Wednesday, June 21, 2017

नामजद परिहास

नामजद परिहास
व्यंग्य में नेताओं के नामों का उल्लेख

इन दिनों अखबारी व्यंग्य लेखन में एक बात जो विशेष रूप से नजर आती है कि अब राजनेताओं  के नामों का उल्लेख बहुतायत से किया जाने लगा है। केजरीवाल, राहुल, मोदी, ममता, मुलायम   आदि का उल्लेख व्यंग्य रचना में सीधे सीधे होने लगा है।

मेरा मानना है कि यह विधा के सौंदर्य की दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता। सड़क के प्रदर्शनोंआंदोलनों में नाम के उल्लेख के साथ जिंदाबादमुर्दाबाद की परंपरा रही है,लेकिन व्यंग्य एक साहित्यिक विधा है और उसकी अपनी गरिमा होती है।

ऐसा नहीं है कि व्यक्तिगत रूप से व्यंग्य नहीं लिखे गए, खूब लिखे गए लेकिन वहां भी इस तरह सीधे सीधे नाम नहीं लिया गया। व्यंग्य में व्यक्ति की प्रवत्ति पर व्यंग्य होना ही चाहिए, हास्य भी होना ठीक है लेकिन नामजद परिहास या मखौल उड़ाए जाने को मैं निजी तौर पर ठीक नहीं मानता।
इन दिनों विशेषकर राजनेताओं के व्यक्तिगत नामों के उल्लेख के साथ उनके मखौल उड़ाते हुए किसी भी लेख को प्रकाशन की लगभग गारंटी की तरह माना जाने लगा है,उसमें भी केजरीवाल और राहुल के नामों को स्टार का दर्जा प्राप्त हैं।

हो तो यह भी रहा है कि यदि लेख की प्रकृति गैर राजनीतिक होती है फिर भी किसी तरह इन नामों को घुसेड़ देने के प्रयास दिखाई दे जाते हैं,जबकि विषय वस्तु से उसका कोई ताल मेल ही नहीं होता।
शरद जोशी जी सहित सभी श्रेष्ठ व्यंग्यकारों ने राजनेताओं को लेकर तीखे व्यंग्य लिखे हैं मगर वहां भी व्यक्ति नहीं बल्कि प्रवत्ति पर निशाना लगाया गया। और वे सहज रूप से है- परिहास के साथ विसंगति और अटपटे आचरण पर कटाक्ष की तरह आते थे। मखौल की तरह तो कदापि नहीं। व्यंग्य को नामजद गालियों की दिशा में जाते देख दुःख होता है। बाकी तो जो है सो है ही।

ब्रजेश कानूनगो


आलोचना में हिंदी शब्दों की खोज

आलोचना में हिंदी शब्दों की खोज 
ब्रजेश कानूनगो

एक साहित्यिक वाट्सएप समूह पर युवा कथाकार की कहानी पर सदस्यों की टिप्पणियां पढ़ते हुए एक सामान्य जिज्ञासा और प्रश्न सामने आया ।
'
क्या आलोचना में हिंदी शब्द स्वाभाविक रूप से अभी भी प्रयुक्त किये जाने से अपेक्षित प्रभाव नही छोड़ पाते ?'

मुझे कहानी पर अपनी बात कहते हुए अधिक ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल हिंदी में करना पड़ा, जबकि आगे साथियों ने अंग्रेजी के कुछ शब्दों के प्रयोग से बात को बहुत सहजता से संक्षिप्त में स्पष्ट कर दिया। कुछ बहुत प्रभावी शब्दों ने मुझे समृद्ध भी किया।

डीटेलिंग,अंडरटोन,क्राफ्टिंग,ट्रीटमेंट  आदि जैसे बहुत से  अंग्रेजी के शब्द आलोचना में बहुत प्रयोग में आते हैं। साहित्य ही नहीं अन्य कला समीक्षाओं में भी  अंग्रेजी शब्दावली का खूब प्रयोग हो रहा है और समझ के स्तर पर ये अधिक ग्राह्य भी हो रहे हैं। इनका विरोध नहीं है, बस इतनी ही ताकत के हिंदी पर्याय की खोज और प्रयोग की चिंता स्वाभाविक  है।

अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी भाषा की ख़ासियत ही यह है कि यह आम प्रचलित शब्दों का समावेश करते हुए विकसित हुई है।  चाहे वह उर्दू हो, अवधी या ब्रजभाषा हो या फ़ारसी और अन्य विदेशी भाषाओं से आये शब्द हों। कई वर्षों तक हिंदी अधिकारी की तरह कार्य  करते हुए मैंने स्वयं भी 'प्रयोजन मूलक हिंदी' को बढ़ावा देते हुए अक्सर ऐसे बचावी तर्क दिए हैं। सच तो यह भी है कि अनुवाद और अंग्रेजी का सहारा लेकर चलने से संभवतः हमने हिंदी को नुकसान ही पहुंचाया है।

बेशक़ अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल पर सवाल उठाया जा सकता है, स्वीकार और नकार पर बहस हो सकती है, होती भी रही है। पिछली कई  सदियों के  औपनिवेशवाद ने हिंदी पर अपना असर तो छोड़ा ही है कि अनेक दूसरी भाषाओं के  शब्द रोजमर्रा की भाषा में घुलमिल गए है। फिर भी भाषाई शुचिता के अंतर्गत सवाल उठना भी बेहद लाज़िमी है।
भाषाई शुचिता और शुद्धता और आग्रह जो अकसर दुराग्रह की सीमा तक पहुंच जाता है, खतरनाक भी हो जाता है। कभी कभी लगता है इसलिए ये जो घालमेल, मेल मिलाप फिलहाल ज्यादा हितकारी होगा। लेकिन क्या यहां रुक जाना चाहिए?

अगर रोजमर्रा की हिंदी में आलोचना में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी शब्दों की तरह हिंदी के शब्द प्रयुक्त होते रहते तो वे भी उतनी ही सहजता से आते जितनी आसानी से ये डिटेलिंग या क्राफ्ट, अंडरटोन, ट्रीटमेंट आदि आ जाते हैं।

भले ही दूसरी भाषा का अधिक समर्थ शब्द आकर्षित करता हो, हिंदी में हमें अपनी खोज और प्रयोग लगातार जारी रखना चाहिए। हमारा थोड़े से प्रयास काम को आगे बढ़ा सकते हैं।क्राफ्ट के लिए 'बुनावट' का प्रयोग भी होता है और वह ठीक और प्रभावी भी है। ट्रीटमेंट के लिए 'निर्वाह', विषय वस्तु का निर्वाह। भाव भी शब्दों के अधिकाधिक प्रयोग से प्रबल होने लगते हैं।अनुवाद की बजाए शायद स्वतंत्र शब्द सत्ता की खोज जरूरी है। और फिर सम्पूर्ण कथ्य और वाक्य विन्यास के बाद ही शब्दों के अर्थ भी व्यापकता में खुलते जाते हैं।

यह विडंबना है कि 'फिजिकली चेलेंज पर्सन के लिए अभी तक हम कोई उचित संतोषजनक शब्द अब तक खोज नही पाए हैं।विकलांग- अपमान जनक हो जाता है और दिव्यांग- ईश्वरीय।

आलोचना में अंग्रेजी के खूबसूरत और सटीक शब्दों के इस्तेमाल का विरोध नहीं है, बस इतने ही सटीक हिंदी पर्याय की खोज और प्रयोग की चिंता है। इस ताकत को आलोचना की हिंदी शब्दावली में भी आना चाहिए। यदि हम कुछ कर सकते हैं तो जरूर किया जाना चाहिए। क्या कहते हैं आप!!

