Saturday, February 13, 2016

प्रेम की कुछ कविताएँ

प्रेम की कुछ कविताएँ
ब्रजेश कानूनगो  

कविता-1

चाँद के टुकड़े
ब्रजेश कानूनगो

शरमा रही है दूब कुछ ऐसे
अभी छूकर गया कोई जैसे

ओस पर लिख गया है अपना नाम
यह वही लिपि है शायद 
जिसमें लिखी जाती धड़कनों की भाषा
शब्दों के अर्थ सामनें हैं बे-आवाज

एक राग सुनाई देता है गुम्बद की हवा में  
घंटियों की गूँज पर सवार उड़ गई
कोई चिड़िया अभी-अभी 

आईना था चांदनी का जलाशय 
एक फल आ गिरा अचानक शहद भरा

थिरकने लगे चाँद के टुकड़े
तरंगों की कमर में बाँहें डाले.

०००








 

कविता-2

खाता बही में प्रेम
ब्रजेश कानूनगो 

चांदनी में नहाए
किसी ख़ूबसूरत लम्हे में  
लाड में आकर तुम कहीं पूछ बैठो 
कितना प्यार मिला जीवन में ?
तो क्या कहूंगा मैं !

दुनियादारी के खाता-बही में
आधी सदी तक प्रविष्टियों के उपरांत 
कभी प्यार का कोई रिकार्ड नहीं संजोया बेशक
मगर जो मन की एक किताब है उसमें
हर पन्ने पर सबसे पहले
स्वतः दर्ज हो जाता है तुम्हारा प्रेम

इतनी बड़ी हो गयी है पूंजी 
कि बही-खाते की रेखाओं से बाहर निकल रहे हैं आंकड़े
समुद्र के आयतन से कुछ अधिक हो गया है उसका मान
धरती के घनत्व से ज्यादा सघन है यह अर्जित प्रेम

संभव ही नहीं शायद
तुम्हारे प्रेम का हिसाब रखना
आकाश जितने अगले पन्ने पर
दर्ज नहीं हो पा रहा मुझसे पिछला बाकी.

०००




         
कविता-3

प्रेम में गणित
ब्रजेश कानूनगो

सवालों को हल करते हुए
जो बीज गिर जाता है बीच में
वह गणित नहीं है
नीली स्याही में इन्द्रधनुष खिलता है कागज़ पर

अंकों के पीछे नहीं
आगे लगते हैं शून्य
शून्य का मान शून्य से भी हल्का
जैसे फूल की पँखुरी

सुनसान किनारे तक जाकर ठहर जाती हैं रेखाएँ
त्रिभुज में रूपांतरित होने लगते हैं आयत
त्रिभुज तो जैसे दिल में बदल जाने को बैचेन बैठे होते हैं
आकृतियों को गुलाबी होने में देर नहीं लगती बिलकुल

संतूर की तरह बजता है गणित
प्रेम के राग में. 

०००











कविता-4

पांच हजार शामों वाली लड़की
ब्रजेश कानूनगो  

ज्येष्ठ की तपन भी
साँझ की बयार में बदल जाती है
दोपहर को जब चली आती है
पांच हजार शामों वाली लड़की.

रात तो फिर रात ही है. 
न जाने कितनी सदियों से 
दुनिया के अँधेरे से लड़ते हुए
प्रेयसी कहें पत्नी कहें या माँ कह लें
बहन या बेटी होकर भी यही करती रही
कहीं और जाकर भी
दिया जलाती रही

रोशनी से जगमग करती रही सबका संसार
पांच हजार शामों वाली लड़की.

यूँ तो बहुत हैं जमाने में 
खैर खबर लेने वाले 
जब रात को अकड़ जाती है कमर 
पांच हजार दोस्त नही
वही होती है चिंतित 
पांच हजार शामों वाली लड़की.

