Friday, June 24, 2016

पिता जो हूँ..(मराठी)


पिता जो हूँ..(मराठी) 
शेवटी मी एक बाप.... 


कविता-1
बाल्यावस्थेत परतण्यासाठी

लेक माझी पाच वर्षाची
मी प्रयत्न करतो
तिच्यासारखाच होण्याचा
स्वतः:च्या बाल्यावस्थेत परतण्यासाठी.

मनोरंजन पार्कमध्ये
वाऱ्याच्या तालावर नाचणाऱ्या होडीत बसून
कडू लिंबाच्या झाडाची
सर्वात उंच डहाळी हाताने पकडून
लहान मुलांच्या आगगाडीतल्या
शेवटल्या डब्यात खिदळायचं आहे मला.

तीच नेहमीची लवकर घरी येण्याची तंबी
डोळ्यांची उघडझाप करणाऱ्या सोनेरी केसांच्या बाहुलीसाठी हट्ट
आणि त्यातच
दारा आड लपून
वाघासारखी डरकाळी फोडून
भिववायचं आहे आपलंच आपल्याला.
चिमुकल्या हातांच्या आधाराने
लोम्बकळायचे आहे मला
माझ्याच खांद्यांवर.

मूळ कविता- ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद ---- अलकनंदा साने

०००००


कविता-2
टेलीफोनची घंटा
वाजतो आहे  फोन शेजारच़्या घरात
मुलाचा फोन असेल कदाचित

बायकोने टी व्ही चा आवाज बंद करुन
गैस वरुन प्रेशर कुकर उतरविला आहे
कान भींतीकडे लावले आहे
आत्ता  कुणीतरी येईल
देईल पचमढीहून फोन आल्याची बातमी
.
शेजाऱ्या कडे आज.
दाराला कुलूप आहे
आणि मुलाचा आवाज
जणू  घुमत  आहे
बंद घरात.
मूळ कविता ब्रजेश  कानूनगो
अनुवाद      ऱंजना मराठे , इंदौर

०००००
कविता-3
कोडं
ते होते
मी होतो
सर्व काही होतं

ते होते
मी होतो
सर्व वेग वेगळे

मी नव्हतो त्यामध्ये
माझ्यामध्ये ते नव्हते
आता मी आहे
ते आता नव्हे

वाचून दाखवतो पत्नीला
कुमार अम्बुज यांच्या कविता
ऐकवतात ते नईमचे नव गीत
धर्मयुगच्या एका अंकातून 

अरे मी आहे
ते पण आहे,

त्यांचासारखा मी
माझ्यासारखे ते
सर्व काही पूर्वीसारखे.

मूळ कविता-ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद प्रयास मिलिंद खटावकर, हैदराबाद

०००००

कविता-4 
नकाशात कैलिफोर्निया शोधणारा बाप

चाळीस अक्षांश व
एकशे दहा रेखांशामधे
इथे जवळच आहे
हो हो इथेच आहे
कैलिफोर्निया
किती जवळ वाटतोय ह्या नकाशात !

फोन आला होता लेकीचा
छत्तीस तास उलटले तेव्हा
फार लांब आहे हो बाबा
कैलिफोर्निया!

इथेच कुठे,इंधन भरायला
उतरले असेल विमान
एकटीनेच काढले
पाच तास! पोरीने!

या जागेवर बदलायचे होते तिला विमान
बरंय, एकच बैग नेली तिने
तसे सामानाची बदली करायला
एयरवेजचे कर्मचारी उपलब्ध असतीलच.

बघावे जरा कसे आहे
हवामान कैलिफोर्नियाचे
पाऊस किती पडतो
हिवाळ्यामधे कितपत जाते येथील
किमान  तापमान!
या भागाला समुद्री वारे वाहतात केव्हा
उन्हाळ्यात इकडची जमीन तापत असते का!
कुणास ठाऊक ऋतु तरी असतात का कैलिफोर्नियात!

कोणची पिकं घेत असावे
शेतकरी येथील शेतांमध्ये
गहू ,तांदुळ मिळतच असतील तिकडच्या बाजारांमध्ये
.
मला प्रकर्षाने आठवली होती
दहावीत शिकलेली कविता
'
खडतर आयुष्यात किती कष्ट'
जणू लाडकी लेक म्हणत आहे
नकाशाच्या रेघांवर फिरत असताना
एका बापाचा हात
पोरीच्या मस्तकाला पोहोचत आहे.