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क, कनाड़िया रोड, इंदौर- 452018




Sunday, May 21, 2017

रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

पुस्तक समीक्षा
रिश्तों की ऊष्मा, भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से स्पंदित ‘रिंगटोन’

रजनी रमण शर्मा

गुजरे समाजों की तुलना में आज का हमारा समाज, बल्कि पूरी दुनिया में जो ग्लोबल समाज विद्यमान है, वह बहुत नया है,यों कहें कि हर दिन वह और भी नया होता जा रहा है. मेरा मानना है कि इस समाज के विराट हिस्से में न थमने वाला कोलाहल है, अकुलाहट है, हलचल है, पर इन हलचलों में कहीं एक ठहराव भी नजर आता है. इस शीतल ठहराव में कवि,कथाकार,व्यंग्यकार, ब्रजेश कानूनगो की छोटी-बड़ी कहानियों की किताब ‘रिंगटोन’, अपने चारों ओर बिखरे परिद्रश्य को पूरी क्षमता के साथ स्थापित करती है.
‘रिंगटोंन’ संग्रह में कुल पच्चीस कहानियां हैं. संकलन की अपेक्षाकृत बड़ी कहानियां भी दो-ढाई मुद्रित पृष्ठों से अधिक लम्बी नहीं हैं. यह यह संतोषजनक और आज के पाठक की प्रवत्ति के अनुकूल है.

वर्त्तमान समय की पूंजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति और समाज के बीच के अंतर्विरोधों के बीच से उत्पन्न व्यक्तित्व विघटन की समस्या ‘रिंगटोन’, ‘जन्मदिन’, तथा ‘मोस्किटो बाइट’ जैसी कहानियों में पूरी शिद्दत के साथ सामने आती हैं. अलग हटकर ‘जन्मदिन’ को एन्जॉय करने धनपति सेठ अनाथालय में टी-शर्ट और महंगी टाफियाँ का वितरण करते हैं. बेटे का जन्मदिन जो है. दूसरी ओर शिवकुमार जो अनाथालय का प्रतिभाशाली विद्यार्थी है, अपने दसवें जन्म दिन के लिए हवेली में मनने वाले जन्म दिन का सपना भर देखने को अभिशप्त है. ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे शक्ति दें ताकि मेहनत करके जीवन में आगे बढ़ सके.

शीर्षक कहानी ‘रिंगटोन’ लेंडलाइन टेलीफोन से स्मार्ट फोन तक के समय और संवेग को कथा माध्यम से उजागर करने का काम बखूबी किया गया है. आधुनिकीकरण और विकास के साथ नई समस्याएँ भी आती हैं तो साहित्य में भी उनका आना लाजिमी है. इसी तरह ‘माँस्किटो बाइट’ में बेटा सोफ्टवेयर इंजीनियर है, बहू मल्टीनेशनल में वित्तीय सलाहकार, पोता साहित्यकार मधुकर जी के पास. बहू विमेन हॉस्टल में और पुत्र अमरीका में. एक दिन दादा को बेटे का फोन आता है कि वे अपने पोते रूपम को होस्टल में डाल दें क्योंकि घर पर रहकर उसे हिन्दी की आदत पड़ जायेगी तो बाद में उसके कैरियर में बाधक होगी. यहाँ सवाल हिन्दी का नहीं है. अपनी भाषा से दूर हो जाना अपनी संस्कृति से दूर हो जाना है. संस्कृति विहीन समाज का निर्माण करना ही बाजार का उद्देश्य है. भाषा नहीं तो समाज नहीं. सचेत होना होगा.
भाषा के बाद सवाल आता है ‘सभ्यता’ का. यह वह दौर है जब पहले से चली आ रही परम्पराओं, मान्यताओं, व्यवस्थाओं और व्यवहार आदि को नकारने और परिवर्तित भी किया जा रहा है. ‘सभ्यता’ कहानी में मम्मी-पापा के अनपेक्षित आदेश से ताऊ जी के चरण छूने वाली छोटी बच्ची पारुल अपनी पीठ थपथपाने पर बेधडक कहती है-‘लड़कियों की पीठ पर हाथ नहीं रखना चाहिए, बेड मैनर्स ताऊजी!’ सोच के इस समय में वास्तविकताएं तो चालाकियों के आवरण में कहीं दुबक ही जाती हैं. संग्रह की कहानियां ‘विश्वास’,’रोशनी के पंख’,’पिछली खिड़की’, इसकी गवाही देती हैं. बाल श्रमिक नंदू की ‘तस्वीर’ मंत्री को चाय का गिलास थमाते हुए अखबार में छप जाती है, किन्तु दूसरे ही दिन बाल श्रम क़ानून के भय के कारण मालिक उसे दूकान से निकाल देता है.