रहस्य ही है अब तक
पांच हजार हमारी शामों को
ख़ूबसूरत बनाती लड़की के दुःख
ख़त्म नहीं होते
पांच हजार नई सुबहों के बाद भी.
कविता-5

प्रेम कविता का मौसम
ब्रजेश कानूनगो

ऊब, तपन और थकान से भरे
मौसम में भी 
प्रेम कविता ठंडक देती है

ऐसा नहीं है कि गर्मियों में पिघलकर
रूह-अफजा में तब्दील हो जाती है कविता  
प्रेम की बात हो तो हर मौसम
बसंत में बदल जाता है

ज्यादा अर्थ नहीं रखता
मौसमों का विभाजन
प्रेम कविता में डूबे व्यक्ति के लिए 
चार कहें पांच कहें
या छः निर्धारित कर लें इनकी संख्या
एक ही होता है केवल ’प्रेम का मौसम’

सारे विशेषण जैसे प्रेम का पर्याय कवि के लिए.

ज्यादा से ज्यादा
इतना होता है सुविधा के लिए
कि मौसम दो ऋतुओं में बंट जाते हैं
कुछ महीनें मिलन के
और थोड़े से वियोग के समझ लीजिये

गौर करें आप
कि वेदना में सींचता है कविता की जमीन आंसुओं से
और जब आती है मिलन ऋतु
खूब लेता है कवि फूलों का मजा 


यह वही मौसम है कमबख्त  
जो पसीने की तरह रिसता रहता है देह से 
भिगोता है बरसात में तन-मन
फूलों की तरह खिलता है
और खुशबू की तरह बिखर जाता है
प्रेम कविता में.

०००  

 

कविता-6

अनंत किस्सा
ब्रजेश कानूनगो

दरअसल किस्सा वहीँ से शरू हुआ
जब प्रेम में भीगे दो मनुष्यों का मिलन  हुआ
और आबाद होने लगी ये दुनिया

दो पत्थरों का प्रेम ही था वह शायद
जो चमक उठा था घर्षण के साथ

पानी के निर्माण  से पहले
आक्सीजन और हायड्रोजन में भी
प्रेम की आहट हुई होगी जरूर

बीज को मिटटी और नमी का जब  मिलता है प्रेम
तो धूप में हरी पत्तियाँ निकल आती हैं
रसों के मिलन के बाद खिल ही जाते हैं फूल

दरकने लगते हैं पहाड़
जब कम होने लगता है प्रेम 
बस्तियां जलने लगती हैं
तटबंध टूट जाते हैं
विश्वास बह जाता है सारा 

जारी रहेगा जीवन का यह किस्सा
धड़कता रहेगा जब तक प्रेम अनंत   
नष्ट नहीं होगी यह ख़ूबसूरत दुनिया.  

ब्रजेश कानूनगो





Friday, January 1, 2016

आचरण और मानस में भी लिखना होगा ‘दिव्यांग’

लेख 
आचरण और मानस में भी लिखना होगा ‘दिव्यांग’ 
ब्रजेश कानूनगो  

जब मैंने पहले पहल एयरपोर्ट के दर्शन किये थे तभी से एक अंगरेजी शब्द मेरे लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण बना हुआ था, इसका कोई ठीक और संतोषजनक हिन्दी पर्याय अब तक नहीं मिल सका. वह शब्द है ‘स्पेशली चेलेंजड पर्सन’. एयरपोर्ट पर बने सुविधागृह परिसर में विकलांग लोगों के उपयोग के लिए बने टॉयलेट की दीवार पर हिन्दी में ‘केवल विकलांगों के लिए’ तथा अंगरेजी में ‘फॉर स्पेशली चेलेंजड पर्सन्स’ लिखा हुआ देखा था. शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए अंगरेजी के पर्यायवाची के सामने मुझे हिन्दी का ‘विकलांग’ शब्द कमजोर और अपमानजनक लगता रहा है. जबकि अंगरेजी के ‘स्पेशली चेलेंजड’ शब्द में मुझे उस विशेष व्यक्ति के अक्षमता के विरुद्ध संघर्षशील होने के सन्दर्भ में प्रशंसा और सम्मान का भाव निहित दिखाई देता है. जहां तक ‘विकलांग’ शब्द के शब्दकोशीय अर्थ की बात है उसका सन्दर्भ शरीर के किसी अंग के क्षतिग्रस्त अथवा अक्षम होने से ही निकलकर आते हैं जैसे-अपंग, अपाहिज, असमर्थ, विकलांग या भग्नांग आदि. और भी इसी तरह के समानार्थी शब्द चलन में हैं. दूसरी तरफ अंग विशेष की अक्षमता के अनुसार भी कुछ शब्द प्रयोग में लिए जाते रहे हैं मसलन नेत्रहीन, लंगड़ा, कुबड़ा आदि. इनमे व्यक्ति विशेष के लिए किसी सम्मानजनक उपमा का सृजन दिखाई नहीं देता है. दूसरी तरफ इनके लगातार प्रयोग के कारण भी ये कभी-कभी गाली की तरह  सम्बंधित व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने के अपरोक्ष कारक बनते रहे हैं.

