Saturday, May 28, 2011

जनता का मन जीतना जरूरी जैतापुर में




जनता का मन जीतना जरूरी जैतापुर में

ब्रजेश कानूनगो

विडम्बना है कि जिस वक्त पूरा संसार भयावह चेर्नोबिल परमाणु हादसे की 25 वीं बरसी पर शोक मनाते हुए ईश्वर से घटना की पुनरावृत्ति न होने की कामना कर रहा था उसी वक्त भारत सरकार घोषणा कर रही थी कि जैतापुर परियोजना रुकेगी नही। सरकार ने आश्वासन दिया कि परियोजना का हरेक रिएक्टर स्वतंत्र रूप से सुरक्षित होगा तथा परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में पूरी पारदर्शिता रखी जाएगी,इसके लिए संसद में स्वायत्त परमाणु नियमन प्राधिकरण बनाने हेतु एक विधेयक भी लाया जाएगा।
महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के जैतापुर में प्रस्तावित यह संयत्र दुनिया के सबसे बड़े संयंत्रों मे से एक होगा तथा परमाणु विघटन और विकिरण से यहाँ न सिर्फ़ स्थानीय लोगों पर खतरा मंडरा रहा है बल्कि एक बड़े दायरे में आने वाले जनजीवन एवं पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़गा। जिससे बचा जाना बहुत संदिग्ध दिखाई दे रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं वैज्ञानिक डॉ़ विवेक मोंटेरो का कहना है कि जापान के फुकुशिमा के हादसे से सबक लेकर भारत सरकार को अपनी परमाणु ऊर्जा नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। आरोप तो यहाँ तक है कि वैश्विक परमाणु सप्लायरों के दबावों के तहत सरकार जैतापुर परियोजना पर अंड़ी हुई है। महाराष्ट्र सरकार भले ही केन्द्र को आश्वस्त कर रही हो कि स्थानीय नागरिकों के संदेह को दूर करके उन्हे मना लिया जाएगा किंतु परमाणु संयंत्रों की स्थापना के समय तक तो यह ठीक लगता है परंतु भविष्य में होनेवाले हादसों और मनुष्यों पर उनके  प्रभाव नहीँ पड्ने की गारंटी लेने के लिए शायद ही कोई तैयार दिखता हो। 1945 के हिरोशिमा-नागासाकी तथा 1986 के चेर्नोबिल हादसे के बाद जापान और यूक्रेन (सोवियतसंघ) सरकारों ने भविष्य के  लिए सावधानी और सुरक्षा उपाय अवश्य सोंचे होंगे लेकिन फुकुशिमा फिर हमारे सामने है। फुकुशिमा से फैले  विकिरण से पूरी दुनिया सकते में आ गई है। एक बार फिर विकिरण के प्रभाव के कारण बरसों तक नारकीय जीवन की भयानक आशंका से लोगों की साँसें थम गर्ईं हैं। जापान के हालात देखते हुए अनेक देशों ने अपने परमाणु कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं।
