Thursday, August 25, 2016

हरिशंकर परसाई

हिन्दी व्यंग्य के लिए
हरिशंकर परसाई को मेरा जानना और समझना
ब्रजेश कानूनगो  

जब मैंने आठवी कक्षा उत्तीर्ण करके मध्य प्रदेश के देवास के  नारायण विद्या मंदिर हायर सेकंड्री स्कूल में प्रवेश लिया तब वह अपने शिक्षण और अपनी समृद्ध लायब्रेरी के लिए भी जाना जाता था. यह सन 1970 के आसपास का समय था.  छात्र लायब्रेरी से नियमित पुस्तकें जारी करवाते और घर ले जाकर पढ़ा करते थे. उस दौर के अधिकाँश छात्रों की तरह नई नई पुस्तकों के लिए मैं भी लालायित रहा करता था. जो पुस्तके उस वक्त बहुत मोहित कर गईं थी उनमें शरद जोशी जी की ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ और हरिशंकर परसाई जी की ‘रानी नागफणी की कहानी’ प्रमुख थीं. यद्यपि रानी ‘नागफनी की कहानी’ को दोबारा पढ़ने का अवसर फिर नहीं आया लेकिन जहां तक मुझे याद आता है इसी व्यंग्य कथा/उपन्यास के कुछ पात्रों ‘ज्ञानरिपु’ और ‘विद्यादमन’ के भूत नामों से मैंने कुछ पत्र और आलेख आपातकाल के दौरान अखबारों के स्तंभों में अपने छात्र जीवन में लिखे थे. अब तो कतरने भी उपलब्ध नहीं हैं. इस बात का उल्लेख करने का उद्देश्य महज यह है कि पढ़ने –लिखने के प्रारम्भिक दौर में परसाई जी, शरद जी आदि को पढ़ने के कारण कई युवाओं का हिन्दी व्यंग्य लेखन की ओर रुझान होता रहा है.

फिर कोई दस वर्ष पश्चात् मुझे अपने विवाह में अपने ससुराल की लायब्रेरी से ‘परसाई रचनावली’ के छहों खंड भेंट स्वरूप प्राप्त हुए. पढ़कर उन्हें फिर से अन्य परिजनों के लाभार्थ वहीं जमा करवा दिए. परसाई जी से मिलने का कभी मौक़ा नहीं मिला मगर जो कुछ परसाई जी के बारे में पढ़ा-सुना उससे दृष्टि का बहुत हद तक साफ़ हो जाना स्वाभाविक है.

हरिशंकर परसाई अपने विपुल लेखन से पाठक को एक सामूहिक वामपंथी चेतना से संपृक्त करते हैं। एक फुल टाइम लेखक, एक्टिविस्ट, अपने समय के इतिहास के भाष्यकार, भारतीय राजनीति की सूक्ष्म पड़ताल करने वाले, समाज की बीमारियों को समाप्त करने की प्रतिबद्धता के साथ लगातार लिखते रहने की जिद वाले परसाई हिंदी साहित्य में मील का पत्थर हैं। जिन्होने आजादी के बाद हिंदुस्तान की वही तस्वीर पेश करने का काम किया जिसे आजादी के पहले प्रेमचंद ने किया था.  

इंदौर से निकलने वाले ‘नईदुनिया’ अखबार का 70-80 के दशकों में बड़ा महत्त्व हुआ करता था. बल्कि यह अखबार पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता के स्कूल की तरह भी जाना जाता रहा. हिन्दी के  बहुत महत्वपूर्ण सम्पादक, सर्वश्री राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, वेद प्रताप वैदिक, ,अभय छजलानी, यशवंत व्यास आदि यहीं से हिन्दी पत्रकारिता को प्राप्त हुए हैं. इसी अखबार में परसाईजी  ‘सुनो भाई साधो’ नाम से स्तम्भ लिखते थे. यह व्यंग्य स्तम्भ सचमुच बहुत मारक और चुटीला होता था. इसके भीतर प्रकाशित व्यंग्य लेखों में परसाई की दृष्टि बहुत प्रभावी रूप से रेखांकित होती थी. उनके व्यंग्य में कोड़ों की मार भी होती थी लेकिन पाठकों के भीतर करुणा का भी संचार हो जाता था. व्यंग्य में प्रगतिशील विचारों की दृष्टि और करुणा की उपस्थिति समकालीन व्यंग्यकारों से उन्हें अलग करती थी.