यह बहुत संतोष और खुशी की बात है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे प्रभावी व्यक्ति के मन में भी यह बात उठी है और उन्होंने साल 2015 के अंत में रेडियो पर अपने मन की बात करते हुए कहा कि विकलांगों के लिए अब ‘दिव्यांग’ जैसा शब्द प्रयोग किया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री की इस भावना की हर कोई प्रशंसा करेगा और करना भी चाहिए.  उनके सुझाए शब्द ‘दिव्यांग’ से मेरी समस्या का निदान तो नहीं हुआ मगर  एक रास्ता जरूर निकल रहा है. अभी इस पर थोड़ा और काम जरूर किया जाना चाहिए.

दिव्याग में  ‘दिव्य’ का अर्थ यहाँ दैविक और देवीय ,पारलौकिक के साथ-साथ अति सुन्दर के रूप में आया है. ‘दिव्यचक्षु’ शब्द का प्रयोग ‘नेत्रहीन’ व्यक्ति के लिए किया भी जाता रहा है. महाभारत के पात्र ’संजय’ को ‘दिव्यदृष्टि’ प्राप्त थी और वह विशेष रूप से प्राप्त शक्ति के कारण समूचा युद्ध महाप्रासाद में बैठकर देखने में समर्थ था. इस परिप्रेक्ष्य में ‘दिव्यांग’ विकलांग व्यक्तियों में अतिरिक्त किसी दिव्य शक्ति की उपस्थिति के विश्वास से सटीक कहा जा सकता है और सम्मानजनक भी है. मगर यहाँ मुझे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पहल भी सहज याद हो आती है. बापू ने सफाई कर्मियों को सम्मानजनक संबोधन हेतु ‘हरिजन’ जैसे शब्द को आगे बढाया था. समाज में उपेक्षित वर्गों के निम्नवर्गीय लोगों को उन्होंने सीधे ‘हरि’ अर्थात प्रभु से जोड़कर ऊंचे स्थान पर लाने का प्रयास किया था. इसका कुछ अवधि तक असर भी हुआ, लेकिन यह कटु सत्य स्वीकारना ही होगा कि अब यह शब्द भी अपेक्षित रूप से लोगों को उतनी गरिमा और सम्मान नहीं दे पा रहा.

सच तो यह है कि हमें देखना होगा कि  ‘दिव्यांग’ शब्द के इस्तेमाल से संदर्भित व्यक्तियों की  सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों या कठिनाइयों में कितना परिवर्तन हो सकेगा. उनके साथ हमारे व्यवहार में किसी अच्छे बदलाव को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है. उनके लिए हम कितनी जल्दी कार्यालयों में एक्सिलेटरों की व्यवस्था कर सकेंगें. कितने समय में लोक परिवहन की बसों में लो फ्लोवर और रेलवे स्टेशनों पर व्हील चेयरों की समुचित उपलब्धता हासिल की जा सकेंगी. 
शब्दकोश में विकलांगों के लिए एक और पर्यायवाची शब्द जोड़ने और सरकारी कागजों या सुविधागृहों की दीवारों पर ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ लिख देने भर से प्रधानमंत्री जी की सदइच्छा और निर्मल भावना का कार्यान्वयन संभव नहीं हो सकता. कुछ दिव्य शब्द समाज को अपने मानस पटल पर भी विकलांगों के लिए लिखना जरूरी होंगे.