परमाणु प्रोजेक्टोँ से प्रभावित लोगों के कल्याण एवं शांति के लिए कार्य करनेवाले संगठन के  क्रिय कार्यकर्ता अनिल चौधरी तो बिजली उत्पादन के लिए परमाणु परियोजना की आवश्यकता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। विकिरण के खतरों के साथ-साथ योजना की लागत और उसकी वैज्ञानिकता पर भी सोंचें तो जैतापुर मे प्रोजेक्ट  लाना नितांत अविवेकपूर्ण कहा जाना चाहिए । बिजली संयंत्र में टर्बाईन चलाने हेतु केव 600 युनिट ऊष्मा की जरूरत होती है किंतु परमाणु विघटन से लगभग 20000 से अधिक युनिट ऊर्जा पैदा होती है। 600 युनिट के  स्तर तक वापिस लाने के लिए शीतलीकरण हेतु कई गैलन पानी की वश्यकता पड़ती है। अमूल्य पानी की ऐसी बरबादी क्या उचित होगी जबकि टर्बाईन चलाने हेतु आवश्यक 600 युनिट ऊष्मा के लिए अन्य कई विकल्प सहज उपलब्ध हैं। संयंत्र की स्थापना में जितना खर्च आता है उससे कई गुना अधिक विपरीत परिस्थितियों मे उसके समापन, उससे मुक्त होने मेँ होता है। क्या उस स्थिति की आवश्यकताओं के लिए अपनी क्षमताओं पर सरकार ने पूरी तरह विचार कर लिया है? चेर्नोबिल के समय वहां इतनी तैयारी और साधन थे कि एक एटमबम से निकलने वाले विकिरण से सौ गुना ज्यादा प्रभावी प्रकोप से लड़ पाए। लेकिन हम इस संदर्भ में पूरी तरह अभी आश्वस्त नही हो सकते।
आणविक प्रदूषण अन्य प्रदूषणों से बहुत अलग है। धूल,धुँआ ,कचरा आदि दिखाई देते हैं,इनके प्रभाव के लक्षण हमें महसूस होते हैं लेकिन परमाणु विकिरण निराकार है इसे महसूस नहीं किया जा सकता।यह प्रवेश करता है और युगों तक बना रहता है।मानव जींस में पहुँचकर आनुवँशिक रोगों के रूप में परिवर्तित हो कर अनेक पी़ढियों की त्रासदी बन जाता है। लगभग अमरता का वरदान प्राप्त परमाणु कचरा अपने ही निर्माता को नष्ट करने पर उतारू हो जाता है। मनुष्य और उसके जीवन से परमाणु कचरा अपने ही निर्माता को नष्ट करने पर उतारू हो जाता है। मनुष्य और उसके जीवन से जुड़ी हरेक वस्तु को विकिरण प्रभावित करके मुश्किलें पैदा कर देता है। कचरे का प्रबंधन इतना कठिन होता है कि स्टील के कनटेनरों में बंद कर सीमेंटीकरण करके जमीन में गाड़ देने के बावजूद विकिरण होना जारी रहता है। रिपोर्टों के अनुसार चेर्नोबिल में32 लोगों की मौत हादसे के  समय हुई थी लेकिन 6 लाख लोग रेडिएशन के  शिकार हुए थे।  4 हजार लोग कैसर जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त होकर असमय दुनिया छोड़ गए।
हम सहज सोच सकते हैं कि हमारे पास इस भस्मासुर से मुक्ति के कितने कारगर साधन और हिम्मत है। भोपाल के यूनियन कार्बाइड परिसर में फैले घातक रासायनिक कचरे को हटाने की सुस्पष्ट योजना हम अभी तक बना नहीं पाए हैं। घटना के इतने वर्षों बाद भी हाईकोर्ट सरकार से स्पष्टीकरण के लिए निर्देशित करने को बाध्य हो रही है।
जैतापुर में परमाणु परियोजना को लेकर अब समर्थन और विरोध की राजनीति के स्वर भी सुनाई देने लगें हैं। सच तो यह है कि परियोजना के लिए जनता का मन जीतना जरूरी होगा। कहीं खोट दिखाई देती है तो मन तो टूटेगा ही।जरा ध्यान रहे इस बात का।