परसाई जी के समय के बाद समाज और समूचे परिदृश्य में ही काफी परिवर्तन हुआ है. पाठक की चेतना और उसकी संवेदनशीलता में भी बदलाव हुआ है. पत्र-पत्रिकाओं से विचार पक्ष पर समाचार पक्ष की प्रमुखता या उसके हावी हो जाने का भी व्यंग्य कॉलमों की प्रकृति पर प्रभाव पडा है. अब परसाई शैली में लिखा जाना न सिर्फ कठिन है बल्कि आज के पाठकों के लिए उतना सहज भी शायद न रह सके. अब भी कुछ अखबारों में व्यंग्य स्तम्भ  जरूर चलन में हैं मगर उनमें से कितनों में व्यंग्य रचनाएं स्थान पा रही हैं यह आसानी से समझा जा सकता है. परसाई जी की रचनाओं की लम्बाई के हिसाब से अखबार उसे स्पेस देता था, लेकिन अब अखबार में नियत शब्द संख्या और स्थान कॉलम के लिए निर्धारित होता है. उपलब्ध कपडे में कोट बनाना विषय-वस्तु के शरीर पर कभी तंग तो कभी ढीला पड़ जाने की संभावना बनी रहती है..     
 
मेरा मानना है कि आज के समय में व्यंग्य कॉलम लिखना कठिन है. प्रश्न यहाँ किसी रचनात्मक कौशल का नही है बल्कि रचनाकार के अपने मानस के द्वन्द्व और उसकी अभिव्यक्ति की कठिनाइयों का है। रोज-रोज समसामयिक विषयों पर लिखने और लिखने वाले तथाकथित व्यंग्यकारों के बीच प्रतियोगिता की भी है. बहुत सारी योग्य प्रतिभाओं का समय  इसी में जाया हो जाता है. बहुत कम सार्वकालिक व्यंग्य लेख और रचनाकार सामने आ पा रहे हैं. यह स्थिति एक तरह से विधा के लिए ठीक नहीं कही जा सकती किन्तु यह भी सही है कि इन्ही में से हिन्दी व्यंग्य को नया परसाई या शरद जोशी मिल सकेगा. 

दरअसल आज व्यंग्यकार की कठिनाई यह है कि जिन बातों और मूल्यहीनता को रचनाकार विसंगति मानता रहा है, वही समाज की नई संस्कृति और नए मूल्य बन चुके हैं। ऐसे में जो विरोधाभास व्यंग्य के लिए आवश्यक होता है, वह वहाँ आसानी से उपस्थित करना बहुत कठिन हो जाता है। झूठ,फरेब,छल,दगाबाजी,दोमुहापन,रिश्वत,दलाली,भ्रष्टाचार आदि कभी सामाजिक शर्म की बातें हुआ करती थीं लेकिन उपभोक्तावादी और अर्थ आधारित आज के समकालीन समाज में इन्हे जरूरी और व्यावहारिक आचरण मान लिया गया है। वस्तुओं से लेकर शरीर और आत्मा तक ऐसा कुछ नही रहा जो बेचा ना जा सके। निजी स्वार्थों और इच्छाओं की पूर्ति के लिए जायज और नाजायज का कोई फर्क अब नही रह गया है। स्थितियाँ तो ऐसी होती जा रही हैं कि कल के अनैतिक मानदंडों और आचरणों को विधिक स्वीकृति प्राप्त हो गई है, सार्वजनिक स्वीकार का कोई प्रतिरोध भी दिखाई नही देता।

परसाई को लेखन में जो आत्मविश्वास और आत्मसुरक्षा मिली है वह उनकी मानव मूल्यों में गहरी प्रतिबद्धता, शोषितों-पीड़ितों के प्रति पक्षधरता, मार्क्सवाद की सूक्ष्म दृष्टि व तर्कशील इतिहास बोध से प्राप्त हुई है।

प्रगतिशील आंदोलन में आम आदमी की शक्ल को गढ़ने वाला लेखक परसाई है। यह परसाई का कन्विक्शन ही है कि उन्होंने बिना कोई समझौता किए मानव विरोधी प्रवृत्तियों पर निर्मम प्रहार किये। तमाम प्रहार झेलने के बाद भी वे स्फूर्ति, शक्ति और साहस से लगातार लिखते रहे। उन्होंने गद्य में नैरेशन की नई विधा का सृजन किया। परसाई का लेखन आत्मतुष्टि एवं आत्मदंभ के विरुद्ध है।