मूळ हिन्दी कविता   ब्रजेश कानूनगो
मराठी अनुवाद प्रयास  रविन्द्र भालेराव., भोपाळ

०००००


कविता-5
निरागस मूल चित्र काढतंय

स्वत:त मग्न लहान मूल चित्र
काढतंय..
इतकं गुंग त्यात
की ध्वनिक्षेपकाच्या भसाडया गोंगाटानं
ते विचलित नाही

कुठल्यातरी तीर्थक्षेत्रीं चेंगराचेंगरीत किती मेले,
वित्त मंत्रालयानं कितीजणांवर
टाच आणली,..
खासदार समर्थन मागे घेतील नी कोसळेल सरकार
हे त्याच्या गावीं नाही.

घटना आणि दुर्घटनांपासून बेखबर मूल चित्र काढतंय
रेखाटतंय एक नदी, कदाचित तलावही असेल..

एक होडी, हळूहळू वल्हवणारा नावाडी पण आहे..
किना-यावर चितारलीये एक झोपडी आणि कौलारातून
बाहेर पडतोय धूर..
हवेत दरवळतोय शिजणा-या
अन्नाचा सुवास...

चित्रात उगवलंय एक खजुराचं झाड,स्वछंद पाखरं उडताहेत
अर्धाच सूर्य!बहुदा अडकलाय टेकड्यांत कुठंतरी...

जरा इकडे बघा बरं!
काहीं माणसं कुदळ फावडी घेऊन कुठं निघालियेत..
कदाचित सूर्याला बाहेर काढतील..

टेकड्या खोदता खोदता सहज
चढतील खजुराच्या झाडावर
आणि उधळण करतील जमिनीवर मिठ्ठास दाणे..

लहान निरागस मूल चित्र काढतंय..
जगाच्या कागदावर आकार घेणा-या जीवनाच्या चित्रागत..

मूळ कविता--ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद प्रयास--अनुराधा जामदार, भोपाळ


०००००
मूल कविताएँ- ब्रजेश कानूनगो
प्रस्तुति- स्वरांगी साने (वाट्सएप समूह- माय मावशी)  
सम्पादन- अलकनंदा साने



Saturday, June 18, 2016

पिता जो हूँ.....

पिता जो हूँ.....
ब्रजेश कानूनगो

कविता-1
बचपन में लौटने के लिए

पाँच बरस की अपनी बेटी बन जाना चाहता हूँ मै

मनोरंजन पार्क की हवा में लहराती नाव में बैठकर
नीम की सबसे ऊँची पत्ती को छूकर
खिलौना रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे से
चहकना चाहता हूँ

जल्दी घर लौटनें की हिदायत और
आँखें झपकाती
सुनहरे बालों वाली गुड़िया की फरमाइश के बाद
दरवाजे की ओट में छुपकर
शेर की परिचित आवाज से
डरा लेना चाहता हूँ स्वयं को

झूल जाना चाहता हूँ अपने ही कंधों पर
नन्हीं बाहों के सहारे।

०००००


कविता-2
टेलीफोन की घंटी 1998

पडोसी के घर में बज रही है घंटी
शायद बेटे का फोन होगा

टीवी की आवाज धीमी कर दी है पत्नी ने
प्रेशर कुकर उतार लिया है गैस पर से
कान दीवारों से सट गए हैं
अभी कोई कहेगा-
फोन आया है पचमढी से

पडोसी के घर पर
पडा है आज ताला
और बन्द घर में गूँज रही है
बेटे की आवाज ।

०००००


कविता-3  
पहेली

वे थे
मैं था
सब था

वे थे वे
मैं मैं था
सब था अलग अलग

उनमें नहीं था मैं
मुझमें तो कतई
नहीं होते थे वे

अब मैं हूँ
नहीं हैं वे

पढ़कर सुनाता हूँ पत्नी को
कुमार अम्बुज की कविताएँ
सुनाने लगते हैं वे
धर्मयुग से नईम के नवगीत

ओह! मैं हूँ
वे भी हैं

उनके जैसा मैं
मेरे जैसे वे
सब कुछ पहले जैसा.

०००००    



कविता-4
नक्शे में कैलिफोर्निया खोजता पिता

चालीस डिग्री अक्षांश और
एक सौ दस डिग्री देशांतर के बीच में
यहाँ इधर,थोडा हटकर,बस यहीं
यही है कैलिफोर्निया
ज्यादा दूर तो दिखाई नही देता नक्षे में!