ब्रजेश कानूनगो
503,
गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क
कनाडिया रोड ,इंदौर-18

Sunday, May 1, 2011

विसंगतियों से उड जाती है उनकी नींद




विसंगतियों से उड जाती है उनकी नींद

ब्रजेश कानूनगो

मोहल्ले के उस सूने मकान में बरसों बाद मैंने रोशनी देखी तो थोडी जिज्ञासा हुई। दस बरस पहले मेरे मित्र साधुरामजी वहाँ रहा करते थे। देश- विदेश,समाज-संस्कृति और व्यवस्था की विसंगतियों को लेकर अक्सर हम चर्चा करते थे। कभी सहमत होते तो कभी असहमत लेकिन हमारी दोस्ती मे कभी कोई दूरी नही आई। प्रतिभा पलायन की पिछली बाढ में जब उनका बेटा बह गया तो मजबूरन साधुरामजी को भी अमेरिका जाना पडा।
पहले अक्सर साधुरामजी सुबह-सुबह अखबार हाथ में थामें किसी खबर से उत्तेजित मेरे घर चले आते थे लेकिन अबकी बार बरसों बाद उनके घर रोशनी देखकर मै ही वहाँ पहुँचा।मुझे देखते ही वे उठ खडे हुए और मुस्कुराते हुए गले लगा लिया। वे वही साधुरामजी थे,चेहरे की चमक जरूर थोडी कम हो गई थी बाकी सब पहले जैसा ही था।
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क्या बात है साधुरामजी अंमेरिका रास नही आया,लौट आये।' मैने बातचीत को आगे बढाने की गरज से पूछ लिया।
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सोचा तो था बेटे के पास रहूँगा, अमेरिका को जानूँगा समझूँगा समय निकल जायेगा और बेटे बहू को भी मेरा विश्वास रहेगा।लेकिन यह मेरा भ्रम ही था। यहाँ अपने देश और अपने लोगों की बात ही वुत्र्छ और है, मैं लौट आया।' वे बोले। मैने उनके चेहरे की चमक में आई कमी का राज जान लिया था।
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लेकिन साधुरामजी आप अपने देश और शहर में भले ही लौट आए हैं लेकिन आपके आने के पहले ही अमेरिका यहाँ आ चुका है। दस सालों मे वही सब यहाँ है जो वहाँ है।' मैने कहा।
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तुम भौतिक और आर्थिक पक्ष की बात कर रहे हो,मै मानवीय और भावनात्मक संदर्भों मे कह रहा हूँ कि हमारे यहाँ अभी भी मूल्यों का महत्व बचा हुआ है।' वे बोले।
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साधुरामजी,आप आज ही लौटे हैं,वहाँ अमेरिका के मीडिया में भारत की खबरें य-कदा ही देखने -पढने को मिलती होंगी,अब जब आप यहाँ के अखबार पढेंगें तब आपको पता चलेगा।'मैंने कहा।
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हाँ,मैने अंखबार वाले को बोल दिया है,काफी नए अखबार आ गये हैं अब तो। बडा बदलाव आया है अपने शहर मे।अच्छा लगता है देखकर। आते हुए देख रहा था,बडे सुन्दर चौराहे बने हैं। सडकेँ  भी चौडी हो गर्ईं हैं।' वे बोले।
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हाँ, इसी रास्ते और चौराहों से गुजरकर ही तो आ रहा है अमेरिका। प्लास्टिक के पेड लगे हैं,शापिंगमॉल बने हैं,मल्टिप्लेक्स सिनेमा शुरू हुए हैं। ' मैंने उनकी जानकारी में वृद्धि करते हुए कहा। ' तुम नही बदले अभी तक,अपने मतलब से बात को घुमा देते हो। मै भौतिक बदलाव की बात नही कर रहा,मानसिक परिवर्तन की बात कर रहा हूँ। विकास देखकर मन को शान्ति मिलती है।' साधुरामजी बोले।