परसाई जी ने अपने कॉलमों के जरिये लोक शिक्षण का जो कार्य किया है उसकी मिसाल हिन्दी लेखन में कहीं देखने को नहीं मिलाती. रायपुर से प्रकाशित ‘दैनिक देशबंधु’ में ‘पूछिए परसाई से’ कॉलम में सैकड़ों पाठकों की जिज्ञासा शांत किया करते थे. परसाई लेखक होने के साथ जबलपुर के तांगे वालों, शिक्षकों, छात्रों, मजदूरों आम लोगों से गहरे जुड़े थे। परसाई की दृष्टि की रेंज अमेरिका की नीति से लेकर, देश के मसले, भारतीय राजनीति, आंदोलन, सामाजिक समस्याएँ , मनोवृत्तियाँ, प्रवृत्ति, शादी ब्याह तक फैली हुई है। वे अपने लेखन के जरिए एक राजनीतिक कार्य को अंजाम देते थे। वे उस राजनीति के पैरोकार थे जो समाज को प्रगतिशीलता के रास्ते पर आगे ले जाती है।

ब्रजेश कानूनगो



Friday, June 24, 2016

पिता जो हूँ..(मराठी)


पिता जो हूँ..(मराठी) 
शेवटी मी एक बाप.... 


कविता-1
बाल्यावस्थेत परतण्यासाठी

लेक माझी पाच वर्षाची
मी प्रयत्न करतो
तिच्यासारखाच होण्याचा
स्वतः:च्या बाल्यावस्थेत परतण्यासाठी.

मनोरंजन पार्कमध्ये
वाऱ्याच्या तालावर नाचणाऱ्या होडीत बसून
कडू लिंबाच्या झाडाची
सर्वात उंच डहाळी हाताने पकडून
लहान मुलांच्या आगगाडीतल्या
शेवटल्या डब्यात खिदळायचं आहे मला.

तीच नेहमीची लवकर घरी येण्याची तंबी
डोळ्यांची उघडझाप करणाऱ्या सोनेरी केसांच्या बाहुलीसाठी हट्ट
आणि त्यातच
दारा आड लपून
वाघासारखी डरकाळी फोडून
भिववायचं आहे आपलंच आपल्याला.
चिमुकल्या हातांच्या आधाराने
लोम्बकळायचे आहे मला
माझ्याच खांद्यांवर.

मूळ कविता- ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद ---- अलकनंदा साने

०००००


कविता-2
टेलीफोनची घंटा
वाजतो आहे  फोन शेजारच़्या घरात
मुलाचा फोन असेल कदाचित

बायकोने टी व्ही चा आवाज बंद करुन
गैस वरुन प्रेशर कुकर उतरविला आहे
कान भींतीकडे लावले आहे
आत्ता  कुणीतरी येईल
देईल पचमढीहून फोन आल्याची बातमी
.
शेजाऱ्या कडे आज.
दाराला कुलूप आहे
आणि मुलाचा आवाज
जणू  घुमत  आहे
बंद घरात.
मूळ कविता ब्रजेश  कानूनगो
अनुवाद      ऱंजना मराठे , इंदौर

०००००
कविता-3
कोडं
ते होते
मी होतो
सर्व काही होतं

ते होते
मी होतो
सर्व वेग वेगळे

मी नव्हतो त्यामध्ये
माझ्यामध्ये ते नव्हते
आता मी आहे
ते आता नव्हे

वाचून दाखवतो पत्नीला
कुमार अम्बुज यांच्या कविता
ऐकवतात ते नईमचे नव गीत
धर्मयुगच्या एका अंकातून 

अरे मी आहे
ते पण आहे,

त्यांचासारखा मी
माझ्यासारखे ते
सर्व काही पूर्वीसारखे.

मूळ कविता-ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद प्रयास मिलिंद खटावकर, हैदराबाद

०००००

कविता-4 
नकाशात कैलिफोर्निया शोधणारा बाप

चाळीस अक्षांश व
एकशे दहा रेखांशामधे
इथे जवळच आहे
हो हो इथेच आहे
कैलिफोर्निया
किती जवळ वाटतोय ह्या नकाशात !

फोन आला होता लेकीचा
छत्तीस तास उलटले तेव्हा
फार लांब आहे हो बाबा
कैलिफोर्निया!

