईश्वर को जाने बगैर। कितना जानते हैं हम ईश्वर कोईश्वर कहने को एक,लेकिन रूप अनेक। यही सुनते गुनते आये बचपन से।

किस ईश्वर पर लिखें कविताउस पर!  जो निराकार है? या उस पर जो किसी पत्थर की मूरत में पूजा जा रहा है। याकि जो कण कण में व्याप्त है।

यदि वह कण कण में, हरेक प्राणी मात्र में विद्यमान है तो क्यों दुखी है,क्यों कष्ट में है,क्यों परेशान है ईश्वर ?
तो क्या उन दुखों पर कविता लिखी जाए?
क्यों प्रताड़ित है वह, क्यों उसका शोषण है, क्यों गैर बराबरी है समाज के हरेक ईश्वर में।

ख़ुशी है जहां, वहां शायद ईश्वर बसा है। दुःख है तो ईश्वर नदारद  है। सुख दुख सब उसी की सौगात है।क्या यही भरम है। असली ईश्वर फिर है कहाँ?

ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान। तो फिर यह 'भगवान' कौन हुआ? रामदीन की बगीची में इस्माइल की बकरी के घुस जाने पर सब्जीयों की तरह क्यों कट जाते हैं लोग। जिनमें ईश्वर या अल्ला या दोनों बसे हैं।

कौनसा रंग ईश्वर को प्रिय है? हरा? केशरिया? सफ़ेद? जो कफ़न का भी है और समुच्चय भी है इंद्रधनुष के रंगों का। सुर्ख रंग आंसुओं का क्यों हो जाता है ईश्वर के बंदों की आँखों में। क्यों फांसी पर चढ़ जाते हैं अन्नदाता ईश्वर?

हुसैन के चित्रों में ईश्वर दीखता था किसी को। फिर भी निर्वासन का दंड भोगता है कलाकार। ईश्वर को देखने की दृष्टि ईश्वर नहीं देता। ईश्वर की कविता में जोखिम है। ईश्वर पर लिखते हुए अक्सर भजन हो जाती हैं कविताएँखतरा है यही।

कोई चाहे न चाहे कविता में  दुःख और करुणा आ ही जाएंगी । सुख होगा, खुशी होगी तो ईश्वर की कविता में वह आध्यात्मिक या दार्शनिक  हो जाएंगे।

कविता यदि सच्ची होगी फिर वह किसी भी विषय पर क्यों न लिखी गई हो, 'ईश्वर' पर हो न हो , संवेदनाओं की अभिव्यक्ति वहां जरूर होगी। संवेदनाएं कवि का असली ईश्वर होती हैं।


ब्रजेश कानूनगो
503,
गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाड़िया रोड, इंदौर-452018


Saturday, December 3, 2016

जटिलता और सरलता

जटिलता और सरलता
ब्रजेश कानूनगो

एक

साहित्य में सरलता,जटिलता का सवाल सिक्के के दो पहलुओं से निकलकर आता है. पाठक और लेखक दोनों की भूमिका इसमें विमर्श के पूरक बिंदु हो सकते हैं.
 
सन्दर्भों की जानकारी और ज्ञान के अभाव में भी पाठकों  को कोई रचना जटिल लग सकती है। इसमें न सिर्फ पाठक को अपने को तैयार करना होता है बल्कि समालोचक या टीकाकार की भूमिका भी यहां बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। कोइ भी रचनाकार जानबूझकर अपनी रचना को जटिल नहीं बनाना चाहता। उसका अभीष्ट तो सामान्यतः यही होता है कि जो कुछ वह अनुभव कर रहा है वह कलागत सौन्दर्य के साथ उसी तरह पाठक/श्रोता तक पहुंच सके। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति बन सके। अपवाद तो हर कहीं हो सकते हैं।