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मै भी वही बात कर रहा हूँ,इस विकास के बाद लोगों की मानसिकता में ही परिवर्तन आया है। छोटे दुकानदार, ठेलागाडी चलाकर अपनी रोजी कमानेवालों गरीबों की आमदनी में कमी आई है। दिन भर पसीना बहाकर दो पैसे कमानेवालों की बजाए लोग शापिंग मॉलों से सामान खरीद लाते हैं।' मैं थोडा उत्तेजित हो गया।
साधुरामजी ने पानी का गिलास मेरी और बढा दिया,बोले-'अंरे बैठो तो सही, इत्मिनान से बातें करेंगें-यह बताओ और क्या समाचार हैं इधर के '
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समाचार क्या हैं साधुरामजी, जिन मानवीय मूल्यों की आप बात करते हैं,अब उन्हीं पर विश्वास नहीं होता।पतन ऐसा हुआ है कि बेटी अब्बा का कत्ल करने को मजबूर है। सास नई नवेली बहू के टुकडे कर डालती है। छुटभैये गुंडे पुलिस थानों का घेराव कर लेते हैं।चौराहे पर स्कूल  बस में आग लगा दी जाती है,लेकिन हम लोग किसी सच्चे नेता और सही आन्दोलन की प्रतिक्षा करते रह जाते हैं।' मैने सौफे  पर बैठते हुए कहा।
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हाँ, सुना है मैने । यहाँ वेत्र् नेताओं ने तो बस अंपने जन्मदिन मनवाने और बडे बडे होर्डिंग लगवाने को ही आंदोलन समझ रखा है।' साधुरामजी ने अंपनी आँखों को थोडा सा फैलाते हुए कहा।
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नहीं ऐसा नही है,राजनीति का भी यह एक प्रकार से आधुनिकीकरण है। अब नेतागण बेचारे अपने क्षेत्रों मे कब तक घूमेंगे और नागरिको से मिलेंगे।समय की बचत की दृष्टि से चौराहों पर तस्वीरें टाँगकर ज्यादा से ज्यादा लोगों की नजरों में बने रहने का प्रयास करना क्या कम है।' मैने समझाने की कोशिश की।
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और नही तो क्या ,ईश्वर भी तो केलेंडरोँ और चित्रों के जरिए लोगों के दिलों में बसतें हैं।   'अबकी बार साधुरामजी की चुटकी से मैं भौचक्क रह गया। सामान्यतः वे नेताओं का मजाक नहीं बनाते।
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क्या बात कही साधुरामजी आपनें।' मैने उनके हाथ पर हाथ मारते हुए कहा।'चलिए अब आप आ ही गये हैं,मैं भी वैचारिक बहस को तरस गया था। मित्र तो बहुत हैं लेकिन सबको राष्ट्र और अपने विकास की इतनी हडबडी है कि विचार कोई नहीं करना चाहता।स्वार्थपूर्ति के लिए लक्ष्य बनते हैं और काम आगे बढ जाता है। चाहे दफ्तरों में कम्प्यूटरीकरण की बात हो या शहर के विकास का मास्टर प्लान,सभी जगह हडकंप  मचा हुआ है। मोबाइल घनघना रहे हैं लेकिन मन की बात कोई नही सुनता। ' मैंने अंपनी निराशा व्यवस्र्त की और घर लौट आया।
मुझे मालूम था साधुरामजी रातभर सो नहीं पाए होंगे। मुझे खुशी है कि वे लौट आए हैं। ऐसे लोगों की हमें अभी बहुत जरूरत है,बेहूदगियों और विसंगतियों को देखकर जिनकी नींद उड जाती हो।


