Saturday, August 23, 2014

चमकदार व्यंग्य-मोतियों का खज़ाना है- सूत्रों के हवाले से

पुस्तक समीक्षा
सूत्रों के हवाले से (((
चमकदार व्यंग्य-मोतियों का खज़ाना है
डॉ.सुरेन्द्र वर्मा  

कुछ सूत्र गणित में के होते हैं. कुछ ज़िंदगी के होते हैं. लेकिन कुछ सूत्र ऐसे भी होते हैं जो खोज-खबर लाते हैं. ब्रजेश कानूनगो एक व्यंग्यकार भी हैं यह मुझेसूत्रों के हवाले सेही पता चला. वैसेसूत्रों के हवाले सेब्रजेश कानूनगो का दूसरा व्यंग्य संग्रह है. इससे पहलेपुन: पधारेंआ चुका है.पुन: पधारेंशीर्षक ने ही उस सूत्र का काम किया था कि यह सम्भावनाओं से भरा लेखक अब रुकेगा नहीं. फिर से आएगा, बार बार आयेगा.
ब्रजेश जी कहते हैं, सूत्र बस सूत्र होते हैं. उनका कोई नाम नहीं होता. वे अदृश्य रहकर अपना काम करते हैं. इन्हें कोई जान नहीं पाता. न ही उनके तौर तरीके पर कोई सवाल करना संभव होता है. फिर भी इन पर विश्वास करना हमारे संस्कारों का हिस्सा है. टीवी इन्हीं सूत्रों के हवाले से हमें खबरें परोसता है. ये सूत्र ही हमारे जीवन को रसमय बना रहे हैं, ‘यह क्या छोटी-मोटी बात है!
ब्रजेश जी कपोल कल्पित बातों की खूब धज्जियां उड़ाते हैं. निष्क्रियता के मारे एक कवि महोदय ने अरसे से कुछ लिखा नहीं था. किसी ने जब उनसे पूछ लिया, कविराज बहुत दिन हो गए कहीं नज़र नहीं आए, क्या बात है आजकल कुछ छप नहीं रहा है? तो कविराज मुस्कराकर बोले, भई क्या बताऊँ, बहुत व्यस्त हूँ, इन दिनों एक उपन्यास लिख रहा हूँ! थोड़ी प्रतीक्षा तो आपको करना ही पड़ेगी. ब्रजेश जी कहते हैं, कविराज के साथ मैं भी अब अच्छी तरह जान गया हूँ कि हरेक लेखक अक्सर कभी कभी उपन्यास लिखने में क्यों इतना व्यस्त हो जाता है? (!)
यह तो सभी जानते हैं कि मौसम के लिहाज़ से हवाएं अपना रुख बदलती रहती हैं. गरमियों में हवा गर्म हो जाती है और जाड़ों में सर्द. लेकिन हवा बनाई भी तो जा सकती है. ब्रिजेश जी बताते हैं कि हवा बनाना भी एक कला है और जो लोग इस कला में माहिर होते हैं उन्हें वेहवाबाज़कहते हैं. पहले लोग हवा बनाने के लिए चौपाल या हाट-बाज़ार में मजमा लगाते थे, आज सोशल मीडिया पर हवाबाजों की आंधियां चल रही हैं. और हवाबाजों की दृष्टि के भी क्या कहने? साफ़ साफ़ देख लेते हैं कि बाज़ार में अभी किसकी हवा चल रही है और कैसे नई हवा बनाई जा सकती है.