संग्रह की कई कहानियों में अपनी जड़ों, शहर,बस्ती और अपने परिवेश से दूर होने और अलगाव के दुखों और अतीत की स्मृतियों की अभिव्यक्ति बहुत मार्मिक और उद्वेलित कर देने वाले तरीके से हुई है. ‘संगीत सभा’,’घूँसा’,’भिन्डी का भाव’ आदि ये ऐसी ही कुछ ख़ूबसूरत कहानियां हैं. ये कहानियां माध्यम वर्ग की आडम्बर युक्त सामाजिक संरचना के विरुद्ध सवाल भी उठाने का प्रयास करती हैं. कहानियों में तकलीफों और असामंजस्य की ईमानदार अभिव्यक्ति हुई है.
‘ज्वार भाटा’,’उजाले की ओर’, प्रेअरानास्पद हैं लेकिन ‘समाधि’ और ‘केकड़ा’ कहानियां पाठकों को झकझोर देती हैं.

संग्रह की कहानी ‘रंग-बेरंग’ को रेखांकित किया जाना बहुत जरूरी है. कसारिया और हरे रंग के कपडे का थान खरीदकर उनकी झंडियाँ बनाने वाला बूढ़ा दरजी अपने पोते के लिए दो मीटर सफ़ेद कपड़ा कफ़न के लिए खरीदता है,जो दंगों की चपेट में आ गया है. यह कहानी हमें बैचैन कर देती है.जब तक सामने रहती है राहत की सांस नहीं लेने देती. मन और शरीर रोष और तनाव से भर उठते हैं.

कथाकार ब्रजेश कानूनगो के पात्र वास्तविक जीवन के द्वंद्व,,असंतोष,असहमति,और नकार से उबलते, खीजते,छटपटाते हुए हैं. नए कथ्य, नए जीवनानुभाव, निजी अनुभूतियों, परिवेश और भौगोलिक गंधों की ईमानदार प्रस्तुतियां हैं ‘रिंगटोन’ की छोटी-बड़ी कहानियां. इनमें क्रोध कम है लेकिन शिल्प और कहने का बेहद कारगर तरीका है, जो सीधे कथ्य को दिलो-दिमाग तक पहुँचाने में सफल हो जाता है. ‘रिंगटोन’ संग्रह की कहानियों में सामाजिक विसंगतियों के विरोध में एक प्रतिरोध (प्रोटेस्ट) भी है. ब्रजेश भावुकता का सहारा नहीं लेते,विवेक और तर्क उनकी कहानियों में मौजूद दिखाई देते है. एक सजग कथाकार के रूप में हमारे सामने एक ऐसे संग्रह के जरिये आते हैं ,जिनमें रिश्तों की ऊष्मा,भावनाओं की कोमलता और मानवता के मूल्यों से हमारा साक्षात्कार होता है.