इथेच कुठे,इंधन भरायला
उतरले असेल विमान
एकटीनेच काढले
पाच तास! पोरीने!

या जागेवर बदलायचे होते तिला विमान
बरंय, एकच बैग नेली तिने
तसे सामानाची बदली करायला
एयरवेजचे कर्मचारी उपलब्ध असतीलच.

बघावे जरा कसे आहे
हवामान कैलिफोर्नियाचे
पाऊस किती पडतो
हिवाळ्यामधे कितपत जाते येथील
किमान  तापमान!
या भागाला समुद्री वारे वाहतात केव्हा
उन्हाळ्यात इकडची जमीन तापत असते का!
कुणास ठाऊक ऋतु तरी असतात का कैलिफोर्नियात!

कोणची पिकं घेत असावे
शेतकरी येथील शेतांमध्ये
गहू ,तांदुळ मिळतच असतील तिकडच्या बाजारांमध्ये
.
मला प्रकर्षाने आठवली होती
दहावीत शिकलेली कविता
'
खडतर आयुष्यात किती कष्ट'
जणू लाडकी लेक म्हणत आहे
नकाशाच्या रेघांवर फिरत असताना
एका बापाचा हात
पोरीच्या मस्तकाला पोहोचत आहे.

मूळ हिन्दी कविता   ब्रजेश कानूनगो
मराठी अनुवाद प्रयास  रविन्द्र भालेराव., भोपाळ

०००००


कविता-5
निरागस मूल चित्र काढतंय

स्वत:त मग्न लहान मूल चित्र
काढतंय..
इतकं गुंग त्यात
की ध्वनिक्षेपकाच्या भसाडया गोंगाटानं
ते विचलित नाही

कुठल्यातरी तीर्थक्षेत्रीं चेंगराचेंगरीत किती मेले,
वित्त मंत्रालयानं कितीजणांवर
टाच आणली,..
खासदार समर्थन मागे घेतील नी कोसळेल सरकार
हे त्याच्या गावीं नाही.

घटना आणि दुर्घटनांपासून बेखबर मूल चित्र काढतंय
रेखाटतंय एक नदी, कदाचित तलावही असेल..

एक होडी, हळूहळू वल्हवणारा नावाडी पण आहे..
किना-यावर चितारलीये एक झोपडी आणि कौलारातून
बाहेर पडतोय धूर..
हवेत दरवळतोय शिजणा-या
अन्नाचा सुवास...

चित्रात उगवलंय एक खजुराचं झाड,स्वछंद पाखरं उडताहेत
अर्धाच सूर्य!बहुदा अडकलाय टेकड्यांत कुठंतरी...

जरा इकडे बघा बरं!
काहीं माणसं कुदळ फावडी घेऊन कुठं निघालियेत..
कदाचित सूर्याला बाहेर काढतील..

टेकड्या खोदता खोदता सहज
चढतील खजुराच्या झाडावर
आणि उधळण करतील जमिनीवर मिठ्ठास दाणे..

लहान निरागस मूल चित्र काढतंय..
जगाच्या कागदावर आकार घेणा-या जीवनाच्या चित्रागत..

मूळ कविता--ब्रजेश कानूनगो
अनुवाद प्रयास--अनुराधा जामदार, भोपाळ


०००००
मूल कविताएँ- ब्रजेश कानूनगो
प्रस्तुति- स्वरांगी साने (वाट्सएप समूह- माय मावशी)  
सम्पादन- अलकनंदा साने



Saturday, June 18, 2016

पिता जो हूँ.....

पिता जो हूँ.....
ब्रजेश कानूनगो

कविता-1
बचपन में लौटने के लिए

पाँच बरस की अपनी बेटी बन जाना चाहता हूँ मै

मनोरंजन पार्क की हवा में लहराती नाव में बैठकर
नीम की सबसे ऊँची पत्ती को छूकर
खिलौना रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे से
चहकना चाहता हूँ

जल्दी घर लौटनें की हिदायत और
आँखें झपकाती
सुनहरे बालों वाली गुड़िया की फरमाइश के बाद
दरवाजे की ओट में छुपकर
शेर की परिचित आवाज से
डरा लेना चाहता हूँ स्वयं को

