Tuesday, January 31, 2012

संवेदनहीनता की ठिठुरन


व्यंग्य
संवेदनहीनता की ठिठुरन
ब्रजेश कानूनगो

एक  झांकी ने उस शहर के चेहरे से ऐसा पानी उतारा कि हर संवेदनशील बाशिंदा चुल्लूभर पानी की तलाश में छुपता छुपाता शर्म से पानी पानी हुए जा रहा है. वैसे भी  पानी के मामले में वह  शहर दूसरे शहरों की ओर याचक दृष्टि से हमेशा से देखता रहा है. लेकिन इस देखा-देखी के बावजूद यह दिन भी देखना पडेगा, ऐसा तो कभी सोंचा ही नहीं था.
राष्ट्रीय महत्त्व के आयोजन जिनमे जिले के वरिष्ट अधिकारी,मंत्री और समाज के महत्वपूर्ण लोग मौजूद हों,तब कौन नहीं चाहेगा कि कुछ ऐसा किया जाए कि उन  सबकी निगाह में आ जाएँ और अपनी  झांकी जम जाए. झांकी जमाने की तमन्ना में कोई  झाँकीबाज गणतंत्र दिवस पर नगरनिगम की ऐसी झांकी जमाकर अंतर्ध्यान हो गए कि  अब जिले का सारा अमला हलकान हुए जा रहा है. हुआ यूं है कि बूँद-बूद पानी को तरसते देवास में गत गणतंत्र दिवस पर नगर निगम ने अपनी उपलब्धियों के प्रदर्शन की आकांक्षा से एक झाँकी बनाई .उस दिन लोगों को पर्याप्त पानी मिला या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन झाँकी में लगाए गए नल से पूरे जोश के साथ पानी की मोटी धारा बह रही थी. पानी का इस तरह दिखाई देना बहुत राहत का सन्देश दे रहा था,बल्कि यह और भी संतोषजनक तब हो गया जब लोगों ने एक छोटे से बच्चे को नंग-धडंग नल के नीचे स्नान का लुत्फ़ (?) उठाते देखा. बताते है उस दिन नगर का वातावरण शीतलहर के कारण बेहद  सुहावना हो गया था और कार्यक्रम में आनेवाले  वीआयपियों को सूट और कश्मीर-लद्दाख से लाई  गई शालों,पुलोवरों को धारण करने का अवसर भी मिल गया था. कुछ मेडमों ने तो इस अवसर पर झांकियों पर ध्यान देने की बजाए स्वेटरों और शालों की डिजाइन और उनकी गुणवत्ता पर चर्चा करके कार्यक्रम की बोझिलता से अपने को बचाए रखने में सफलता भी प्राप्त कर ली.
सब कुछ ठीक ही रहता यदि नल के नीचे नहाता बालक थोड़ी सी ठण्ड सहन कर लेता. ज़रा सी देर की तो बात थी यूं भी कहाँ वह गरम पानी से नहाता होगा. नहाता भी होगा या नहीं कौन जाने .अच्छे अच्छों  को पानी नहीं मिल रहा  शहर में, तो वह कौन सा राजा भोज रहा होगा. बहरहाल किसी को यह शानदार नजारा खल गया और उसने आपत्ति का दुशाला थरथराते नन्हे बदन पर डाल दिया.
बहुत पिछड़े  परिवार के मामूली सी कोठरी में रहनेवाले बालक सनी ने मासूमियत से बताया कि एक अंकल ने  झाँकी में नहाने से पहले उसे पांच रूपए दिए थे और एक समोसा भी खिलाया था. गरीबों के लिए सोंचने वाले बिरले ही मिलते हैं. अंकल को क्या पता था कि . गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसी गरीब की मदद करना और जलसंकट से जूझते शहर में उसके लिए नहाने का इंतजाम करा देने पर इतना हो-हल्ला हो जाएगा.
यह भी एक संयोग ही है कि जहाँ हट्ठा-कट्ठा एक सनी (सनी देओल) पैसों के लिए अभिनय करते हुए हेडपंप उखाड फेंकता है वहीं  एक मासूम और कमजोर सनी को पैसे देकर अभिनय करने के लिए लालायित करा लिया जाता है.  यह अलग बात है कि बाद में वह कहता है कि झाँकी में नल के नीचे नहाते वक्त उसे 'भोत ठण्ड लग रही थी.' अब तो उसका बुखार भी उतर गया है,सर्दी खांसी भी ठीक हो गई है. लेकिन हमारे शहर का जो पानी उतर गया है उसका क्या होगा?  
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर18  