ब्रजेश कानूनगो

 

Wednesday, April 27, 2011

बोल्ड और बिंदास मूल्य



बोल्ड और बिंदास मूल्य

ब्रजेश कानूनगो

वित्त मंत्रालय के मुख्य सलाहकार कौशिक बसु ने सुझाव दिया है कि कानून में परिवर्तन किया जाए तथा जायज कार्य के लिए दी जाने वाली रिश्वत को मजबूरीवश दबाव में किया गया कार्य मानकर रिश्वत देनेवाले को अपराधी न माना जाए। कुछ दिनों पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने भी टिप्पणी की थी कि देश में बिना रिश्वत दिए कुछ नहीं होता। अन्ना हजारे ने आंदोलन किया कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए कड़ा कानून बनाया जाए लेकिन उनके संघर्ष के जहाज में छेद करने के अभी से प्रयास शुरू हो चुकेँ हैं, मुझे शक है कि भ्रष्टाचार के महासागर से अन्ना के साथीयोँ को बेईमान मछलियों का शिकार करने में कामयाब होने दिया जाएगा । हमारे तंत्र मे भ्रष्टाचार इस तरह घुल मिल गया है कि अब इसको अलग करना अत्यंत कठिन है। बुखार यदि उतर ही नही रहा हो तो शरीर की तपन का लाभ लेते हुए रोटियाँ सेंक लेनी चाहिए। जिस बात से मुक्ति संभव न हो उसको अपना लेने में ही समझदारी है। भ्रष्टाचार को अब नैतिक मूल्य मानकर सामाजिक और प्रशासनिक मान्यता प्रदान कर देने में कोई बुराई दिखाई नही देती।
यों भी हमारे परंपरागत नैतिक मूल्यों का आज के समय में क्या औचित्य रह गया है। यदि हम कहें कि यह 'सत्य' है,यह 'सच्चाई' है तो वह क्या सचमुच सत्य या सच्चाई होगी। अब सच वह है जो कोई पॉलीग्राफर झूठ पकड़ने वाली मशीन से खोजे। सत्य वह है जो असत्य के कैनवास पर चित्रित हो। सत्य वह झूठ है जो पकड़ा न जा सके । सत्य वह है जो स्टिंग आपरेशन से उजागर हो । सत्य वह झूठी सीडी है जिसके साथ छेड़छाड़ की गई हो। सत्य झूठ के आकर्षक रैपर में लिपटी चाकलेट है,जो मधुर है। सत्य कभी कड़वा भी हुआ करता था किन्तु कड़वे सच पर आज स्वार्थ और मनोरंजन की चाशनी चढ़ा दी जाती है।
हमारे नैतिक मूल्य आचरण नहीं सिर्फ शब्द भर रह गए हैं। ईमानदारी को आचरण में अपनाने वाला क्या सचमुच सम्मान का पात्र रह जाता है? अगर कुछ थोड़ी बहुत ईमानदारी दिखाई देती है तो वह तथाकथित अवैध कारोबारों मे ही नजर आती है। बेईमानी के समुद्र में ईमानदारी की मछलियाँ बड़ी शान से तैर रहीं हैं। कोई यह कहकर आपको सीमेंट बेच रहा है कि वह विकास प्राधिकरण अथवा पीडब्ल्यूडी की है तो वह सौ प्रतिशत वहीं से उठाई गई होगी। कन्नोद से कूरवाई ट्रांसफर करवाने के लिए मंत्रीजी के चमचे ने पचास हजार लिए हैं तो निश्चित ही वह हो जाएगा।टैक्स बचाना चाहते हैं, मूल्य चुकाएँ,सामनें वाला नैतिक मूल्य का पालन करेगा और आपका काम हो जाएगा। बेईमानी के बसंत मे सूरजमुखी के फुल जरूर खिलते हैं।
पुस्तक बाजार की किसी गुमटी पर कल की परीक्षा के प्रश्नपत्रों की प्रतियाँ बेची जा रहीं हैं तो वे कल परीक्षा हॉल में परिक्षार्थियों को निश्चित वितरित की जाएँगी। सब कुछ व्यवस्थित है। गुमटीवाला ईमानदारी से असली माल बेचता है। देखने समझनेवाले पूरी ईमानदारी से अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। राडिया हो या राजा सबने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है। हुआ सिर्फ इतना है कि नए कानून के आने से पहले, रिश्वत को वैधानिक मान्यता मिलने के पहले पुरातन मूल्यों के प्रकाश में उनकी कारगुजारियाँ मीडिया के सामने आ गर्ईं।
प्रगति का दूसरा नाम परिवर्तन होता है। विकास के इस महत्वपूर्ण समय में नैतिकता,ईमानदारी,सच्चाई,सदाचार,सज्जनता, शालीनता जैसे मूल्य पुराने और कालातीत प्रतीत होते जा रहे हैं। नए बिन्दास और बोल्ड मूल्यों को मान्यता देने के लिए विचार करने का शायद यह सही वक्त होगा। कौशिक बसु के सुझावों से भी आगे बढ़कर अब सोचा जाना चाहिए। आगे आपकी मर्जी।
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी ,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड ,इंदौर-18