उडने के छत्तीस घंटे बाद
फोन किया था बेटी ने
बहुत दूर है कैलिफोर्निया

ईंधन लेने के लिए
यहाँ उतरा होगा विमान
बेटी ने बिताए होंगे
पाँच घंटे अकेले

यहाँ से बदलना पडता है विमान
एक बैग भर ही तो था पास में
सामान तो शिफ्ट कर ही देते होंगे एयरवेज वाले

जरा देखें तो
कैसी है जलवायु कैलिफोर्निया की
बारिश होती है यहाँ कितनी
कितना रहता है सर्दियों में
न्यूनतम तापमान

समुद्री हवाएँ कब बहती हैं इस ओर
तपती तो होगी गर्मियों में धरती
मौसम होते भी हैं या नही
कैलिफोर्निया में

कौनसी फसलें बोते हैं कैलिफोर्निया के किसान
मिल ही जाता होगा बाजार में
गेहूँ और चावल

‘जितने कष्ट कंटकों में है...’
दसवीं कक्षा में पढी कविता की अनुगूंज में
घुल रही है बेटी की आवाज
नक्षे की रेखाओं से होता हुआ
पहुँच रहा है पिता का हाथ
बेटी के माथे तक !

०००००



कविता-5
बच्चे का चित्र

अपने में ही डूबा नन्हा बच्चा बना रहा है एक चित्र

इतना तल्लीन है कि
स्पीकरों पर चीख रही चौपाइयाँ
बाधा नही डाल रही उसके काम में

उसे कोई मतलब नहीं है इससे कि
कितने मारे गए तीर्थ स्थल की भगदड में
और कितनों को घोंप दिया गया है छुरा
वित्त मंत्रालय द्वारा
उसे पता नहीं है
कब अपना समर्थन वापिस ले लेंगे सांसद
और कब गिर जाएगी सरकार

घटनाओं और दुर्घटनाओं से बेखबर बच्चा
बना रहा है कोई नदी,
झील भी हो सकती है शायद
एक नाव – जिसे खै रहा है कोई धीरे-धीरे
किनारे पर बनाई है एक झोपडी
जिसकी खपरैल से निकल रहा धुँआ
महसूस की जा सकती है हवा में
सिके हुए अन्न की खुशबू 

खजूर का एक पेड उगा है चित्र में
उड रहे हैं कुछ पक्षी स्वच्छंद
अटक गया है शायद आधा सूरज पहाडियों के बीच 

देखिए जरा इधर तो
निकल पडे हैं कुछ लोग कुदाली फावडा लिए
निकाल लाएँगे अब शायद सूरज को बाहर
पहाडियों को खोदते हुए
चढ जाएँगे खजूर के पेड के ऊपर
और बिखेर देंगे धरती पर मिठास के दाने

नन्हा बच्चा बना रहा है चित्र
जैसे बनती है जीवन की तस्वीर
दुनिया के कागज पर.


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड,इंदौर -452 018





Friday, May 27, 2016

डायरी मई 2016

डायरी
मई 2016

1

वो ठंडा अन्धेरा
मन का क्या है। पंख लगे होते हैं उसके। आज उड़ते उड़ते जा बैठा 45 बरस पहले के अपने घर की छत के कंगूरे पर। दो मंजिले मकान की छत पर लकड़ी की बल्लियां लगी थीं जिन्हें जुपीए कहते थेजिसके ऊपर मिटटी की तह बिछाई गई थी। फिर थोडे ऊपर टीन की चद्दरें ठोंकी हुई थीं।
नीचे मने ग्राउंड फ्लोर पर अगला कमरा बैठक खाना और उसके बाद एक अँधेरा कोठार जिसमे केवल एक दरवाजा। कोई खिड़की नहीं। हवा का कोई आवागमन नहीं। इसमें गुड़ समेत खजाना सा भरा होता था। कुछ बोतलों में गार का पानी ऐसे सहेजा हुआ था जैसे अमृत रखा हो।मुहल्ले में यदा कदा चम्मच भर कोई मांगने आ जाता था। बर्नियों में बहुत ख़ास अचार रखा,कोठार को महकाता रहता था।

गर्मियों में कोठार की ज़रा सी जगह में दादी बोरी बिछा कर दोपहर की नींद निकालती। वहां उनके बगल में जैसे शिमला बसी थी।
और मई जून की दोपहर में बैठक खाने के दरवाजे की दरार से धधकती सड़क से कुल्फी के ठेले की चमक और परछाइयों का प्रवेश चलचित्र की रौशनी सा दीवारों पर गुजरता था। कोई कूलर या पंखा नहीं था।

आज कांक्रीट के इस स्वर्ग में ये क्यों आ रहा है याद !! वह कुमार गन्धर्व की नगरी का संगीत सम्राट रज्जब अली खां मार्ग का एक मकान भर नहीं था। सभी दुखों का समाधान करता एक घर था हमारा।
(5 मई 2016)

०००००

2

मैं डूबन डरा !
जो बोरन डूबन डरा रहा किनारे बैठ। बहुत हद तक मुझ पर ठीक बैठती है यह उक्ति। सिंहस्थ के दौरान उज्जैन की क्षिप्रा नदी में नर्मदा जल में जब लाखों लोग डुबकियां लगा रहे हैंमुझे अकस्मात मोदी जी की बावड़ी याद आ रही है।