आखिर आप अपने नेताओं से, जिन्हें आपने मतदान देकर जिताया है, यह उम्मीद ही क्यों पालते हैं कि वे आपके हितों की रक्षा करेंगे. ब्रजेश जी बताते हैं कि यह तो दान की संस्कृति के बिलकुल विरुद्ध है. जब दान ही कर दिया तो उसके फल की आकांक्षा ही व्यर्थ है. यह आकांक्षा मतदान के स्वर को भी बेसुरा बना देती है. यह तो ऐसा ही हुआ की हम गोदान के बाद ग्राही से दूध की आशा रखें. है न अटूट तर्क!
ब्रजेश जी के पास चमकदार व्यंग्य-मोतियों का अटूट खज़ाना है. राजनीति में इधर हवा बनाई गई किअच्छे दिन आने वाले हैं.लेखक की शयन कक्ष में अवस्थित पूर्व दिशा की खिड़की एक बार शायद रात को खुली रह गई. यकायक सुबह सुबह की पहली किरण और ताज़ी हवा का झोंका आया तो उसकी नींद खुल गयी. उसे लगा, अच्छे दिन की शुरूआत ऐसे ही होती है. यह बिस्तर से उठता है और अच्छे दिन की पहली दोपहर और पहली शाम से रूबरू होने जुट गया. यह बताता है कि हर रात के बाद उसका पहला अच्छा दिन हर रोज़ ही तो उसकी बाट जोहता है. बेचारेआने वाले अच्छे दिनके नारे की तो हवा ही निकल गयी.
एक बार ब्रजेश जी अपनी गाढ़ी में प्रजातंत्र की सड़क पर बड़े आराम से कैलाश खेर के सूफियाना प्रेम गीतों के रस में सराबोर होते हुए सफ़र का मज़ा ले रहे थे कि कमबख्त कुत्ते के एक पिल्ले ने सारा मज़ा किरकिरा करके रख दिया. यह तो अच्छा हुआ सामने कुत्ते का पिल्ला ही आया. बड़े शातिराना अंदाज़ में वे बताते हैं, ’खुदा न खास्ता कोई आदमी का बच्चा आगया होता तो--- हम तो सलमान ही हो गए होते’.      
कहावतें बनाने और गढ़ने में व्यंग्यकार का मुकाबला नही. क्या पताहम तो सलमान हो गए होतेकभी रवायत में आकर कहावत ही बन जाए! कहावत का ऐसा है कि वे जाने अनजाने बन ही जाती हैं. जिन कहावतों के बनने की काफी संभावना है बल्कि ब्रजेश जी के अनुसार तो वे बन ही चुकी हैं, उनके कुछ नमूने वे प्रस्तुत करते हैं – ‘राजा की निकलेगी बरात’, ‘दाढी के पीछे क्या है’, यागुस्से में नेता कागज फाड़ता है’, इत्यादि. आज तो हम इन नई कहावतों का स्रोत पहचान जाते हैं, लेकिन समय के साथ साथ इनका उद्गम धुंधलाने लगेगा. ब्रजेश जी पूछते हैं, हो सके तो ज़रा पता लगाइए, वह कौन सा ज़माना था जब राधा को सब्जी बघारने के लिए दो चम्मच तेल के इंतज़ाम में हाथ पैर नहीं मारना पड़ते थे बल्कि नौ मन तेल के अभाव में वह  नाचने से इनकार कर दिया करती थी.
ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत’, संस्कृत की एक पुरातन कहावत है. ब्रजेश जी इसकी व्याख्या कहते हुए कहते हैं, ‘कर्ज़, घी, और स्वास्थ्य के बीच बड़ा सीधा सा प्रमेय होता है जिसे सिद्ध करने के लिए किसी पायथागोरस के पास जाने की आवश्यकता नहीं है. यह स्वयं सिद्ध है. स्वास्थ्य वर्धन के लिए क़र्ज़ लेना लगभग अनिवार्य है. नागरिकों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर सरकार योजनाएं बनाती हैं. ऋण प्रदान करती हैं. योजनाओं के स्वास्थ्य के लिए भी पर्याप्त घी की व्यवस्था रखी जाती है ताकि योजनाएं अच्छे से फल-फूल सकें. देश यही चाहता है की हर नागरिक क़र्ज़ लें और स्वस्थ रहें.और हम हैं कि क़र्ज़ के नाम पर खांमखा दुबले हुए जाते हैं.
आपने चिकित्सा की अनेक विधाएं देखी होंगी. एलोपेथ, होम्योपैथ, एक्यूपंचर, स्पर्श, वाष्प, स्पर्श आदि. लेकिन ब्रजेश जी एक बिलकुल नई थेरेपी का ज़िक्र करते हैं. इसे आप चाहें तोसड़क-थेरेपीकह सकते हैं. वे कहते हैं, ‘मरीज़ पुराने कब्ज़ से परेशान हो, उसे शहर की (गड्ढों भरी) विशिष्ठ सड़क पर पांच दिन नियमित स्कूटर यात्रा के लिए परामर्श दिया जाए, छठे दिन वह स्वयं को हल्का महसूस करने लगेगा. किसी मरीज़ की प्रसूति में विलम्ब हो रहा हो और शल्य क्रिया संभव न हो तो ऑटोरिक्शा से किसी दूरस्त चिकित्सालय ले  जाएं, सामान्य प्रसूति सहल रूप से संपन्न कराई जा सकती है. कोई व्यक्ति बचपन से हकलाता हो, बोलने में शब्द गले में ही अटक जाते हों, उसे एक माह तक शहर की विशिष्ठ सड़क पर तेज़ गति से मोपेड चलाने का परामर्श दें, शब्द क्या चीत्कार निकालने लगेगी.और भी अनेक रोग हैं जिनकी चिकित्सा के लिए यह सड़क थेरेपी मुफीद हो सकती है. बसडाक्टर को थोड़ी सूझ बूझसे काम लेना होगा. शहर की खस्ताहाल सडकों पर यह एक ज़बरदस्त कटाक्ष है.
ब्रजेश कानूनगो के पास ऐसे ऐसे नुस्खे हैं कि बस पूछिए मत. वेसदाचार का टीकालगाने की सलाह देते हैं, ‘योगासन के योगबताते हैं, ‘आने जाने की रीतसमझाते हैंचिल्लर के आंसूपोंछते हैं, मूर्खता पर गर्व करना सिखाते हैं, ‘झांकी प्रबंधनके गुरु बताते है, ‘भ्रष्टाचार्य को मान्यतादिलाने का अभियान छेड़ते हैं, और भी न जाने क्या क्या ! जाइएगा नहीं, सूत्रो के हवाले से पता चला है वे दोबारा जल्दी ही आएँगे. **
(व्यंग्य संग्रहसूत्रों के हवाले से लेखक ब्रजेश कानूनगो , पार्वती प्रकाशन, इंदौर, ,प्र.)