जीवन की जटिलताओं को सरलता से अभिव्यक्त कर देना, हरेक लेखक के लिए शायद आसान काम नहीं होता। ज्यादातर लेखक तो जीवन की जटिलताओं तक पहुंचने में ही कतरा जाते हैं. कइयों के पास अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त सरल शब्दावली ,भाषा शैली के अभाव के चलते उचित प्रयोग का भी संकट खड़ा होने की संभावना बनी रहती है।
हरेक शब्द की अपनी सत्ता और आभा मंडल होता है।सम्पूर्ण कथातत्व की अभिव्यक्ति और सही संप्रेषण और कहे गए को सही अर्थ देने के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग  रचना में सौंदर्य का कारक बनता है।इस सौंदर्य में कभी व्यंजना और लक्षणा शक्तियां उभरती हैं विशेषतौर पर व्यंग्य लेखन में। समर्थ रचनाकार शब्दों के सही इस्तेमाल से जटिल से जटिल सन्दर्भों को सरलता से पाठक के गले उतार देने में सफल होता है।
इन्ही प्रयासों में थोड़ी कमी रचना को दुरूह भी बना सकती है,लेकिन इसकी परवाह सामान्यतः अब ज्यादा की नहीं जाती। हमें छद्म साहित्य से अलग हटकर ही विचार करना चाहिए.

किसी भी रचना में पाठ के स्तर पर बाहरी और आतंरिक कईं परतें होती हैं, जिसके कारण भी जटिलता/सरलता का सवाल खड़ा हो जाता है। किसी भी वास्तु की मेक्रो और माइक्रो बनावट की तरह रचना भी ऐसे ही कई पाठों का समुच्चय होती है। पाठक का एनेलेसिस भी पढ़ते हुए मेक्रो और माइक्रो स्तर से गुजरता है. जो पाठक बाहरी परत को छूकर मजा ले लेता है उसके लिए वह रचना जटिल नहीं है. जटिल तो वह तब होती है जब वह भीतरी परत तक पहुँचने में कामयाब नहीं हो पाता. जहां सच्ची रचना की आत्मा निवास करती है.

जो मॉइक्रो तक नहीं पहुँच पाता वह जटिलता में उलझ जाता है लेकिन जैसे ही वह भीतर उतरता है, आनन्द से भर उठता है, ख़ुशी में 'मिल गया मिल गया' का नाद करता बगैर टॉवेल लपेटे आर्केमिडीज की तरह अध्ययन कक्ष से बाहर दौड़ लगा देता है। यह अनुभूति किसी साधक की आत्मा के  परमात्मा से मिलन की ख़ुशी जैसी होती है। लगता है हिमालय में भटकते हुए यकायक फूलों की घाटी में पहुँच गए हों. यह होता है रचना के असली पाठ को पा लेने का अद्भुत सुख।

०००००

दो

हालांकि अपनी किसी रचना का उदाहरण देना ठीक नहीं माना जाता है लेकिन रचना की सरलता और कठिनता पर अपनी बात स्पष्ट करने के लिए बहुत विनम्रता और संकोच के साथ अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए ऐसा कर रहा हूँ। ये कविता देखिये...

दूरियाँ
ब्रजेश कानूनगो

1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !
2
एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर
तो हम बीमार हो जाते हैं
इतने करीब हैं वे
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख.
3
शाम की सैर के बाद
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर 
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद
साथ-साथ हैं वे अभी-तक.

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देखा जाए तो इस कविता के पहले हिस्से पर ठहाका लगाया जा सकता है। वह एक चुटकुले की तरह सरल पाठ होगा। लेकिन यदि भीतर जाएँ तो वहां जो आधुनिक समाज और गृहस्थ जीवन की जटिलताएं हैं वे हमारे रोंगटे खड़े कर देने वाली हो सकती हैं।
इसी तरह दूसरे अंश में भी सब सरल महसूस किया जा सकता है, लेकिन वहां दूर बैठे बच्चों, परिजनों की चिंता में पेरेंट्स की मनोदशा, विवशता की जटिलताएं आसानी से पढ़ीं जा सकती हैं।
कविता के आखिरी हिस्से में वृद्ध दंपत्ति में से एक के दुनिया से चले जाने के बाद उत्तरजीवी का अकेलापन और स्मृति के सुन्दर अतीत को दैनिक अनुभव करना, जीवन की जटिलता ही तो है। 
यदि रचनाकार अपनी इस अनुभूति को पाठक तक पहुंचाने में सफल होता है तो रचना पाठक के लिए सरल है अन्यथा वह थोड़ी जटिल हो जायेगी।

निसंदेह टीका या समीक्षा के बाद रचना की जटिलता कम होती जाती है। यह बात साहित्य में  ईमानदार टीकाकार, समीक्षक की भूमिका को रेखांकित  करती है।