Monday, January 30, 2012

घुलती पृथ्वी


लघुकथा
घुलती पृथ्वी
ब्रजेश कानूनगो


बहूमूल्य रत्नों के व्यापारी ने अपनी बिटिया के विवाह के उपलक्ष्य में भव्य आशीर्वाद समारोह का आयोजन किया था । ऐसा लग रहा था, रत्नों की सारी चमक पांडाल में उतर आई हो।

तथाकथित बडे लोग पांडाल  के अंदर अपने भरे हुए पेटों को और भरने की असफल कोशिश कर रहे थे। बाहर कुछ छोटे लोग भव्य समारोह के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।

इन बडे और छोटे लोगों से अलग बैठा छीतू यह समझ पाने में असमर्थ था कि बडे लोगों के  आयोजन पर ये छोटे लोग नारे क्यों  लगा रहे हैं। क्या  मिलेगा उन्हे ऐसा करके , क्यों  नहीं वे नारे लगाना छोडकर पांडाल के पीछे चले आते ? कम से कम आज तो उन्हें ऐसा लजीज खाना मिल जाएगा,जिसका स्वाद कई हफ़्तों तक जुबान पर बना रहेगा।

तभी एक व्यक्ति  पांडाल के  पिछवाडे आया और बाल्टी भर खाना वहाँ उँढेल गया । इससे पहले कि छीतू के पास बैठा कुत्ता भोजन पर झपटता उसने फैंके  गए भोजन से लड्‌डू उठाकर तुरंत मुँह में रख लिया।

छीतू को लगा जैसे उसनें लड्‌डू नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी को अंपने मुँह में कैद  कर लिया हो और दुनिया भर की मिठास उसके  हलक से नीचे उतरती जा रही हो।

पांडाल के सामने  नारे बदस्तूर जारी थे। अंदर टेबलों पर पकवानों की नई प्लेटें सजाई जा रही थी। लेकिन छीतू के मुँह में कैद  पृथ्वी अब तक पूरी तरह घुल चुकी थी।

ब्रजेश कानूनगो
503 ,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-18
मो.न.09893944294   

Wednesday, January 25, 2012

इस गणराज्य में आजादी

कविता
इस गणराज्य में आजादी 


एक

कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

वे सुझा रहे हैं कि क्या  होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ

दो
 
बर्गर और पिज्जा बेचने वाली
नईबहुराष्ट्रीय दुकान का विज्ञापन देखकर
उछल पडता है बच्चा
जैसे मिल गई आजादी
दुनिया भर के  भोजन को चबा डालने की

अभिव्यक्ति की आजादी का  मतलब है
दो वक्त की रोटी से मंहंगी कलम से
कर्ज के  दस्तावेज और पुरस्कार के चेकों पर
दस्तखतों का फिसलना

सबसे आगे रहने के  लिए
बाधाओं को छलांगते हुए दौड जाने की आजादी मिलती है
थकान और पसीने से बचानेवाले
बहुमूल्य जूतों के चयन के बाद

आजादी के लिए उपवास की बात
अब किताबों से हटा दी गर्ईं हैं
गर्व से ऊपर उठता है मस्तक
सनसनाते पेय के  हलक से उतरते ही

उत्साह और उमंग के  बाजारी जश्न में
बेडियों के  विस्तार को मिल गई है आजादी


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,
कनाडिया रोड,इंदौर-18 

Saturday, January 14, 2012

मेरा मुहल्ला


कविता  
मेरा मुहल्ला
ब्रजेश कानूनगो

कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं

नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले

वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब

वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए

शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्‌टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना

गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा

धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र

वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।


ब्रजेश कानूनगो                                                                                                                                                                         ५०३,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-१८

Saturday, December 24, 2011

ग्लोबल प्रोडक्ट


कविता
ग्लोबल प्रोडक्ट
ब्रजेश कानूनगो


जाने कौन-सी तरंगे पहुँच रहीं हैं
और करती हैं एक्टिवेट उसे
निकलती रहती है लगातार
वॉइस आफ़ अमेरिका उसके मुख से

अपनी भाषा भी बोलता है कभी-कभी
लेकिन ऐसा लगता है जैसे
अभी-अभी आया कोई कोलम्बस
कोशिश कर रहा है बात करने की
हमारी  भाषा में

उसके बच्चे नहीं पहनते
कुर्ता,सलवार ,अचकन या चूडीदार
पहनावे से पता ही नहीं चलता
कि किस जलवायु का बाशिंदा है
डिजाइनर कपड़ों पर चिपकी
प्रसिद्ध मार्का की छोटी-सी कतरन
घोषित करती है कि वह
बाजार युग का ग्लोबल प्रोडक्ट है