अनुपम मिश्र की ख्यात पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाबमें चित्रकार दिलीप चिंचालकर के रेखांकनों के साथ साथ जिन बावड़ियों और चोपडों के चित्र हैं उसी खूबसूरती का नमूना थी मोदी जी की बावड़ी। थोड़ी ही दूर पर एक शानदार वास्तुशिल्प वाला चोपड़ा भी था उनका। पास ही खेत था और थोड़ा आगे देवास का श्मशान।
डर मेरा दो तरह का था। एक तो बावड़ी और चोपड़ा श्मशान स्थल के बिलकुल निकट थे। दूसरे बड़े दादा जी परिवार के बच्चों को सुबह सुबह अपने मित्र मोदी जी की बावड़ी में तैरना सीखाने ले जाते थे।  गर्मियों की छुट्टियों में रिटायर्ड कलेक्टर साहब का अनुशासन हम बच्चों पर खूब चलता था। मैं थोडा पढ़ाकू किस्म का बच्चा था और परियों से लेकर भूत प्रेत तक की सभी कहानियां पढ़ डालता था। मैं नवाब बनना चाहता था ,परीक्षाओं में अव्वल आता थाइस लिए ज्यादा खेलकूद कर खराब नहीं बनना चाहता था। उन दिनों प्रचलित भी यही था कि 'पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाबखेलोगे कूदोगे बनोगे खराब' 
बहरहाल,  दादा जी हम बच्चों को घेर घारकर मोदी जी की बावड़ी पर ले जाते सुबह सुबह। पजामों के सिरों को बाँध देते और हवा में फूले हुए इन सुरक्षा गुब्बारों सहित हमें बावड़ी के पानी में हाथ-पैर मारने को फैंक देते।
हुआ यह कि मैं राजा बाबू किस्म का लाडला बच्चा ' जीजी जीजीकहकर घर भाग आता ,और जीजी के दुलार में ऐसा गुम हो जाता कि कलेक्टर साहब मेरे अलावा सबको तैराकी सिखा गए।
जो उस वक्त तैरना सीख गए वे गोते लगा रहे हैं।मैंने तो पर्यटन अवकाश सुविधा के अंतर्गत हरिद्वार तक में गंगा का पानी लोटे में भरकर सिर पर उंढेल लिया था।  अब सिंहस्थ में साधुओं के स्नान की तस्वीरें देखकर ही खुश हो रहा हूँ। पानी में उतरने में अब भी मुझे डर लगता है। किनारे पर बैठा रह गया हूँ। कितना अच्छा होता उस वक्त डरता नहीं। तैर जाता ये भव सागर।  
(18 मई 2016)

०००००


3

मई का महीना
आज 27 मई है। देश के प्रथम प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि। कोई सात/आठ साल का बच्चा था मैं। अब याद करता हूँ तो एक चित्र खिंच आता है।
मई माह हमारे परिवार में कुछ अलग महत्त्व और संयोगों से भरा रहा है। 21 मई को मेरी बेटी का जन्म हुआ,संयोग से व्यंग्यकार शरद जोशी के जन्म वाले दिन। 11 मई को चाचाजी का विवाह,चचेरी बहन का जन्म और इससे पूर्व 11 मई 64 को मेरे दादा जी का निधन हुआ था। याने 11 मई को हमारे यहां जन्म,मृत्यु और विवाह जैसे प्रसंग हुए हैं।
दादाजी के निधन के कारण घर में शोक चल रहा था।उन दिनों रेडियो मनोरंजन के अलावा विश्वस्त समाचारों का बहुत सुलभ और लोकप्रिय माध्यम हुआ करता था।मगर वह घर में शोक के चलते खामोश था। लेकिन 27 मई को जैसे ही पंडितजी के निधन का समाचार आया।पूरे देश में सचमुच शोक की लहर फ़ैल गई। राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई।
उसी दिन हमारे घर का खामोश रेडियो फिर रो पड़ा। बापू के प्रिय भजन गा रहीं थी मशहूर आवाजें और सारंगियां रो रहीं थीं। नेहरू हीरो थे हमारे।लोग नेहरू जी के बारे मेंउनकी अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार के सीधे प्रसारण को भरे हृदय से सुन रहे थे।
सच तो यह था की सात साल के बच्चे की नजर के सामने कोई राजनैतिक चकाचौध नहीं थी। प्रधान मंत्री याने देश का सच्चा हितैषी और लोक प्रधान के रूप में दिलों दिमाग में स्थापित एक पालक। परिवार में एक दादा का निधन हुआ था और देश ने अपना पिता खो दिया था।
कोरा कागज था मेरा मन। श्रद्धांजलि चाचा नेहरू को।
(27 मई 2016) 

०००००