ब्रजेश कानूनगो



Monday, November 14, 2016

हिन्दी व्यंग्य और कुछ टिप्पणियाँ

हिन्दी व्यंग्य और कुछ टिप्पणियाँ                  
ब्रजेश कानूनगो

1.हिंदी गद्य की अन्य विधाओं के बीच व्यंग्य की उपस्थिति और उपलब्धि

इस प्रश्न के उत्तर में दो तरह से विचार किया जा सकता है।
पहला- हिंदी गद्य की अन्य विधाओं के बीच व्यंग्य विधा की स्थिति।
दूसरा- हिंदी गद्य विधाओं के बीच व्यंग्य की स्थिति।या अन्य विधाओं में व्यंग्य की स्थिति।

पहले नजरिये से अन्य गद्य विधाओं के बीच व्यंग्य विधा की स्थिति अभी भी उतनी सम्मानजनक नहीं दिखाई देती जितनी कि कहानी,उपन्यास,कविता या नाटक इत्यादि की है।उपन्यासकार और कथाकारों को थोड़ा ऊंचा दर्जा प्राप्त, हिंदी साहित्य में दिखाई देता है।जहां तक कविता और कवियों की बात करें तो वहां भी आलोचक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है।कवि को प्रतिष्ठित कर देने का काम बहुत हद तक कोई आलोचक बहुत कुशलता से करने में समर्थ दिखाई देता है।जबकि व्यंग्य विधा का तो अभी तक कोई संतोषजनक सौंदर्य शास्त्र या आलोचना कर्म उपलब्ध ही नहीं है।इस मायने में व्यंग्य विधा की स्थिति अभी बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती। इसी कारण व्यंग्य विधा के प्रमुख नामों में से भी अधिकाँश उनके उपन्यासों और कहानियों की वजह से जाने जाते हैं।

इसी तारतम्य में दूसरे नजरिये पर भी सहज ही बात स्पष्ट हो जाती है।
अन्यविधाओं में जैसे ही व्यंग्य सायास- अनायास चला आता है तब मुख्य विधा की महत्ता,रोचकता और प्रभाव भी बढ़ जाता है।विशेष तौर से उपन्यासों को ही देखलें।बहुत से उपन्यास तो अपने भीतर इतने बेहतर तरीके से व्यंग्य का निर्वाह करते हैं कि इन्हें 'व्यंग्य उपन्यास' कहने में कोई हिचक नहीं होती। मेरा मानना है कि अन्य विधाओं के बीच व्यंग्य की उस्थिति तब बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

व्यंग्य कविताओं में मैं यदि लोकप्रिय मंचों पर पढ़ी जाने वाली ठहाका कविताओं को छोड़कर बात करूं तो ऐसी ज्यादातर समकालीन सार्थक कवितायें जो विसंगतियों के खिलाफ और जनोन्मुखी उद्देश्यों को लेकर लिखी जाती रहीं हैं,उनमें व्यंजना,कटाक्ष और व्यंग्य अंतर्धारा की तरह प्रवाहित होता ही है।व्यंग्य की उपस्थिति  उन कविताओं को बहुत महत्वपूर्ण और सम्मानजनक बना देती हैं।

केवल अखबारी कॉलोमों में निश्चित शब्द सीमा में प्रकाशित होने वाले तथाकथित व्यंग्यों पर अभी कतई आश्वस्ती से कहा जा सकता कि वहां व्यंग्य बेहतर स्थिति में है।मैं उन्हें किसी व्यंग्य  का मात्र एक 'बीज' भर स्वीकार कर उस लेखन को व्यंग्यकार का रियाज  या अभ्यास ही कहूंगा,वह रचनाकार की फाइनल प्रस्तुति कम ही होती है।

व्यंग्य में जो उपलब्धि और अब तक जो हासिल है वह निसंदेह व्यंग्य लेखकों के उपन्यास,कहानियां और प्रहसन ही हैं जो उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। परसाई जी, शरद जोशी जी जैसे कुछ ही स्तंभकार हैं जिन्होंने इन विधाओं के साथ शानदार कॉलम और निबंध लेखन किया और व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलवाई।ज्ञान चतुर्वेदी इसी कार्य को आगे बढ़ाते रहे हैं।

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2.नये समय के नये सवालों का सामना करते हुए व्यंग्य का हस्तक्षेप