भरा होता है उसका बटुआ
जादुई कार्डों की बहुमूल्य संपदा से
दुनिया खरीद लेने का विश्वास
चमकता है उसके चहरे पर

सरकारी करेंसी भी थोड़ी-बहुत होती है उसके पास
सत्कार,घूस और डोनेशन में
बड़ी सहूलियत रहती है इससे
और फिर देवालय के बाहर और भीतर
क्रेडिट कार्ड से पुण्य खरीदना
आसान नहीं हुआ है अभी 
  
बहुत पहले से छोड़ दिया है उसने
दकियानूसी पारंपरिक भोजन करना
फास्ट फ़ूड और बर्गर मिटाते है उसकी भूख
बहुराष्ट्रीय कंपनी के
प्रमाणित साफ्ट ड्रिंक से
बुझाता है अपनी प्यास को

बड़ा ही स्मार्ट है वह
जबानी याद है उसे सचिन के शतकों का आँकड़ा
और संवेदनशील इतना कि
शेयर मार्केट की तनिक-सी घट-बढ़ से
बढ़ जाती है उसके दिल की धडकन

यह बड़ा अच्छा है कि
कारखानों से निकाले गए मजदूरों का दुःख
नहीं करता उसे स्पंदित
जहर पीकर आत्म हत्या करनेवाले
किसानों की संख्या में व्यर्थ नहीं जाती उसकी मेमोरी
बाँध से प्रभावित विस्थापितों की पीड़ा
प्रभावित नहीं करती उसकी आत्मा को

विकास के इस महत्वपूर्ण समय में
और कई वर्जन आने हैं अभी
इस ग्लोबल प्रोडक्ट के .
 

ब्रजेश कानूनगो
503 ,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड ,इंदौर-18

Thursday, December 15, 2011

समकालीन समाज में रचनाशीलता की चुनौतियाँ

जीवनशाला,विसर्जन आश्रम में दि.१४ दिसंबर २०११ को युवा श्रोताओं को संबोधन

 व्याख्यान
समकालीन समाज में रचनाशीलता की चुनौतियाँ
श्रेष्ठ लेखन ऐसा लक्ष्य है जो पास पहुँचने पर दूर जाकर खड़ा हो जाता है
ब्रजेश कानूनगो

अनेक स्कूली छात्र और युवाओ का  अपने विचारों को अभिव्यक्त  कर   रचनात्मक लेखन करने की ओर रुझान होता है. मुझसे कई बार ऐसे बच्चे लिखने के गुर जानने के लिए पत्र लिखते हैं . मार्गदर्शन देने का न तो मेरे पास पर्याप्त अनुभव है और न ही मैं सृजन  के उस दौर में पहुंच गया हूँ कि ऐसे लोगों को लेखन का कोई रामबाण नुस्खा सुझा सकूँ. मैं स्वयं लेखन को एक छात्र की तरह स्वीकार करता रहा हूँ और जो कुछ मैंने समझा और अनुभव किया है उसे ही यहाँ विनम्रता पूर्वक प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूँ.
जो कुछ आज छपा हुआ या सुना हुआ सब-कुछ हमारे सामने है हम उसकी बात नहींकर रहे. वह चाहे पत्रिकाओं में मुद्रित हो कर आया हो अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से परोसा गया हो ,छद्म साहित्य या छद्म सृजन या तथाकथित रिमिक्स भी हमारी बातचीत का विषय नहीं हो सकता. दरअसल हम उस गंभीर लेखन की बात करना चाहते हैं ,जिसमें मनुष्य के दुःख दर्द और उसके सरोकारों से जूझने और चिंताओं पर विमर्श दिखाई देता है. समाज में जो लोग इस प्रकार के लेखन और साहित्य में गंभीरता से संलग्न हैं, हम समकालीन समाज मे उनकी रचनाशीलता और उनकी चुनौतियों की बात  यहाँ करना चाहते हैं.   

समकालीन समाज वस्तुत: आज है क्या ?कौनसे  घटक हमारे आज के समाज को प्रभावित कर रहे हैं?बाज़ार वाद और वैश्वीकरण के इस समय में हम एक  उपभोक्तावादी समाज में बदल दिए गए हैं जहाँ  सब कुछ बेच डालने के प्रयास किए जा रहे हैं.
जो कभी हमारे मूल्य होते थे ,वे अब संसकारों में शामिल है.ईमानदारी,सदाचार,सच्चाई अब केवल शब्दभर रह गए  हैं .स्वार्थ्य सर्वोपरि हो गया है.शार्टकट में सफलता,सुख ,और ऐश्वर्य की आकांक्षा ने हमें बेहद अधीर और असवेदंशील बना डाला है. हमारी भाषा भूषा, भोजन, हमारी संस्कृति ,जीवनशैली, सब कुछ इस परिवर्तन कीचपेट में आ चुका है. ग़लत के लिए सामूहिक सहमति के लिए जो भी जायज नाजायज हो सकता है,करने में कोई गुरेज दिखाई नहीं होता.