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
मो.न.09893944294                   

      

Wednesday, December 30, 2015

तालाब को सजा न सुनाएँ

तालाब को सजा न सुनाएँ
ब्रजेश कानूनगो                                                                                                

गणेशोत्सव का समय था. प्रतिमा विसर्जन के लिए घर से करीब एक किलोमीटर के फासले पर स्थित पिपलियाहाना तालाब पर हमलोग गए. यद्यपि सार्वजनिक जल स्रोतों की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से तालाबों आदि में मूर्ती विसर्जन पर प्रतिबन्ध का एक आदेश जरूर स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किया जाता है लेकिन सामान्यतः इस आदेश की धज्जियां उड़ते भी आम तौर पर वहीं दिखाई दे जाता है. चूंकि नगर निगम ऐसे स्थानों पर एक पांडाल लगाकर मूर्तियों को एकत्र करके यथाविधि अन्यत्र विसर्जित कर देने का आश्वासन भी देता है अतः हम लोग वहां पांडाल में प्रतिमा सौंपकर तालाब की मुंडेर पर बैठकर बहुत देर तक खूबसूरत नज़ारे का आनंद लेते रहे. पोते को मैंने बहुत उत्साह से बताया कि आगे-पीछे यहाँ जरूर कोई ख़ूबसूरत पिकनिक स्पॉट विकसित हो जाएगा और हमलोग शाम को रोज यहाँ आया करेंगे.
परन्तु हाल ही में यह खबर पढ़कर बहुत निराशा हुई कि तालाब के जल भराव क्षेत्र की मिट्टी और चट्टानों का परीक्षण किया गया है. यहाँ तालाब की जमीन पर अब नए न्यायालय भवन को बनाया जाना प्रस्तावित है.

विकास के इस दौर में शायद यह खबर अधिकाँश लोगों के भीतर कोई ख़ास हलचल पैदा न कर सके लेकिन उन सन्वेदनशील लोगों को जरूर ठेस पहुंचाती है जो प्रकृति, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से प्रेम करते हैं. यह पहली खबर नहीं है जब विकास के लिए किसी तालाब के सीने पर कांक्रीट की मीनारें खडी करने की पहल की गयी हो. दुर्भाग्य से हमारे देश- प्रदेश के कई नगर और महानगर इसके जीवंत उदाहरण हैं जहां सैंकड़ों तालाबों और बावडियों, कुओं की कब्र पर कॉलोनियां और सड़कें बना दी गईं.

किसे याद नहीं होगा कि इंदौर जैसे महानगर और देवास जैसे शहरों में कितनी दूर से (लगभग 150 कि.मी.) नर्मदा का पानी लोगों की प्यास बुझाने के लिए लाना पडा है. मुझे याद है आज से कोई तीस बरस पहले देवास में हम परिवार के लोग एक दिन छोड़कर स्नान करते थे क्योंकि उन दिनों इंदौर से पानी रेल गाडी से एक दिन छोड़कर देवास आता था. जबकि जो सड़क हमारे घर तक पहुँचती थी उसके नीचे एक ख़ूबसूरत बावडी दफन कर दी गयी थी. पहले बावडी की भरपूर अनदेखी की गयी फिर उसमें लगातार कूढा-करकट डाला जाता रहा. बावड़ी को पहले जहर देकर बीमार किया गया, फिर क्रमशः मरती हुई वह एक दिन हमारी नज़रों से ओझल हो गयी. यह वही बावडी थी जिसमें उतरकर हम बचपन में रोज नहाया करते थे. 
इसीतरह नगर के एक मात्र टाउन हाल के सामने का ख़ूबसूरत तालाब तलैया में बदल गया और उसके जल भरण क्षेत्र में अट्टालिका खडी हो गयी थी. विडम्बना है कि उसी इमारत की भूतल पर स्थित कोफी हाउस में बुद्धिजीवी और पत्रकार जलसंकट को लेकर विमर्श करते रहे. ये कहानी केवल एक शहर या कस्बे की नहीं है. जल स्रोतों की दुर्दशा के ऐसे अनेक उदाहरण सहज रूप से हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं.
   
इंदौर के पिपलियाहाना तालाब के पानी से आसपास के कई ट्यूबवेल रिचार्ज होते हैं. मालवा सहित देश भर में दिनों-दिन गिरता भूजल स्तर किसी से छुपा नहीं है. दूसरी तरफ कांक्रीट के निर्माणों ने सडकों के बरसाती पानी को जमीन में जाने से रोकने का काम ही किया है.  इसके अलावा गौर करने वाली बात यह भी है कि जिस स्थान पर यह तालाब ( वर्ड-कप चौराहा) अवस्थित है वह भविष्य के बहुत सुन्दर पिकनिक स्पॉट में रूपांतरित होने के लिए पूरी तरह उपयुक्त है. सामान्यतः तालाबों के आसपास का भूखंड मनोरम होता है और उसका विवेकपूर्ण उपयोग ही किया जाना चाहिए. कार्यालयों और संस्थानों के भवनों के लिए अन्य पथरीली, बंजर या अनुत्पादक भूमि को विकसित भी किया जा सकता है.    
अनेक उदाहरण हैं जब प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए बगैर विकास किया गया है. न्यायालय परिसर के लिए तो कई स्थान मिल जायेंगे जहां अपराधियों को सजा सुनाई जा सकती है लेकिन विकास के नाम पर एक निरपराध तालाब को मौत या आजीवन कारावास की सजा दिया जाना कतई न्यायोचित नहीं कहा जा सकता. 