यह केवल व्यंग्य में ही विचारणीय नहीं है,बल्कि हरेक विधा में विमर्श के योग्य बिंदु है। सार्थक लेखन की तो यह अनिवार्यता ही होना चाहिए की वह अपने समय के सवालों, चुनौतियों के सन्दर्भों को साथ लेकर चले। व्यंग्य में तो यह और भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।जिस दौर में टेक्नोलॉजी का विकास हो गया हो, स्त्रियों की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में बदलाव आया हो।कोई व्यंग्यकार पत्नी द्वारा बेलन से पति की खोपडिया तोड़ डालने जैसे विषयों पर कलम घिस रहा हो, उसे कैसे मान्यता दी जानी चाहिए।यह एक मात्र उदाहरण है,ऐसे कई प्रसंग और विषय दिख जाते हैं जो व्यंग्य को बहुत पीछे ढकेल देने का काम करते हैं।

भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद समाज में कई बदलाव हुए है। पाखण्ड,धूर्तताओं ,चालाकियां और सांस्कृतिक प्रदूषण के आगमन के साथ समाज का  नैतिक अवमूल्यन हुआ है। बाजारवाद ने हरेक वस्तु को बिकाऊ, यहां तक कि देह,आत्मा और मूल्यों तक की बोलियां लग जाने को अभिशप्त किया है।

परिवारों में रिश्तों की मधुरता और सम्मान के साथ छोटे-बड़ों के बीच का कोमल और संवेदन सूत्र टूटने लगा है। घर के बुजुर्ग हाशिये पर हैं।

दुनिया को जीत लेने की किसी शहंशाह की ख्वाहिश की तरह राजनीति के नायक-महानायक किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई देते हैं। सत्ता सुख की खातिर अपने पितृ दलों को डूबते जहाज की तरह कभी भी त्याग देने में नेताओं,प्रतिनिधियों को कोई परहेज नहीं होता। असहमति किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं। आश्वासन और विश्वास जुमलों की तरह इस्तेमाल हो रहे हों।

हिंदीभाषा और देवनागरी लिपि को नष्ट भ्रष्ट करने में उन्ही संस्थानों और अखबारों की मुख्य भूमिका दिखाई देती है जिन पर उनके संरक्षण की उम्मीद लगी रही हो।
नए समय के बहुत से नए सवाल हैं,जिन पर गंभीरता से व्यंग्य लिखे जाना चाहिए। यह समय रम्य रचनाओं और संपादकीय टिप्पणियों से कुछ आगे की अपेक्षा व्यंग्यकारों से करता है।

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3 अतिप्रकाशन से रचनात्मक व्यंग्य को लाभ या हानि

इस बिंदु के भी दो विस्तार हो सकते हैं।
पहला- किसी एक रचनाकार का अति प्रकाशन।
दूसरा- किसी पत्र-पत्रिका में व्यंग्य रचनाओं का अति प्रकाशन।

किसी एक व्यंग्यकार के अति प्रकाशन से जोड़कर देखें तो यह रचनाकार की गंभीरता और समझ पर निर्भर करता है। अति प्रकाशन के हर कदम पर उसे अपने लेखन को संवारने और खुद के व्यंग्यकार को विकसित और बेहतर बनाने का अवसर देता है।यदि वह आगे बढ़ता है तो व्यंग्य में भी नए प्रयोग करेगा। भाषा में शैली में कुछ नया देगा।इस क्रम में व्यंग्य विधा को लाभ ही होता है।

लेकिन जब अति प्रकाशन बस नियमित सामग्री उपलब्ध कराने भर से है तो फिर वहां किसी ख़ास लाभ की उम्मीद नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर पत्र पत्रिकाओं में निश्चित ही व्यंग्य के सीमित लेकिन सार्थक प्रकाशन में ही विधा का लाभ निहित है। हाँ, केवल व्यंग्य को समर्पित पत्रिकाएं विधा पर नियमित विमर्श से लाभकारी सिद्ध होती रही हैं। इसमें व्यंग्य का प्रकाशन कभी भी सीमा में नहीं बांधा जा सकता।

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4.बहुतेरी बहसों गोष्ठियों वक्तव्यों यात्राओं से व्यंग्य में गुणात्मक वृद्धि

मेरा मानना है कि व्यंग्य के विकास और विधा के अस्तित्व और नए रचनाकाओं के प्रोत्साहन के लिए गोष्ठियों,वक्तव्यों का आयोजन होते रहना चाहिए।इनसे यदि एक दो रचनाकारों में भी यदि गुणातमक परिवर्तन हो जाता है तो वह विधा के हित में है।