Friday, April 15, 2011

चूहाकरण




चूहाकरण
ब्रजेश कानूनगो

अमिताभ बच्चन अपनी आवाज का पेटेंट करवाकर भले ही निश्चिंत हो जाएँ किं कोई व्यक्ति उनकी आवाज की नकल नहीं कर सकेगा किंतु जरा सचिए कोई चूहा उनकी आवाज में मेरे अँगने मेँ गाकर उनकी कमाई में सैंध लगा देगा तब वे क्या कर सकेंगें। ऐसा ही कुछ संभव कंर दिखाया है जापान के जीव वैज्ञानिकों ने। उन्होनें ऐसा चूहा विकसित कर दिखाया है जो चिडिया की तरह चहचाता है। वैज्ञानिकों का दावा है किं इससे मानवीय भाषाओं तथा उच्चारण के बारे में जानकारियाँ प्राप्त हो सकेगीं। इस बात में कोई शक नही है कि चूहा न सिर्फ़ गाएगा बल्कि मनुष्य की तरह बोल भी सकेगा ।
दरअसल चूहा बड़ा विलक्षण जीव होता है। दिखने में भले ही वह छोटा सा प्राणी है लेकिन जब -जब अवसर मिला है उसने अपनी शक्ति तथा प्रतिभा दिखाई है। एक कहानी आपने जरूर सुनी होगी- एक तीन माह का हाथी और तीन माह का चूहा मिले तो हाथी ने अपनी उम्र बताई,तब चूहा बोला- हूँ तो मै भी तीन माह का ही लेकिन इन दिनों तनिक अस्वस्थ हूँ।' चूहे के संवाद से शातिरता टपकती दिखाई देती है। चूहा ताकतवर होनें के साथ-साथ चतुर भी होता है। ताकत और चतुराई का समन्वय प्रतिभा कहलाती है।दिखना और होना अलग-अलग बातें हैं । जो दिखता है वह होता नहीं,जो होता है वह दिखता नहीं।अरे साला चूहा कहीं का' कहना अपने अर्थ बदल चुका है।चूहा होना डरपोक होने की उपमा नहीं है चूहा होना ,महाबली होने का,चतुर होने का,प्रतिभा संपन्न होने का परिचायक है। जो चूहा है वह कुतर सकता है। भारतीय चूहों ने डेनमार्क के मजबूत प्रमाणित कैबल कुतर डाले,पाठ्य पुस्तकं निगम की पुस्तकें वुᆬतर डालीं, खेतों और गोदामों मे रखा अनाज वुᆬतर डाला दपत्तरों की अनेक महत्वपूर्ण फाइलों को वुᆬतर कर अनेक महत्पूर्ण मामलो का सहज समापन कर दिया। चूहों को कुतरने का काफी अच्छा अभ्यास होता है । अंडरवर्ल्ड की तरह चूहों का अपना अलग साम्राज्य होता है। ईस्ट इंडिया कपनी की तरह साम्राज्य में वृद्धि करना इनका प्राथमिक लक्ष्य रहता है। इसी उक्तेश्य से इनकी गुपचुप घुसपेठ आतंकिंयों केए तरह सदैव चलती रहती है। फिर इनका साम्राज्य इस कदर बढ़ जाता है कि फिर उनसे मुक्ति के लिए संघर्ष किसी स्वतंत्रता आंदोलन से कंम नहीं हो सकता । चूहे सदा से मनुष्यों के प्रेरणा स्रोत्र रहे हैं। समझदार लोगों ने उनसे पर्याप्त प्रेरणा ली है। अपने हित के लिए चतुरता और कुतरने का कौशल, मनुष्य नें चूहों से ही सीखा है। चूहों के अनुयायी, पुल कुतर रहे हैं ,सड़कें कुतर रहे हैं, सरकारी संपत्ति कुतर रहे हैं, खजाना कुतर रहे हैं समुचे राष्ट्र के हर हिस्से को ये चूहे वुᆬतर जाना चाहते हैं। चूहों से प्रेरित कुतरणकला के लिए एक खुला विश्वविद्यालय देश में संचालित है जो विशिष्ठ क्षेत्रों में कुतरन के संदर्भ में डिग्रियाँ बाँट रहा है। स्थिति तो यह है कि कुतरन विषय भी अब केवल बेसिक अथवा प्लेन नहीं रहा है,वहाँ भी इसका विशेषज्ञीकरण हो गया है। उदाहरणार्थ- जैसे तकनीकी कुतरन-२जी स्पेक्ट्रम, कामनवैल्थ गेम्स याने स्पोर्टिक कुतरन, सत्यम याने आई टी कुतरन, हाउसिंग याने वित्तीय कुतरन, तेलगी याने राजस्व कुतरन,आदर्श याने शहीदी कुतरन, चारा, अनाज ,जमीन, तहलका और न जाने कौन-कौन से नए-नए विषयों मे लोग विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं। पूछवाले चूहों को समाप्त करने के लिए सरकारें पुरस्कार देतीं रहीं हैं,चूहा मुक्ति के लिए करोडों की राशि आबंटित हुई लेकिन बगैर पूछवाले डिग्रीधारी मूषकों ने उसे भी कुतर डाला । मनुष्यों के इस चूहाकरण पर कैसे रोक लगे, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकंता महंगाई डायन के वध से भी ज्यादा जरूरी प्रतीत हो रही है। अन्ना हजारे के प्रयास शायद ऐसा कंरने में सफल हो सकेंगे । पूरा देश उनके साथ है।

ब्रजेश कानूनगो 503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कंनाडिया रोड,इंदौर-18