(पुस्तक- रिंगटोन (छोटी-बड़ी कहानियां) ,लेखक- ब्रजेश कानूनगो, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, बाईस गोदाम,जयपुर-302006. मूल्य-रु 100 मात्र)

रजनी रमण शर्मा
42, मिश्र नगर, इंदौर-452009
मो 9826390787   

   





Monday, April 10, 2017

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स

कविता लिखते हुए कुछ नोट्स 


1

अंधेरों के खिलाफ कवि  

अन्धकार है तो कहीं न कहीं जरूर रात घिर आई होती है। अन्धेरा क्या सचमुच इतना बुरा है? उजाले क्या हमेशा अच्छे ही होते हैं।अँधेरे के भी कुछ उजले पक्ष होते हैं,तो उजाला भी कई अंधेरों को लेकर आता है।

अँधेरा,उजाला व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकता है और समय सापेक्ष भी।तुम्हारा उजाला मेरा अँधेरा बन सकता है।उसका अंधेरा तुम्हारे लिये रौशनी लेकर आ सकता है।

कितने हैं जो दूसरों के अंधेरों में मोमबत्तियां लेकर पहुँचते है? ज्यादातर लोग किसी अन्य के इन्तजार में अपने उजालों की अय्याशी में मस्त रहते है।कोई सूरज निकलेगा और सुबह होगी तो उजियारा बिखरेगा।
अंधियारा मिटाना किसी और की जिम्मेदारी समझ हर कोई हाथ बांधे खड़ा रहता है।

विख्यात शायर जनाब राहत इंदौरी का एक शेर देखिए-

जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जायेगी।।

राहत जी का शेर दिशा देता है। कवि जुगनुओं को साथ लेकर अँधेरे की दीवार को भेदना चाहता है। इसमें सामूहिकता और कमजोर की एकजुटता की ताकत को रेखांकित किया गया है।

ये अँधेरा क्यों समाप्त करना चाहता है कवि? कहीं न कहीं इसके पीछे अँधेरे के खिलाफ प्रतिरोध की भावना समाहित है।प्रतिबद्धता और उसकी पक्षधरता के दर्शन का पता चलता है।

कवि के शब्द कविता में आकर अश्म बन जाते हैं जो भाषा और विचार की रगड़ में  छोटी सी चिंगारी का सबब बनते हैं। समाज में उजाले के संचार का वातावरण निर्मित करते हैं।

कविताओं में जब भी थोड़ी सी ऐसी चमक दिखाई देती  है, तो वह भरोसा पैदा करती है कि अभी कवि अपने काम में लगा हुआ है। लेकिन तिमिर की मजबूत दीवार भेदने के लिए ये कोशिशें नाकाफी है। जुगनू हों या मोमबत्तियां, इनको एक साथ इकट्ठा होने से ही प्रकाश का बड़ा घेरा सम्भव होता है।

जब दृष्टि धुंधला रही हो,अंधेरा घना हो तो अधिकतम उजियारे के बंदोबस्त में  कविता की रोशन मोमबत्तियां अधिकतम चाहिए।

कवि को अपने अंधेरों से खुद तो लड़ना होता ही है, साथ ही दूसरों को साथ लेकर बड़ी लड़ाई में भी भाग लेना जरूरी होता है।

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2

संवेदनाएँ कवि का ईश्वर होती हैं !

एक साहित्यिक वाट्सएप ग्रुप में 'ईश्वर' विषय पर कविता लिखने को सदस्य कवियों को कहा गया था।

'
ईश्वर' पर कविता लिखना.. ! ईश्वर को जाने बगैर। कितना जानते हैं हम ईश्वर कोईश्वर कहने को एक,लेकिन रूप अनेक। यही सुनते गुनते आये बचपन से।

किस ईश्वर पर लिखें कविताउस पर!  जो निराकार है? या उस पर जो किसी पत्थर की मूरत में पूजा जा रहा है। याकि जो कण कण में व्याप्त है।

यदि वह कण कण में, हरेक प्राणी मात्र में विद्यमान है तो क्यों दुखी है,क्यों कष्ट में है,क्यों परेशान है ईश्वर ?
तो क्या उन दुखों पर कविता लिखी जाए?
क्यों प्रताड़ित है वह, क्यों उसका शोषण है, क्यों गैर बराबरी है समाज के हरेक ईश्वर में।

ख़ुशी है जहां, वहां शायद ईश्वर बसा है। दुःख है तो ईश्वर नदारद  है। सुख दुख सब उसी की सौगात है।क्या यही भरम है। असली ईश्वर फिर है कहाँ?