झूल जाना चाहता हूँ अपने ही कंधों पर
नन्हीं बाहों के सहारे।

०००००


कविता-2
टेलीफोन की घंटी 1998

पडोसी के घर में बज रही है घंटी
शायद बेटे का फोन होगा

टीवी की आवाज धीमी कर दी है पत्नी ने
प्रेशर कुकर उतार लिया है गैस पर से
कान दीवारों से सट गए हैं
अभी कोई कहेगा-
फोन आया है पचमढी से

पडोसी के घर पर
पडा है आज ताला
और बन्द घर में गूँज रही है
बेटे की आवाज ।

०००००


कविता-3  
पहेली

वे थे
मैं था
सब था

वे थे वे
मैं मैं था
सब था अलग अलग

उनमें नहीं था मैं
मुझमें तो कतई
नहीं होते थे वे

अब मैं हूँ
नहीं हैं वे

पढ़कर सुनाता हूँ पत्नी को
कुमार अम्बुज की कविताएँ
सुनाने लगते हैं वे
धर्मयुग से नईम के नवगीत

ओह! मैं हूँ
वे भी हैं

उनके जैसा मैं
मेरे जैसे वे
सब कुछ पहले जैसा.

०००००    



कविता-4
नक्शे में कैलिफोर्निया खोजता पिता

चालीस डिग्री अक्षांश और
एक सौ दस डिग्री देशांतर के बीच में
यहाँ इधर,थोडा हटकर,बस यहीं
यही है कैलिफोर्निया
ज्यादा दूर तो दिखाई नही देता नक्षे में!

उडने के छत्तीस घंटे बाद
फोन किया था बेटी ने
बहुत दूर है कैलिफोर्निया

ईंधन लेने के लिए
यहाँ उतरा होगा विमान
बेटी ने बिताए होंगे
पाँच घंटे अकेले

यहाँ से बदलना पडता है विमान
एक बैग भर ही तो था पास में
सामान तो शिफ्ट कर ही देते होंगे एयरवेज वाले

जरा देखें तो
कैसी है जलवायु कैलिफोर्निया की
बारिश होती है यहाँ कितनी
कितना रहता है सर्दियों में
न्यूनतम तापमान

समुद्री हवाएँ कब बहती हैं इस ओर
तपती तो होगी गर्मियों में धरती
मौसम होते भी हैं या नही
कैलिफोर्निया में

कौनसी फसलें बोते हैं कैलिफोर्निया के किसान
मिल ही जाता होगा बाजार में
गेहूँ और चावल

‘जितने कष्ट कंटकों में है...’
दसवीं कक्षा में पढी कविता की अनुगूंज में
घुल रही है बेटी की आवाज
नक्षे की रेखाओं से होता हुआ
पहुँच रहा है पिता का हाथ
बेटी के माथे तक !

०००००



कविता-5
बच्चे का चित्र

अपने में ही डूबा नन्हा बच्चा बना रहा है एक चित्र

इतना तल्लीन है कि
स्पीकरों पर चीख रही चौपाइयाँ
बाधा नही डाल रही उसके काम में

उसे कोई मतलब नहीं है इससे कि
कितने मारे गए तीर्थ स्थल की भगदड में
और कितनों को घोंप दिया गया है छुरा
वित्त मंत्रालय द्वारा
उसे पता नहीं है
कब अपना समर्थन वापिस ले लेंगे सांसद
और कब गिर जाएगी सरकार

घटनाओं और दुर्घटनाओं से बेखबर बच्चा
बना रहा है कोई नदी,
झील भी हो सकती है शायद
एक नाव – जिसे खै रहा है कोई धीरे-धीरे
किनारे पर बनाई है एक झोपडी
जिसकी खपरैल से निकल रहा धुँआ
महसूस की जा सकती है हवा में
सिके हुए अन्न की खुशबू 

खजूर का एक पेड उगा है चित्र में
उड रहे हैं कुछ पक्षी स्वच्छंद
अटक गया है शायद आधा सूरज पहाडियों के बीच 

देखिए जरा इधर तो
निकल पडे हैं कुछ लोग कुदाली फावडा लिए
निकाल लाएँगे अब शायद सूरज को बाहर
पहाडियों को खोदते हुए
चढ जाएँगे खजूर के पेड के ऊपर
और बिखेर देंगे धरती पर मिठास के दाने

नन्हा बच्चा बना रहा है चित्र
जैसे बनती है जीवन की तस्वीर
दुनिया के कागज पर.


ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड,इंदौर -452 018