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
मो.न. 09893944294   


Monday, October 26, 2015

भूकंप : दो कविताएँ

भूकंप : दो कविताएँ

कविता-1 
एक दिन


एक दिन धरती कांपती है
और ढह जाता है हमारा सारा अहँकार

संवाद मूक हो जाते हैं
अनंत की ओर यात्रा के प्रस्थान का अभिनय करते
अचेतन में विलीन हो जाते हैं अभिनेता
रंगमंच की छत के नीचे
धूल में बदल जाता है महानाट्य

स्खलित होने लगती प्रमोद की पहाड़ियाँ
दुःख में उमड़ी नदियों में बह जाती हैं खुशियाँ

और एक दिन
ज़रा-सा मद्दिम संकेत भी
धराशायी हौसलों में उम्मीद का टेका लगाता है
सरगम का सबसे कोमल स्वर फूटता है मिट्टी के भीतर से अचानक  
जैसे बीज की नाभि से कोई नया पत्ता निकला हो

सूखा नहीं था माँ का आँचल
निर्जीव देह की बाहों में सिमटा मासूम
अब भी मुस्कुरा रहा था.


कविता-2 

भूकंप के बाद

भूकंप के बाद
एक और भूकंप आता है हमारे अंदर

विश्वास की चट्‌टानें
बदलती है अपना स्थान
खिसकने लगती है विचारों की आंतरिक प्लेटें
मन के महासागर में उमड़ती है संवेदनाओं की सुनामी लहरें
तब होता है जन्म कविता का।

भाषा शिल्प और शैली का
नही होता कोई विवाद
मात्राओं की संख्या
और शब्दों के वजन का कोई मापदंड
नहीं बनता बाधक
विधा के अस्तित्व पर नहीं होता कोई प्रश्नचिन्ह्‌
चिन्ता नहीं होती सृजन के स्वीकार की।

अनपढ़ किसान हो या गरीब मछुआरा
या फिर चमकती दुनिया का दैदीप्य सितारा
रचने लगते हैं कविता।

कविता ही है जो मलबे पर खिलाती है फूल
बिछुड़ गये बच्चों के चेहरों पर लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नईबस्ती की हवाओं मे
सिकते हुए अन्न की खुशबू।

अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करतीं
पुस्तकों में नहीं
जीवन में बसती है कविताएँ।

ब्रजेश कानूनगो 











  