ईश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान। तो फिर यह 'भगवान' कौन हुआ? रामदीन की बगीची में इस्माइल की बकरी के घुस जाने पर सब्जीयों की तरह क्यों कट जाते हैं लोग। जिनमें ईश्वर या अल्ला या दोनों बसे हैं।

कौनसा रंग ईश्वर को प्रिय है? हरा? केशरिया? सफ़ेद? जो कफ़न का भी है और समुच्चय भी है इंद्रधनुष के रंगों का। सुर्ख रंग आंसुओं का क्यों हो जाता है ईश्वर के बंदों की आँखों में। क्यों फांसी पर चढ़ जाते हैं अन्नदाता ईश्वर?

हुसैन के चित्रों में ईश्वर दीखता था किसी को। फिर भी निर्वासन का दंड भोगता है कलाकार। ईश्वर को देखने की दृष्टि ईश्वर नहीं देता। ईश्वर की कविता में जोखिम है। ईश्वर पर लिखते हुए अक्सर भजन हो जाती हैं कविताएँखतरा है यही।

कोई चाहे न चाहे कविता में  दुःख और करुणा आ ही जाएंगी । सुख होगा, खुशी होगी तो ईश्वर की कविता में वह आध्यात्मिक या दार्शनिक  हो जाएंगे।

कविता यदि सच्ची होगी फिर वह किसी भी विषय पर क्यों न लिखी गई हो, 'ईश्वर' पर हो न हो , संवेदनाओं की अभिव्यक्ति वहां जरूर होगी। संवेदनाएं कवि का असली ईश्वर होती हैं।


ब्रजेश कानूनगो
503,
गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाड़िया रोड, इंदौर-452018


Saturday, December 3, 2016

जटिलता और सरलता

जटिलता और सरलता
ब्रजेश कानूनगो

एक

साहित्य में सरलता,जटिलता का सवाल सिक्के के दो पहलुओं से निकलकर आता है. पाठक और लेखक दोनों की भूमिका इसमें विमर्श के पूरक बिंदु हो सकते हैं.
 
सन्दर्भों की जानकारी और ज्ञान के अभाव में भी पाठकों  को कोई रचना जटिल लग सकती है। इसमें न सिर्फ पाठक को अपने को तैयार करना होता है बल्कि समालोचक या टीकाकार की भूमिका भी यहां बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। कोइ भी रचनाकार जानबूझकर अपनी रचना को जटिल नहीं बनाना चाहता। उसका अभीष्ट तो सामान्यतः यही होता है कि जो कुछ वह अनुभव कर रहा है वह कलागत सौन्दर्य के साथ उसी तरह पाठक/श्रोता तक पहुंच सके। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति बन सके। अपवाद तो हर कहीं हो सकते हैं।

जीवन की जटिलताओं को सरलता से अभिव्यक्त कर देना, हरेक लेखक के लिए शायद आसान काम नहीं होता। ज्यादातर लेखक तो जीवन की जटिलताओं तक पहुंचने में ही कतरा जाते हैं. कइयों के पास अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त सरल शब्दावली ,भाषा शैली के अभाव के चलते उचित प्रयोग का भी संकट खड़ा होने की संभावना बनी रहती है।
हरेक शब्द की अपनी सत्ता और आभा मंडल होता है।सम्पूर्ण कथातत्व की अभिव्यक्ति और सही संप्रेषण और कहे गए को सही अर्थ देने के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग  रचना में सौंदर्य का कारक बनता है।इस सौंदर्य में कभी व्यंजना और लक्षणा शक्तियां उभरती हैं विशेषतौर पर व्यंग्य लेखन में। समर्थ रचनाकार शब्दों के सही इस्तेमाल से जटिल से जटिल सन्दर्भों को सरलता से पाठक के गले उतार देने में सफल होता है।
इन्ही प्रयासों में थोड़ी कमी रचना को दुरूह भी बना सकती है,लेकिन इसकी परवाह सामान्यतः अब ज्यादा की नहीं जाती। हमें छद्म साहित्य से अलग हटकर ही विचार करना चाहिए.

