Saturday, December 3, 2016

जटिलता और सरलता

जटिलता और सरलता
ब्रजेश कानूनगो

एक

साहित्य में सरलता,जटिलता का सवाल सिक्के के दो पहलुओं से निकलकर आता है. पाठक और लेखक दोनों की भूमिका इसमें विमर्श के पूरक बिंदु हो सकते हैं.
 
सन्दर्भों की जानकारी और ज्ञान के अभाव में भी पाठकों  को कोई रचना जटिल लग सकती है। इसमें न सिर्फ पाठक को अपने को तैयार करना होता है बल्कि समालोचक या टीकाकार की भूमिका भी यहां बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है। कोइ भी रचनाकार जानबूझकर अपनी रचना को जटिल नहीं बनाना चाहता। उसका अभीष्ट तो सामान्यतः यही होता है कि जो कुछ वह अनुभव कर रहा है वह कलागत सौन्दर्य के साथ उसी तरह पाठक/श्रोता तक पहुंच सके। उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति बन सके। अपवाद तो हर कहीं हो सकते हैं।

जीवन की जटिलताओं को सरलता से अभिव्यक्त कर देना, हरेक लेखक के लिए शायद आसान काम नहीं होता। ज्यादातर लेखक तो जीवन की जटिलताओं तक पहुंचने में ही कतरा जाते हैं. कइयों के पास अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त सरल शब्दावली ,भाषा शैली के अभाव के चलते उचित प्रयोग का भी संकट खड़ा होने की संभावना बनी रहती है।
हरेक शब्द की अपनी सत्ता और आभा मंडल होता है।सम्पूर्ण कथातत्व की अभिव्यक्ति और सही संप्रेषण और कहे गए को सही अर्थ देने के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग  रचना में सौंदर्य का कारक बनता है।इस सौंदर्य में कभी व्यंजना और लक्षणा शक्तियां उभरती हैं विशेषतौर पर व्यंग्य लेखन में। समर्थ रचनाकार शब्दों के सही इस्तेमाल से जटिल से जटिल सन्दर्भों को सरलता से पाठक के गले उतार देने में सफल होता है।
इन्ही प्रयासों में थोड़ी कमी रचना को दुरूह भी बना सकती है,लेकिन इसकी परवाह सामान्यतः अब ज्यादा की नहीं जाती। हमें छद्म साहित्य से अलग हटकर ही विचार करना चाहिए.

किसी भी रचना में पाठ के स्तर पर बाहरी और आतंरिक कईं परतें होती हैं, जिसके कारण भी जटिलता/सरलता का सवाल खड़ा हो जाता है। किसी भी वास्तु की मेक्रो और माइक्रो बनावट की तरह रचना भी ऐसे ही कई पाठों का समुच्चय होती है। पाठक का एनेलेसिस भी पढ़ते हुए मेक्रो और माइक्रो स्तर से गुजरता है. जो पाठक बाहरी परत को छूकर मजा ले लेता है उसके लिए वह रचना जटिल नहीं है. जटिल तो वह तब होती है जब वह भीतरी परत तक पहुँचने में कामयाब नहीं हो पाता. जहां सच्ची रचना की आत्मा निवास करती है.

जो मॉइक्रो तक नहीं पहुँच पाता वह जटिलता में उलझ जाता है लेकिन जैसे ही वह भीतर उतरता है, आनन्द से भर उठता है, ख़ुशी में 'मिल गया मिल गया' का नाद करता बगैर टॉवेल लपेटे आर्केमिडीज की तरह अध्ययन कक्ष से बाहर दौड़ लगा देता है। यह अनुभूति किसी साधक की आत्मा के  परमात्मा से मिलन की ख़ुशी जैसी होती है। लगता है हिमालय में भटकते हुए यकायक फूलों की घाटी में पहुँच गए हों. यह होता है रचना के असली पाठ को पा लेने का अद्भुत सुख।

०००००

दो

हालांकि अपनी किसी रचना का उदाहरण देना ठीक नहीं माना जाता है लेकिन रचना की सरलता और कठिनता पर अपनी बात स्पष्ट करने के लिए बहुत विनम्रता और संकोच के साथ अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए ऐसा कर रहा हूँ। ये कविता देखिये...

दूरियाँ
ब्रजेश कानूनगो

1
बहुत दूर थे..
इतने दूर कि
मोबाइल से बात कर रहे थे
एक पलंग के दो छोर पर थे दोनों !
2
एक छींक आती है उनको स्क्रीन पर
तो हम बीमार हो जाते हैं
इतने करीब हैं वे
जैसे लेपटॉप पर कैमरे की आँख.
3
शाम की सैर के बाद
आरामकुर्सी पर सुस्ताएंगे अभी आकर 
दाल बघारने की वही अद्भुत खुशबू
फिर बिखर जाएगी थोड़ी देर में
चौथाई सदी की दूरी के बावजूद
साथ-साथ हैं वे अभी-तक.

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देखा जाए तो इस कविता के पहले हिस्से पर ठहाका लगाया जा सकता है। वह एक चुटकुले की तरह सरल पाठ होगा। लेकिन यदि भीतर जाएँ तो वहां जो आधुनिक समाज और गृहस्थ जीवन की जटिलताएं हैं वे हमारे रोंगटे खड़े कर देने वाली हो सकती हैं।
इसी तरह दूसरे अंश में भी सब सरल महसूस किया जा सकता है, लेकिन वहां दूर बैठे बच्चों, परिजनों की चिंता में पेरेंट्स की मनोदशा, विवशता की जटिलताएं आसानी से पढ़ीं जा सकती हैं।
कविता के आखिरी हिस्से में वृद्ध दंपत्ति में से एक के दुनिया से चले जाने के बाद उत्तरजीवी का अकेलापन और स्मृति के सुन्दर अतीत को दैनिक अनुभव करना, जीवन की जटिलता ही तो है। 
यदि रचनाकार अपनी इस अनुभूति को पाठक तक पहुंचाने में सफल होता है तो रचना पाठक के लिए सरल है अन्यथा वह थोड़ी जटिल हो जायेगी।

निसंदेह टीका या समीक्षा के बाद रचना की जटिलता कम होती जाती है। यह बात साहित्य में  ईमानदार टीकाकार, समीक्षक की भूमिका को रेखांकित  करती है।

ब्रजेश कानूनगो



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