समीक्षा- डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
10, एच आई जी / 1, सर्कुलर रोड , इलाहाबाद – 211001  

  
     


Sunday, August 17, 2014

इस गणराज्य में (कविता संग्रह) : जीवन में बसती हैं कविताएँ

समीक्षा
इस गणराज्य में (कविता संग्रह)  

जीवन में बसती हैं कविताएँ
सुरेश उपाध्याय


‘इस गणराज्य में’ अभी तक व्यंग्य लेखक के रूप में अपनी पहचान रखने वाले श्री ब्रजेश कानूनगो का पहला कविता संग्रह है, जो दखल प्रकाशन,दिल्ली से इस साल (2014) आया है। संग्रह की अधिकाँश कविताएँ पढते हुए समकालीन कविता के मूल प्रवाह में रहते हुए हमारे समय से मुठभेड होती है। संग्रह पढते हुए लगता है कि ब्रजेश का कवि उनके व्यंग्यकार से थोडा-सा आगे निकलता दिखाई देता है। वे कवि के रूप में कहीं उन्नीस नही लगते।

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्रतिबद्ध विचारधारा का दर्शन उसी पृष्ठभूमि के कारण है, जिसके कारण उनके अपने रचनाकार का भी विकास हुआ है। अखबारों में सम्पादक के नाम कई वर्षों तक पत्र और जनरुचि के कॉलमों में लगातार लिखते हुए ब्रजेश की भाषा ऐसी भाषा बन जाती है जो आम पाठक तक बहुत सहजता से पहुंचती है। बच्चों के लिए कहानियाँ और गीत लेखन के अभ्यास के कारण उनकी कविताओं को सहृदय पाठकों के मन तक पहुंच जाने में कोई खास दिक्कत नही होती। व्यंग्य लेखन का लम्बा अनुभव उनकी कविताओं में भी तंज और कटाक्ष करता नजर आता है। बैंक कर्मियों और तंग बस्ती के बच्चों तथा साहित्य और समाज के क्षेत्रों में एक प्रतिबद्ध एक्टिविस्ट की तरह काम करते रहने से उनकी कविताओं में मनुष्य के प्रति प्रगतिशील विचारधारा का अंतरधारा की तरह समावेश दिखाई देता है।

ब्रजेश की कविताओं का फलक काफी व्यापक है, अपने घर-आँगन से लेकर वैश्विक तत्व व दृश्य और तमाम चिंताओं तक वह फैला हुआ है। पत्थर की घट्टी, पुरानी लोहे की आलमारी, मेरा मुहल्ला, रेडियो की स्मृति आदि कविताओं के माध्यम से वे हमारी परम्परा और अतीत की मधुर स्मृतियों की सैर करवाते हैं वहीं मानवीय अंतर्सम्बन्धों की महत्ता को भी रेखांकित करते हैं।

गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह

कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें

न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश
आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही

स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली
कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू 

(रेडियो की स्मृति)

इस गणराज्य में आजादी,नक्शे में केलिफोर्निया खोजता पिता,मनीप्लांट की छाया,क्विज, छुप जाओ कजरी,प्लास्टिक के पेड, राष्ट्रीय शोक,ग्लोबल प्रोडक्ट जैसी कविताओं के माध्यम से आर्थिक भूमंडलीकरण और उससे उपजी बाजारवाद व उपभोक्तावादी नीतियों की जटिलताओं, समाज और पर्यावरण पर पडने वाले विपरीत प्रभाव पर व्यंग्यात्मक लेकिन सजग काव्य टिप्पणियाँ की गई हैं।
कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

वे सुझा रहे हैं कि क्या  होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ
( इस गणराज्य में आजादी)


कैसे कहूँ कि घर अपना है, बिल्लियों का रोना,जिप्सी आदि कविताओं में कीट पतंगों, छिपकलियों, तितली ,चिडिया, कुत्ते, बिल्ली आदि पशु-पक्षियों को महत्व देते हुए इको सिस्टम का महत्व भी कवि रेखांकित करता है।

जिस घर में रहता हूं
कैसे कहूं कि अपना है

चीटियां कीट पतंगे और
छिपकलियां भी रहती हैं
यहां बड़े मजों से

उधर कोने में कुछ चूहों ने
बनाया है अपना बसेरा
ट्यूब लाइट की ओट में
पल रहा है चिड़ियों का परिवार

आंगन में खिले फूलों पर
मंडराती तितलियां और भौंरे
गुनगुनाते हुए चले आते हैं
घर के अंदर तक
( कैसे कहूँ कि घर अपना है)

कुछ कविताओं में करुणा,दया, ममता जैसे मानवीय मूल्यों की खूबसूरत अभिव्यक्ति हुई है। अस्पताल की खिडकी से,भरी बरसात में बेवजह मुस्कुराती लडकी,बच्चे का चित्र, बंटी की मम्मी मायके जा रही है,व्रत करती स्त्री, मदर टेरेसा आदि कविताएँ इसी श्रेणी की हैं।
रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग के जरिये समाज की असमानता और वर्ग विभाजन को देखा जा सकता है। सम्प्रभु वर्ग किस तरह जीवन से और उसकी सच्चाइयों से बेखर बना रहना चाहता है बहुत प्रभावी रूप से इस कविता में अभिव्यक्त हुआ है।

