Friday, February 24, 2012

मुन्नाभाई का भ्रातृप्रेम


व्यंग्य
मुन्नाभाई का भ्रातृप्रेम
ब्रजेश कानूनगो

भारतीय भूत में भाई की बड़ी महत्ता रही है. भाई की खातिर भाई जान पर खेल जाया करते थे. राम को वनवास भेजने वाली सगी माँ को एक सोतेला भाई  आजीवन क्षमा नहीं कर पाता  और स्वयं राम की पादुकाएं सिंहासन पर रखकर वनवासी सा जीवन चौदह वर्षों तक व्यतीत करता है ,दूसरा अपनी नवब्याहता पत्नी को छोडकर भाई की सेवा में वन को चला जाता है. कहावत सी बन गई है कि इस युग में राम तो बहुत मिल जाएँगे लेकिन भरत और लक्ष्मण सा भाई  मिलना कठिन है.

फिल्मों में भी भाईभाई को लेकर अनेक रोचक  कहानियां आती रहीं हैं.  अलग अलग विचारधारा और चरित्र के भाई अंत में परम्परानुसार एक दूसरे के शुभचिंतक हो जाते हैं. लेकिन वास्तविक जीवन में भ्रातृप्रेम  के ऐसे सच्चे प्रसंग कभी-कभार ही देखने को मिल पाते हैं .

इसी भ्रातृप्रेम का निर्वाह करते हुए दो युवक पुलिस आरक्षक की परीक्षा देते हुए इंदौर में पकड़ लिए गए. यह हमारी  सामाजिक कमजोरी ही कहा जाएगा कि नियम कानून के तहत उनका केस बना दिया गया.  एक महान परम्परा जो साकार होने जा रही थी,एक इतिहास जो फिर अपने को दोहराने का प्रयास कर रहा था, ना-समझ निरीक्षकों की नादानी की वजह से संभव नहीं हो पाया.

बड़ा जालिम है यह ज़माना. जब-जब भाई ने भाई के लिए कुछ करना चाहा है ,तब तब फच्चर फसाया गया है. कुछ वर्ष पूर्व भी एक भाई के साथ ऐसा ही हुआ था, संयोग से वह भी पुलिसकर्मी था. उसने अपनी छुट्टी के लिए विभाग को आवेदन किया तो स्वीकृत नहीं हुई . तब अंतत: भाई ही भाई के काम आया. उसने अपने छोटे भाई  को वर्दी पहनाई और ड्यूटी पर तैनात कर दिया.   लेकिन वही हुआ , भाई का भाई से यह प्रेम जमाने की कुटिल निगाहों में आ गया.भाई पकड़ा गया और आदर्श का एक शिलालेख स्थापित होने के पहले ही खान नदी के पेंदे में पहुँच गया.
दोषी वही है जो पकड़ा जाए. ये भाई पकड़ लिए गए इस लिए अपराधी हो गए. वे अनेक लोग जो विभिन्न योजनाओं में दूसरों के हकों का लाभ ले रहे हैं,वे जो दूसरों के खेतों पर अपनी फसल काट रहे हैं, निर्दोष हैं. भाई भाई  के काम आ रहा है तो वह दोषी हो गया है.

भूल गए हैं हम अपनी परम्पराओं और अपनी महान संस्कृति को जब एक भाई दूसरे भाई की पादुकाएं सिंहासन पर रखकर राजकाज चलाया करते थे .और अब जब एक भाई वर्दी पहनकर दूसरे भाई की सहायता करना चाहता है उसे अपराधी घोषित कर दिया जाता है. परीक्षा में भाई के भले के लिए अपने ज्ञान का  मौन समर्पण करने पर उसे मुन्नाभाई जैसे  गुंडे की श्रेणी में ला खडा कर दिया जाता है.
हमारी संस्कृति रही है कि भाई भाई के काम आए.मुँह बोले भाईयों तक ने वक्त पडने पर एक दूसरे की मदद की है.    लेकिन  समय ने अब ऐसी करवट बदली है कि ऐसा आसानी से करने नहीं दिया जाता है.  यह उचित समय है जब हम भ्रातृप्रेम की महान परम्परा को बचाने के लिए विमर्श की शुरुआत कर सकते है. ज़रा सोंचिए..!
*
ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क कनाडिया रोड,इंदौर-18
मो.न.09893944294