भारतीय दर्शन के उस महान सूत्र की ओर मैं आपका ध्यान ले जाना चाहूँगा,जिसमे कहा गया है कि स्वयं को पहचानो. मै कौन हूँ? मै क्या हूँ? हर व्यक्ति को सबसे पहले विश्लेषण करना चाहिए. अपनी खूबियों और कमजोरियों को पहचानना चाहिए।   प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व  सकारात्मक तथा ऋणात्मक बिंदुओं से मिलकर बनाता है.  अपने अंदर के ऐसे सकारात्मक बिंदुओं को पहचानकर उनको यदि और विकसित किया जाए तो हमारी रचनात्मकता को बढ़ावा अवश्य मिलता है . मान लीजिए हम में किसी बात को लेकर तुरंत प्रतिक्रया व्यक्त करने का प्राकृतिक स्वभाव है . लेकिन हम इस गुण का कोई उपयोग ही नहीं कर पा रहे तो वह किस काम का होगा.  यदि हम अपने इसी स्वभाव को रचनात्मक रूप देते हुए किसी अखबार के संपादक को पत्र ही लिख दें तो अधिक सार्थक होगा. अंतत: कोई भी बात उचित समय पर उचित स्थान पर कही जाए तो उसका कोई मतलब भी होगा. मान लीजिए मुझे सिनेमा देखने का बहुत शौक है ,लेकिन यह मेरी कमजोरी ही होगा यदि मैं अपने पिता की पेंशन से मल्टीप्लेक्स के महंगे टिकट को खरीद कर अपना शौक पूरा करता हूँ. लेकिन यही कमजोरी मेरी खूबी भी बन सकती है यदि मैं थोड़ा प्रयास करके फिल्म देखने को उसकी  समीक्षा करने के उद्देश्य पर केंद्रित कर दूं. कोशिश करूँ कि सिनेमा के हर पक्ष पर अपनी रचनात्मक टिप्पणी दूँ . यह भी हो सकता है कि मेरा लेखन धीरे धीरे मंटो के मीनाबाजार की तरह  लोगों को उद्वेलित कर सके.
महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने आपको किस तरह पहचान पाते हैं और उसे एक सही दिशा में मोड देने में सफल हो पाते हैं.  लोग कहते हैं कि 'उनके मुँह से फूल झरते हैं' .रजनीश जब बोलते थे तो एक प्रभा मंडल सा छा जाता था,एक आध्यात्मिक सम्मोहन वातावरण को अपने अंदर समेंट लेता था. रजनीश ने
अपनी इसी खूबी को पहचाना ,उनका विज्ञान का छात्र होना इसमे उनका सहायक रहा. विश्लेषण करने का यही गुण संसार को अनेक पुस्तकें उपलब्ध करा गया. इसीप्रकार प्रसिद्ध व्यन्ग्यकार शरद जोशी जब बोलते थे  उनकी बातचीत में चुटकियाँ और हास्य का पुट हमेशा बना रहता था ,हर बात को वे अपनी विशिष्ठ व्यंग्य दृष्टि से तपासते,टटोलते. वे आप से बात कर रहे होते तो लगता जैसे व्यंग्य कर रहे हों. अपने एसी स्वभाव को उन्होंने रचनात्मक दिशा दी और प्रतिदिन व्यंग्य लेखन करने का ऐतिहासिक कार्य किया .

इसके बाद जो हम लिखना चाहते हैं उसे कितना समझते हैं . कहानी  लिखना चाहते है तो कहानी के बारे में कितना जानते हैं. प्रेमचंद से लेकर कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी से लेकर उदयप्रकाश तक कहानी में कितने प्रयोग हुए हैं,कहानी ने किस तरह अपना स्वरूप बदला है. समकालीन कहानी के कौनसे तत्व हैं जिनके कारण वे जानी जाती हैं.  मुझे याद है जब मैं दसवी ,ग्यारहवीं का छात्र था ,एक पत्रिका 'सारिका' का संपादन कमलेश्वर किया करते थे. उन्होंने उन दिनों समानांतर कहानी आंदोलन चला रखा था.आज के  अनेक प्रतिष्ठित कहानी कार उसी आंदोलन की महत्वपूर्ण देन  हैं. समाज के कमजोर ,शोषित और दलित वर्ग को लेकर अनेक कहानियाँ लिखीं गईं हैं. सारिका की कहानियों को पढकर  वैसे ही लेखन को लक्ष्य करके लिखने का प्रयास करता लेकिन रचनाएँ लौट आतीं थीं. आज भी लौट आतीं हैं. लेकिन सारिका को लक्ष्य करके लिखी रचनाओं को पढकर मुझे दुःख नहीं होता क्योंकि  जब हम लक्ष्य श्रेष्ठ रखते हैं तो भले ही वहाँ तक नहीं जा सकें किन्तु उनका स्तर  घटिया नहीं हो पाता. उसकी सार्थकता बनी रहती है. कोशिश हमेशा स्तरीय ही होना चाहिए.