दिखाई नही दे रही है उन्हें
नीले आकाश में उडते पक्षियों की कतार
कच्चे रास्ते पर दौडती बैलगाडी
खेतों की हरी चादर और नदी में नहाते बच्चे
पेड की छाया में सुस्ताते मजदूर
बारिश के बाद की धूप, दूर तक फैला इन्द्रधनुष
और गोधूलि में घुलता हुआ सूरज

गहरे परदों से छनकर पहुँच रही है उन तक
उजली सुबह,सुनहरी दोपहर और गुलाबी शाम

जीवन के आसपास दीवारें खडी करने के बाद
पुस्तकों में खोज रहे हैं वे
जीवन।
(रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग) 

बचपन में लौटने के लिए, मजे के साथ, आदि कविताएँ दृश्य की बेहतरी के लिए कवि की छोटी-छोटी सुन्दर आकांक्षाएँ हैं, जिसका वह मजा लेना चाहता है।

यह बहुत संतोष की बात है कि तमाम विकृतियों, विद्रूपताओं और विषमताओं के बीच ब्रजेश की काव्य दृष्टि में बेहतरी की उम्मीद और विश्वास की सकारात्मक चमक स्पष्ट नजर आती है। अंत में भूकम्प के बाद कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए-

कविता ही है जो मलबे पर खिलाती है फूल
बिछुड गए बच्चों के चेहरों पर लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नई बस्ती की हवाओं में
सिकते हुए अन्न की खुशबू

अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करती
पुस्तकों में नही
जीवन में बसती हैं कविताएँ।

 (पुस्तक- इस गणराज्य में,  कवि-ब्रजेश कानूनगो,  मूल्य- रु.100/, प्रकाशक- दखल प्रकाशन,104, नवनीति सोसायटी,प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन,पटपडगंज, दिल्ली-110092)
समीक्षक- सुरेश उपाध्याय 





Tuesday, August 12, 2014

बचपन की बरसात

बचपन की बरसात
ब्रजेश कानूनगो

जब हम छोटे थे मौसम आने पर अक्सर बारिश लगातार सप्ताह-पखवाडे चलती रहती थी। कई-कई दिनों तक सूरज के दीदार नही हो पाते थे। लम्बे इंतजार के बाद धूप छिटकने के बाद क्षेत्र के अखबारों का पहले पृष्ठ पर ही शीर्षक बन जाता था कि एक पखवाडे बाद हुए सूर्य देवता के दर्शन!’  कोई तीस-पैंतीस बरस पहले ऐसी हेड लाइन आम हुआ करती थीं अखबारों में।

पर्यावरण का संतुलन अब इस तरह गडबडा गया है कि नए बच्चों को तो शायद याद ही नही है कि कभी लम्बे समय तक बादल छाए भी रहे होंगे। उन्होने खंड वर्षा को ही देखा है। पिछले वर्ष को ही लें तो भले ही एक साथ झमाझम बरसते हुए वर्षा ने औसत से अधिक का आंकडा पर कर लिया था लेकिन वर्ष के बारह महिनों में से नौ-दस महिने में टुकडे-टुकडे पानी हर महीने बरसा ही बरसा था।

बरसात के आते ही मन जैसे भीगा-भीगा सा हो जाता है। ऐसे में मुझे अपने कच्चे-कच्चे बचपन और बरसात के दिन बहुत तीव्रता से याद आने लगते हैं। बिल्कुल अभी अभी की बात लगती है जब तेज बरसात के बाद  हमारे मुहल्ले की गली से पानी ऐसे बहता था जैसे कोई छोटी-मोटी नदी बह रही हो। उस नदी के बहने का हम बहुत बेसब्री इंतजार किया करते थे। उसका बडा दिलचस्प कारण भी हुआ करता था। हमारी गली के ठीक आगे चौराहा था और उसके आगे पहाडी का ढलान। चौराहे पर अपनी बैलगाडिय़ों से गाँव से आकर किसान ककडियों और भुट्टों की दुकान लगाते थे। अचानक जब तेज बरसात होती और पहाडी का पानी बाजार में उतरता, किसानों के ककडी-भुट्टे गली में बहने लगते। कोशिश के बाद भी कई भुट्टों-ककडियों  को बचाने में वे नाकाम ही होते थे। मुहल्ले के बच्चों के लिए नदी बन गई गली जैसे भुट्टों और ककडियों की सौगात लेकर आती। हम सब अपने जोश और आनन्द की बंसी बजाते भुट्टों-ककडियों के शिकार में जुट जाते थे।