Sunday, February 5, 2012

फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता है जहाँ कोई,समझ लेना वो डगर अदम के गाँव जाती है


फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता है जहाँ कोई,समझ लेना वो डगर अदम के गाँव जाती है
ब्रजेश कानूनगो
जन कवि अदम गोंडवी को याद करना एक मायने में उस आवाज को याद करने जैसा है जिसके शब्दों में देश के गरीबों ,मजदूरों ,किसानों और आम लोगों की पीड़ा और उनके कष्टों की गूँज सुनाई देती थी.
वे ऐसे कवि और शायर थे जिनके चले जाने के बाद उस हिन्दुस्तानी जबान का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ऐसा साहित्यकार चला गया है जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े मुश्किलजदा आदमी के संघर्षों की भाषा रही है. कविता की इस भाषा में तो जैसे उनके बाद बहुत बड़ा शून्य सा महसूस होता है.
 महलों की बुलंदी से  लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें धूमिल की विरासत को क़रीने से.

जिंदगी और मौत के बीच अनेक मुश्किलों का सामना और संघर्ष करते हुए हमारे दौर का यह महान जनकवि गत १८ दिसंबर २०११ को अपनी गजलों और कविताओं की पूंजी हमारे लिए छोडकर चला गया. अदम के जाने के बाद उस अलहदा काव्य परम्परा पर भी प्रश्न चिन्ह लगता दिखाई देता है जो दुष्यंत कुमार  के बाद रामनाथसिंह याने अदम गोंडवी ने आगे बढ़ाई थी.
काजू भुने प्लेट में,व्हिस्की गिलास में ,राम राज उतरा है आज विधायक निवास में .
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, यह बात कह रहा हूँ मै होशो हवास में.
अदमजी की समूची शख्शियत अनकी कविता के नायक के जीवन की तरह थी. सादा सा कुर्ता ,मटमैली सी धोती और गले में मफलर ,उन्हें देखकर लगता जैसे कोई किसान सीधे अपने खेतों से चला आ रहा हो. जैसे भीतर वैसे ही बाहर,एक दम रफ टफ से. वे असली धरती पुत्र थे ,लेकिन उनकी आवाज देश की आवाज बन गई थी.शायरी की गूँज देश की सीमा लांघकर पूरी दुनिया के कानों तक अपनी तरंगे पहुंचाने में कामयाब हो रही थीं. तमाम शोहरत के बावजूद वे इसका कोई निजी लाभ लेने का मानस कभी नहीं बना पाए. अपने गाँव ,अपनी मिट्टी ,अपने लोगों के मोह से सदा वे बंधे रहे,यही कारण रहा कि कभी वे समझौ़ता परस्ती के शिकार नहीं हुए. शायद यही बात थी जो उन्हें ताकत देती थी और वे बेबाक,दोटूक और सीधे सीधे अपनी खरी-खरी शायरी में अभिव्यक्त कर पाते थे.
वो जिसके हाथ में छाले हैं,पैरों में बिवाई है,उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है.
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का ,उधर लाखों में गांधीजी के चेलों की कमाई है.
 वे इस जमाने के कबीर थे. फक्कड मिजाज अदम अपनी कविताओं में भी खुरदरे दिखाई देते थे.कबीर की तरह वे अनपढ भले ही नहीं थे लेकिन उनकी प्राइमरी तक की  पढाई को आज के संदर्भों में पढ़े-लिखे के पैमाने पर भला कैसे फिट बैठाया जासकता है. उनकी शायरी में आज की स्थितियों और चालाकियों पर जो टिप्पणियाँ दिखाई देतीं हैं उनसे उनका व्यापक वैचारिक द्रष्टिकोण और विचारधारा स्पष्ट होती है. मतभेदों और साम्प्रदायिक विचारों को छोडकर अदम गरीबी के खिलाफ मिलजुलकर लड़ाई लड़ने  का आह्वान करते हैं.
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये .
अदम गोंडवी की कविता में आलोचकों को कविता के व्यंजना धर्म का अनुशासन दिखाई नहीं दिया लेकिन  उन्होने  इस बात की कभी चिंता नहीं पाली. उनकी अभिधा ,व्यंजना पर भारी पडती है.सीधे-सीधे उनकी शायरी धधकते अंगारों की तरह आक्रमण करती है. किसी तरह के  मुगालते  या संकोच का वे अवसर नहीं देते बल्कि जो कुछ कहना होता है सीधे  शब्दों में सुना देते हैं. एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखेंगे ,
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे.
महज तनख्वाह में निबटेंगे ,क्या नखरे लुगाई के,
हजारों रास्ते हैं सिन्हा साहब की कमाई के
मिसेज सिन्हा के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं,
पिछली बाढ के तोहफे हैं ये कंगन कलाई के.
अंत में एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-

मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की
आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की ?
इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की
याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की

धीमी आंच पर विचारों का परिपाक तैयार करके  गरमागरम परोसने वाले इस कवि की शायरी का विद्रोही तेवर अब हमें दिखाई नहीं दे सकेगा. व्यवस्था फिलहाल भले ही थोड़ी राहत महसूस करे लेकिन कोई आश्चर्य नहीं  होगा जब अदम गोंडवी की कविता की गूँज  प्रतिरोध के नए सुरों का आधार बनकर कविता का कोई नया और सार्थक राग बन जाए.
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर-18








Tuesday, January 31, 2012

संवेदनहीनता की ठिठुरन


व्यंग्य
संवेदनहीनता की ठिठुरन
ब्रजेश कानूनगो

एक  झांकी ने उस शहर के चेहरे से ऐसा पानी उतारा कि हर संवेदनशील बाशिंदा चुल्लूभर पानी की तलाश में छुपता छुपाता शर्म से पानी पानी हुए जा रहा है. वैसे भी  पानी के मामले में वह  शहर दूसरे शहरों की ओर याचक दृष्टि से हमेशा से देखता रहा है. लेकिन इस देखा-देखी के बावजूद यह दिन भी देखना पडेगा, ऐसा तो कभी सोंचा ही नहीं था.
राष्ट्रीय महत्त्व के आयोजन जिनमे जिले के वरिष्ट अधिकारी,मंत्री और समाज के महत्वपूर्ण लोग मौजूद हों,तब कौन नहीं चाहेगा कि कुछ ऐसा किया जाए कि उन  सबकी निगाह में आ जाएँ और अपनी  झांकी जम जाए. झांकी जमाने की तमन्ना में कोई  झाँकीबाज गणतंत्र दिवस पर नगरनिगम की ऐसी झांकी जमाकर अंतर्ध्यान हो गए कि  अब जिले का सारा अमला हलकान हुए जा रहा है. हुआ यूं है कि बूँद-बूद पानी को तरसते देवास में गत गणतंत्र दिवस पर नगर निगम ने अपनी उपलब्धियों के प्रदर्शन की आकांक्षा से एक झाँकी बनाई .उस दिन लोगों को पर्याप्त पानी मिला या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन झाँकी में लगाए गए नल से पूरे जोश के साथ पानी की मोटी धारा बह रही थी. पानी का इस तरह दिखाई देना बहुत राहत का सन्देश दे रहा था,बल्कि यह और भी संतोषजनक तब हो गया जब लोगों ने एक छोटे से बच्चे को नंग-धडंग नल के नीचे स्नान का लुत्फ़ (?) उठाते देखा. बताते है उस दिन नगर का वातावरण शीतलहर के कारण बेहद  सुहावना हो गया था और कार्यक्रम में आनेवाले  वीआयपियों को सूट और कश्मीर-लद्दाख से लाई  गई शालों,पुलोवरों को धारण करने का अवसर भी मिल गया था. कुछ मेडमों ने तो इस अवसर पर झांकियों पर ध्यान देने की बजाए स्वेटरों और शालों की डिजाइन और उनकी गुणवत्ता पर चर्चा करके कार्यक्रम की बोझिलता से अपने को बचाए रखने में सफलता भी प्राप्त कर ली.
सब कुछ ठीक ही रहता यदि नल के नीचे नहाता बालक थोड़ी सी ठण्ड सहन कर लेता. ज़रा सी देर की तो बात थी यूं भी कहाँ वह गरम पानी से नहाता होगा. नहाता भी होगा या नहीं कौन जाने .अच्छे अच्छों  को पानी नहीं मिल रहा  शहर में, तो वह कौन सा राजा भोज रहा होगा. बहरहाल किसी को यह शानदार नजारा खल गया और उसने आपत्ति का दुशाला थरथराते नन्हे बदन पर डाल दिया.
बहुत पिछड़े  परिवार के मामूली सी कोठरी में रहनेवाले बालक सनी ने मासूमियत से बताया कि एक अंकल ने  झाँकी में नहाने से पहले उसे पांच रूपए दिए थे और एक समोसा भी खिलाया था. गरीबों के लिए सोंचने वाले बिरले ही मिलते हैं. अंकल को क्या पता था कि . गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसी गरीब की मदद करना और जलसंकट से जूझते शहर में उसके लिए नहाने का इंतजाम करा देने पर इतना हो-हल्ला हो जाएगा.
यह भी एक संयोग ही है कि जहाँ हट्ठा-कट्ठा एक सनी (सनी देओल) पैसों के लिए अभिनय करते हुए हेडपंप उखाड फेंकता है वहीं  एक मासूम और कमजोर सनी को पैसे देकर अभिनय करने के लिए लालायित करा लिया जाता है.  यह अलग बात है कि बाद में वह कहता है कि झाँकी में नल के नीचे नहाते वक्त उसे 'भोत ठण्ड लग रही थी.' अब तो उसका बुखार भी उतर गया है,सर्दी खांसी भी ठीक हो गई है. लेकिन हमारे शहर का जो पानी उतर गया है उसका क्या होगा?  
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर18  