यात्राओं में समानधर्मा व्यक्तियों को एक दिशा में सोचने विचारने का लगातार अवसर मिलता है,इसे सकारात्मक बिंदुओं पर केंद्रित रखा जाए तो लाभ हो न हो, विधा के लिए कोई नुक्सान भी सम्भव नहीं है।

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5.समकालीन व्यंग्य में राजनीतिक व सामाजिक विवेक

दरअसल हर कथन एक राजनीतिक स्टेटमेंट होता है। चुनावी राजनीति से इस बात की तस्दीक कृपया न करें। 'पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है? यह एक जरूरी प्रश्न है।रचनाकार की अन्ततः एक दृष्टि और पक्षधरता का होना उसके लेखन को एक पहचान देता है। इसके साथ साथ उसका सामाजिक विवेक भी चलता है।वस्तुतः यही विवेक रचनाकार की पक्षधरता और राजनीतिक दृष्टि का निर्धारक भी होता है।
व्यंग्य लेखन में भाषा और शैली में चुटकियां,विट, हास्य,आदि भले ही चलते रहें, विषयवस्तु के निर्वाह में रचनाकार का सामाजिक विवेक और उसकी राजनीतिक चेतना जाहिर हो ही जाती है। परसाई जी ,शरद जोशी से लेकर आज के हमारे वरिष्ठ व्यंग्यकारों की रचनाओं को पढ़ने के बाद उनके सामाजिक सरोकार और पक्षधरता को आसानी से समझा जा सकता है।
अपने समय की विसंगतियों पर रचनाकारों को व्यंग्य लिखने में यही चेतना बहुत मदद करती है और रचना को श्रेष्ठ बना देती है। राजनीतिक दृष्टि से सम्पन्न और सामाजिक विवेक से दिशा प्राप्त करने वाला लेखक  सचमुच महत्वपूर्ण व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित कर लेता है।
दुःख इस बात का है कि समकालीन व्यंग्य लेखन में कुछ को छोड़कर ऐसे व्यंग्यकारों की संख्या बहुत कम नजर आती है जो अपनी रचनाओं में चेतना संपन्न दिखाई देते हों।

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6.युवा व्यंग्यकारों की सक्रियता और सार्थकता

वर्तमान समय युवा व्यंग्यकारों के लिए किसी स्वर्णकाल से कम नहीं है। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखन के लिए भरपूर अवसर उपलब्ध हैं।
इतने नए लेखक व्यंग्य क्षेत्र में सक्रिय हैं जितने कभी नहीं रहे। विषयों की कोई कमी नहीं है।तात्कालिक सन्दर्भों पर रोचक आलेखों की भारी मांग है। लिखने वाले भी कम नहीं है। सक्रियता का पैमाना तो इतना व्यापक है कि कई बार एक ही तात्कालिक विषय पर अनेक लेख संपादक के पास एक साथ पहुँच जाते हैं।मुसीबत खड़ी हो जाती है उसके सामने कौनसी रचना ,किसकी रचना का उपयोग करे।
जिस अनुपात में युवा रचनाकारों की सक्रियता दिखती है उतनी व्यंग्य की गुणवत्ता में अपेक्षित सार्थकता महसूस नहीं की जा सकती। एक ही लेख कई-कई अखबारों में प्रकाशन के बावजूद ऐसा लगता ही नहीं कि दोबारा पढ़ा जा रहा है। क्योंकि उनमें कोई एक बात भी या एक पञ्च या व्यंग्योक्ति ऐसी नहीं होती कि उसे याद रखा जा सके।अविस्मरणीय हो जाए। लेकिन यह भी सच है कि इसी के चलते कुछ प्रतिभावान व्यंग्य लेखक निकल कर आ रहे हैं,जो बहुत आश्वस्त करते हैं।
जिन पर नाज किया जा सकता है।


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7.व्यंग्य में आलोचना की स्थिति

मुझे लगता है व्यंग्य में आलोचना उतनी परिपक्व नहीं हो पाई है जितनी कविता के क्षेत्र में उसने स्थान बनाया है।
जो व्यंग्य लिख रहा है वही उसकी समालोचना बल्कि यो कहें मात्र पुस्तक समीक्षा कर रहा है।व्यंग्य के सौंदर्य शास्त्र या आलोचना के सन्दर्भ में अभी गंभीर प्रयास होना बाकी है।