कविता लिख रहे हैं तो भक्तिकाल से लेकर समकालीन कवियों तक के सृजन पर नजर डालनी ही होगी. यह देखना होगा कि कुमार अम्बुज या राजेश जोशी जैसे कवि आज महत्वपूर्ण क्यों माने जाते हैं. रचनाकार के समकालीन सरोकार क्या हैं? हमें किसके पक्ष में खडा होना है. हमारी दृष्टि बिलकुल साफ़ एवं पूर्णत: वैज्ञानिक होना चाहिए.

आगे बात अभिव्यक्ति की करे तो यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है जब हम कुछ कहना चाहते हैं लेकिन बात उस तक पहुच  ही नहीं रही जिस तक उसे पहुंचाना है. यहाँ हमारी भाषा और विधा का चयन के बिंदु सामने होते हैं. शब्दों के चयन और उसकी क्षमता ,उसकी ध्वनि,आतंरिक ( बिम्ब) और प्रत्यक्ष दोनों, को सही रूप में चुनकर उनका इस्तेमाल कैसे किया जाए,इसे भी समझना चाहिए. सही शब्द का चयन और उसका उचित प्रयोग अभिव्यक्ति को बहुत प्रभावी बनाने की क्षमता रखता है. शरद जोशी  ने अपनी एक रचना में सिर्फ 'बोफोर्स' शब्द का प्रयोग अनेक बार इस तरह किया कि बीच में वे श्रोताओं से पूछते थे  कि रचना आपको किसी लग रही है तो श्रोता भी बरबस बोल उठते थे बोफोर्स लग रही है.  एशियाड के समय उनकी एक रचना का शीर्षक ही था-'अय्याशियाड' . मै समझता हूँ,सम्पूर्ण रचना में कितनी जान रही होगी. जब  शीर्षक ही इतना व्यंग्यात्मक प्रभाव पैदा कर रहा है.

रचनाकार को अपनी एक ऐसी भाषा विकसित  करने की चुनौती हमेशा सामने होती है जो उसके पाठक तक पहुंच सके.  किसी ने पूछा था कि आपके मध्य प्रदेश में व्यंग्य इतने अधिक क्यों लिखे जा रहे हैं .तब शरद जी ने जवाब दिया था-हमारी भाषा समन्वय है,हिन्दी,उर्दू और क्षेत्रीय बोलियों की. यही भाषा है यहाँ के लोगों की. यही भाषा है व्यंग्यकार की. व्यंग्य लेखक कोई भी खरी बात जब अपनी भाषा में कहता तो वह अनायास व्यंग्य बन जाता है. निसंदेह हमें एक ऐसी भाषा चाहिए जिसमे संस्कृत सा माधुर्य हो,उर्दू सी नजाकत और अपनापन हो और क्षेत्रीय बोलियों की सहजता हो,प्रवाह हो,यही वह भाषा होगी जो सामान्य पाठकों को आकर्षित करती है साथ ही रचना को पठनीय भी बनाती है.

अंतत: समग्र रूप से यही कहा जा सकता है कि अच्छे लेखन के लिए गंभीर रचनाकार सदैव लंबी दौड लगाते रहने के लिए  उद्यत बना रहता है. जिसमे उसके  अपने तथा समकालीन समाज के  परिवेश और स्थितियों के साथ साथ भाषा,,शिल्प,कथ्य और संप्रेषणीयता  की चुनौतियाँ तो होती ही हैं लेकिन विचारधारा,प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बनाए रखना भी गंभीर लेखन की महत्वपूर्ण चुनौती रहती है. सच तो यह है कि श्रेष्ठ लेखन एक ऐसा लक्ष्य होता है जिसके लगभग पास पहुँच जाने के बाद वह और थोड़ा दूर जा कर खडा हो जाता है.

ब्रजेश कानूनगो
503  ,गोयल रीजेंसी ,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर-18