हमारी गली के एक ओर कायस्थों के घर थे और सामनेवाली पट्टी में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे। दोनो पट्टियों के बच्चे बहती गली का भरपूर मजा लिया करते थे। सामनेवाले इस्माइल भाई  की अम्मा जिन्हे हम आपा कहा करते थे ऐसी ही बहती नदी से गुजर कर पतंग बनाना छोडकर उस रात हमारे घर आईं थीं। मेरी चाची को तेज दर्द हो रहा था, पूरे नौ माह चल रहे थे। जैसे तैसे मेरी माँ और आपा उन्हे जच्चाखाने ले गए थे। जब तक चाची अस्पताल रहीं, आपा भरी बरसात में चाची और नवजात की खिदमत में जुटीं रहीं। हम बच्चे उनकी बकरियों और पतंगों को बरसात की बौछारों से बचाते रहे। जब वे नन्हे चचेरे भाई को गोद में उठाए जाफर भाई के तांगे से घर लौटी तब बरसात तो उस वक्त थम चुकी थी लेकिन पानी की कुछ बूँदों और नमी ने जैसे आपा और हम सब की आँखों में डेरा ही डाल लिया था।  

लम्बी लम्बी चलनेवाली बारिश की तरह लम्बी ही चलती थी कानडकर बुआ की कथा। दत्तमन्दिर में पूरे चौमासा में कुछ न कुछ चला ही करता था। पन्द्रह दिन तक कानडकर बुआ रोज सबेरे कथा सुनाते थे। संगीत मय कथा-कथन और प्रवचन के बाद अंत में देश प्रेम के गीत और कीर्तन का सामूहिक गान भी हुआ करता था। स्कूल की छुट्टी होते ही बारिश में भीगते-भागते हम भी दत्त मन्दिर में पहुँच जाया करते थे। कीर्तन और देश-प्रेम गान में हमे बहुत मजा आता था। कभी-कभी जल्दी पहुँच जाते तो बुआ को कथा सुनाते भी देख लेते। वे इतने भावुक होकर अभिनय के साथ बोलते थे कि न सिर्फ उनकी बल्कि श्रोताओं,श्रद्धालुओं की आँखों से भी आँसुओं की लडी लग जाती थी। प्रंगानुसार उनकी प्रस्तुति होती थी। बाहर बारिश होती थी और भीतर बुआ संवेदनाओं की बारिश करवा दिया करते थे। सब कुछ भीग भीग जाता था। हमारा लालच तो वस्तुत: आखिर में वितरित किया जानेवाला प्रसाद होता था। अद्भुत स्वादवाले उस विशेष प्रसाद को गोपाल काळाकहते थे। जुवार की धानी को दही में मथ कर वह बनाया जाता था,जिसमें नमक,हरी मिर्च, अदरख व हरे धनिए का स्वाद समाहित होता था। दोना भर कर मिलने वाले इस प्रसाद के जायके का स्वाद आज भी जबान पर कायम है।

पत्नी बरसात होते ही भले ही अलग-अलग तरह की पकौडियाँ परोसती रहती है लेकिन मेरा मन उस दौरान स्मृतियों की झडी के बीच बचपन के उस गोपाल काळा की ख्वाहिश लिए लगातार अन्दर से भीगता रहता है।    

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इन्दौर-452018