Monday, January 30, 2012

घुलती पृथ्वी


लघुकथा
घुलती पृथ्वी
ब्रजेश कानूनगो


बहूमूल्य रत्नों के व्यापारी ने अपनी बिटिया के विवाह के उपलक्ष्य में भव्य आशीर्वाद समारोह का आयोजन किया था । ऐसा लग रहा था, रत्नों की सारी चमक पांडाल में उतर आई हो।

तथाकथित बडे लोग पांडाल  के अंदर अपने भरे हुए पेटों को और भरने की असफल कोशिश कर रहे थे। बाहर कुछ छोटे लोग भव्य समारोह के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।

इन बडे और छोटे लोगों से अलग बैठा छीतू यह समझ पाने में असमर्थ था कि बडे लोगों के  आयोजन पर ये छोटे लोग नारे क्यों  लगा रहे हैं। क्या  मिलेगा उन्हे ऐसा करके , क्यों  नहीं वे नारे लगाना छोडकर पांडाल के पीछे चले आते ? कम से कम आज तो उन्हें ऐसा लजीज खाना मिल जाएगा,जिसका स्वाद कई हफ़्तों तक जुबान पर बना रहेगा।

तभी एक व्यक्ति  पांडाल के  पिछवाडे आया और बाल्टी भर खाना वहाँ उँढेल गया । इससे पहले कि छीतू के पास बैठा कुत्ता भोजन पर झपटता उसने फैंके  गए भोजन से लड्‌डू उठाकर तुरंत मुँह में रख लिया।

छीतू को लगा जैसे उसनें लड्‌डू नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी को अंपने मुँह में कैद  कर लिया हो और दुनिया भर की मिठास उसके  हलक से नीचे उतरती जा रही हो।

पांडाल के सामने  नारे बदस्तूर जारी थे। अंदर टेबलों पर पकवानों की नई प्लेटें सजाई जा रही थी। लेकिन छीतू के मुँह में कैद  पृथ्वी अब तक पूरी तरह घुल चुकी थी।

ब्रजेश कानूनगो
503 ,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-18
मो.न.09893944294