किसी भी रचना में पाठ के स्तर पर बाहरी और आतंरिक कईं परतें होती हैं, जिसके कारण भी जटिलता/सरलता का सवाल खड़ा हो जाता है। किसी भी वास्तु की मेक्रो और माइक्रो बनावट की तरह रचना भी ऐसे ही कई पाठों का समुच्चय होती है। पाठक का एनेलेसिस भी पढ़ते हुए मेक्रो और माइक्रो स्तर से गुजरता है. जो पाठक बाहरी परत को छूकर मजा ले लेता है उसके लिए वह रचना जटिल नहीं है. जटिल तो वह तब होती है जब वह भीतरी परत तक पहुँचने में कामयाब नहीं हो पाता. जहां सच्ची रचना की आत्मा निवास करती है.

जो मॉइक्रो तक नहीं पहुँच पाता वह जटिलता में उलझ जाता है लेकिन जैसे ही वह भीतर उतरता है, आनन्द से भर उठता है, ख़ुशी में 'मिल गया मिल गया' का नाद करता बगैर टॉवेल लपेटे आर्केमिडीज की तरह अध्ययन कक्ष से बाहर दौड़ लगा देता है। यह अनुभूति किसी साधक की आत्मा के  परमात्मा से मिलन की ख़ुशी जैसी होती है। लगता है हिमालय में भटकते हुए यकायक फूलों की घाटी में पहुँच गए हों. यह होता है रचना के असली पाठ को पा लेने का अद्भुत सुख।

०००००

दो

हालांकि अपनी किसी रचना का उदाहरण देना ठीक नहीं माना जाता है लेकिन रचना की सरलता और कठिनता पर अपनी बात स्पष्ट करने के लिए बहुत विनम्रता और संकोच के साथ अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए ऐसा कर रहा हूँ। ये कविता देखिये...

दूरियाँ
ब्रजेश कानूनगो

1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !
2
एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर
तो हम बीमार हो जाते हैं
इतने करीब हैं वे
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख.
3
शाम की सैर के बाद
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर 
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद
साथ-साथ हैं वे अभी-तक.

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देखा जाए तो इस कविता के पहले हिस्से पर ठहाका लगाया जा सकता है। वह एक चुटकुले की तरह सरल पाठ होगा। लेकिन यदि भीतर जाएँ तो वहां जो आधुनिक समाज और गृहस्थ जीवन की जटिलताएं हैं वे हमारे रोंगटे खड़े कर देने वाली हो सकती हैं।
इसी तरह दूसरे अंश में भी सब सरल महसूस किया जा सकता है, लेकिन वहां दूर बैठे बच्चों, परिजनों की चिंता में पेरेंट्स की मनोदशा, विवशता की जटिलताएं आसानी से पढ़ीं जा सकती हैं।
कविता के आखिरी हिस्से में वृद्ध दंपत्ति में से एक के दुनिया से चले जाने के बाद उत्तरजीवी का अकेलापन और स्मृति के सुन्दर अतीत को दैनिक अनुभव करना, जीवन की जटिलता ही तो है। 
यदि रचनाकार अपनी इस अनुभूति को पाठक तक पहुंचाने में सफल होता है तो रचना पाठक के लिए सरल है अन्यथा वह थोड़ी जटिल हो जायेगी।

निसंदेह टीका या समीक्षा के बाद रचना की जटिलता कम होती जाती है। यह बात साहित्य में  ईमानदार टीकाकार, समीक्षक की भूमिका को रेखांकित  करती है।

ब्रजेश कानूनगो