डॉ प्रेम जनमेजय,श्री सुभाष चन्दर, आदि ने कुछ प्रयास जरूर किये लेकिन उतना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। समकालीन व्यंग्य लेखन में गंभीरता से सक्रीय और चर्चित व्यंग्यकार,संपादक श्री सुशील सिद्धार्थ जरूर इस दिशा में संकल्पित हुए हैं।कुछ योजनाएं भी उन्होंने बनाई है। उम्मीद है यदि सभी से अपेक्षित सहयोग मिल पाया तो अब तेजी से आलोचना और व्यंग्य के सौंदर्य शास्त्र के लिए काम जमीन पर दिखाई दे सके।

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8.वर्तमान व्यंग्य की भाषा में व्यंजना और सपाटबयानी

भाषा के बगैर हम किसी भी विधा में कैसी भी रचना की कल्पना नहीं कर सकते। और जब भाषा के लिए विचार करते हैं  तो'शब्द शक्तियों' की बात भी सहज है।
अभिधा,लक्षणा और व्यंजना ,ये तीन ऐसी शब्द शक्तियां हैं जिनमे हम अपने कथन को व्यक्त करते हैं। कोई भी संप्रेषण साधारणतः अभिधा के अंतर्गत होता है,सामान्य सूचनात्मक लेख, रिपोर्टिंग आदि जिनमें सीधे से विषयवस्तु अभिव्यक्त होती है, किंतु जब साहित्य की किसी विधा में रचना आती है तब अभिधा के अलावा,लक्षणा और व्यंजना शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग उसे प्रभावी बनाता है, गुणवत्ता में बेहतरी लाता है।
शब्द शक्तियों का उपयोग रचना को  दुरूह बनाकर उसमें बाधक नहीं बनता बल्कि उसे थोड़ा अधिक स्वीकार्य और रचना में कलात्मकता पैदा करता है। शरीर को सीधे सीधे व्यायाम के लिए हिलाने डुलाने से भी एक्सरसाइज तो होती है,मगर यदि संगीत के साथ एरोबिक्स अथवा योगाभ्यास किया जाए तो वह कुछ अधिक स्वीकार्य और अधिक करने के लिए इच्छा जाग्रत करने वाला हो जाता है।
व्यंग्य में लक्षणा और व्यंजना यही काम करते हैं। जिनके अभाव में कोई भी रचना 'सपाट बयानी' से आरोपित की जा सकती है। व्यंग्य तो वहां भी होगा मगर व्यंग्य का श्रृंगार और ख़ूबसूरती नहीं दिखाई देगी। व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्तियां व्यंग्य रचना की ताकत कही जा सकती है।
इन शक्तियों के कारण रचना की पठनीयता भी बढ़ जाती है और आगे पढ़ने को लालायित करती है।
सपाट बयानी में भी अंतर्निहित व्यंग्य हो सकता है लेकिन यह कौशल बिरलों के बस की बात होती है।

कुछ समकालीन व्यंग्य लेखों में विशेषतः कॉलम लेखन में प्रायः केवल रोचक प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी या थोड़ी सी चुटकी के साथ व्यंग्यकार विवरण अथवा विषयवस्तु का इतिहास बताता हुआ मार्गदर्शक बन बैठता है। 
इसे गंभीर व्यंग्य लेखन मानने में मुझे अभी संकोच ही होता है।इन्हें भले हो खूब लोकप्रियता प्राप्त हो जाती हो लेकिन व्यंग्य तो कदापि नहीं लगते।

इसके बावजूद  बहुत से युवा रचनाकार कोशिश जरूर करते हैं कि उनके आलेख में व्यंजन हो, व्यंग्य की उपस्थिति हो और वे पाठकों को उद्वेलित कर सकें।

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9.व्यंग्य से अपेक्षाएं...........

मेरे मत से तो व्यंग्य का उद्देश्य ही विसंगतियों,विडंबनाओं पर प्रहार के साथ ,समाज की बेहतरी के लिए संकेत करना होता है।
बाकी इस हेतु के लिए उसके अलग प्रारूप और शैलियां विकसित की जा सकती है। जिसमें यह भी कि पाठक थोड़ा सा मुस्कुराए, दुःख में विह्वल भी हो जाए, करुणा का संचार हो या खिलखिला पड़े। अन्याय और असत्य के प्रति लड़ने के लिए वातावरण और मानस तैयार कर सके। इतनी अपेक्षा तो व्यंग्य से होनी ही चाहिए।


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ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर- 452018