Saturday, January 14, 2012

मेरा मुहल्ला


कविता  
मेरा मुहल्ला
ब्रजेश कानूनगो

कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं

नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले

वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब

वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए

शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्‌टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना

गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा

धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र

वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।


ब्रजेश कानूनगो                                                                                                                                                                         ५०३,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-१८

7 comments:

  1. एक ऐसी रचना जो अवशेषों से रूबरू हो रही हो... स्मृतियों को याद करती...हम क्या थे, क्या हो गए !
    बुआजी, हलवाई, दर्जी आदि सभी पात्र हमसे कुछ यूँ जुड़ गए हैं, कि उनकी ताज़गी आज भी हमारे जेहन भी सुरक्षित है...

    सपने जो हमने देखे थे, हाँ पा लिया है उन्हें ... पर उनकी खुशबू कहीं गायब हो गई है... नहीं, ऐसा तो न चाहा था...
    वह उमंग, वो अल्हडपन कहाँ रहा अब..

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला ब्रजेश जी ग्‍वालियर में हमारे मोहल्‍ले में एक भाभी जी थीं जो हमारी गेंदें जब्‍त कर लिया करती थीं.. आपकी कविता ने मुझे उनकी याद दिला दी.. सुंदर रचना .. बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद,दानाजी। मेरी अनुभूति आपकी अनुभूति बन सकी यही कविता का काम है। शुक्रिया।

      Delete
  4. आपकी कविता को पढ़ कर गाओं की याद आ गई
    जब रोज़ कुछ ऐसी ही कहानियाँ हुआ करतीं थी लकिन शहर में... और वो भी आगरा में
    http://savanxxx.blogspot.in

    ReplyDelete