Sunday, October 11, 2015

दहकते डायलाग


भाषणों में  दहकते डायलाग 
ब्रजेश कानूनगो 

जनसभाओं में भाषणों की समकालीन शैली का मैं कायल हो गया हूँ. कभी शोलेफिल्म का इसी तरह मुरीद हो गया था . कुछ चीजों का हमारे मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ जाता है कि उन्हें भुला पाना बहुत कठिन होता है.
चालीस साल पहले धधके शोलेके संवादों की गर्मी आज भी वैसी ही बनी हुई है. तेरा क्या होगा कालिया?’ ‘कितने आदमी थे?’ ‘कब है होली? होली कब है?’ ‘तेरा नाम क्या है बसन्ती?’ भुलाए नहीं भूलते.
कहने को ये एक फिल्म के संवाद थे , असल में ये कुछ सवाल थे. इनके उत्तर में क्या कहा गया ज्यादा मायने नहीं रखता मगर सवाल अब तक हमारी जबान पर थिरकते रहते हैं.
आमतौर पर ज्यादातर सवाल बिलकुल साफ़ और स्पष्ट रहते  हैं लेकिन उनके जवाब विविधता के साथ आते हैं. परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में भी केवल प्रश्न ही छपे होते हैं, हर ईमानदार परीक्षार्थी यदि व्यापम शैली के अपवाद को छोड़ दें तो भी अब तक उनके भिन्न-भिन्न उत्तर ही लिखता रहा है.
आइये ! इसे ज़रा यों समझने की कोशिश करते हैं, जैसे एक प्रश्न होता है - कैसा समय है?’
मैं कहूंगा- अच्छा समय है. साधुरामजी कहेंगे- कहाँ अच्छा समय है..अच्छा समय तो आने वाला है. कोई कहता है- दिन का समय है. वाट्सएप  पर कनाडा से बेटा बताता है –‘नहीं पापा रात है, मगर सूरज की रोशनी है अभी यहाँ . कहीं रात में उजाले का समय है, कहीं दिन में अन्धेरा घिर आया है. अजीब समय है ! लेकिन यह स्पष्ट है कि हर व्यक्ति का अपना विशिष्ठ उत्तर संभावित है.
सच तो यह है कि अक्सर प्रश्न ही महत्वपूर्ण होते हैं, उत्तर नहीं. विद्वानों का मत भी यही रहा है कि विकास के लिए सवाल होना बहुत जरूरी है. उत्तरों की विविधता के बीच से उन्नति की पगदंडी निकलती है. सवालों के उत्तर खोजता हुआ मनुष्य चाँद-सितारों तक पहुंच जाता है. ये सवाल ही हैं जो हमारे अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करते हैं.
सही उत्तर वही जो प्रश्नकर्ता मन भाये ! ऐसे उत्तराकांक्षी सवाल करना भी एक कला है जो हर कोई नहीं कर सकता. इसके लिए गब्बर जैसा तन-मन , दमदार आवाज और स्टाइल भी होना चाहिए. सवाल पूछने की भी प्रभावी शैली होना चाहिए. जैसे भीड़ भरी सभा में अवाम से पूछा जाता है ..बिजली आती है कि नहीं? तो लोग एक सुर में उत्तर देते हैं नहीं.बिजली चाहिए कि नहीं?’ उत्तर आता है हाँ,चाहिए?’ ये होता है प्रश्न पूछने का प्रभावी तरीका. कोई ऐरा-गैरा क्या खा कर सवाल करेगा.
केबीसी की भारी लोकप्रियता के बावजूद मैं यहाँ बिग बी के सवालों की शैली से से ज़रा कम सहमत हूँ. यह भी क्या हुआ कि करोड़पति बनाने के लिए हॉट सीट पर बैठे प्रतियोगी से एक प्रश्न किया और उत्तरों के चार विकल्प दे दिए. यह तो कोई ठीक बात नहीं. एक प्रश्न हो, एक उत्तर हो. जैसे पूछा जाता है - इस बार सरकार बदलना है कि नहीं.?’ उत्तर एक ही आता है- हाँ, बदलना है.ये हुई न स्पष्टता. कोई विकल्प नहीं ,कोई भ्रम की स्थिति नहीं उत्तर देने में.
यह सच है कि शोलेफिल्म के संवादों की लोकप्रियता का लंबा इतिहास रहा है. मगर बदलाव के इस महत्वपूर्ण समय में अब पुराने रिकार्डों को ध्वस्त करने का वक्त आ गया है. इन दिनों जो डायलाग जन सभाओं सुनाई देने लगे हैं,उनसे तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि अब शोले के संवादों की दहक ख़त्म होने को ही है. 

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
मो.न. 09893944294


Thursday, July 23, 2015

हंगामे का संस्कार


हंगामे का संस्कार
ब्रजेश कानूनगो

भारी बारिश के बावजूद साधुरामजी अचानक बारह ताड़ी की छतरी थामें मेरे घर चले आये. मुझे थोड़ा अचरज भी हुआ. ऐसे खराब मौसम में भले ही कितना ही जरूरी काम क्यों न हो वे घर से नहीं निकलते हैं.
‘क्या बात है साधुरामजी ! इतनी बारिश में यहाँ ?  सब ठीक तो है?’ मैंने दरवाजा खोलते हुए पूछा.
‘सोंचा है आज पूरा दिन आपके साथ टीवी देखेंगे. अकेले–अकेले संसद की कारवाही देखने में मजा नहीं आयेगा.’ अपनी छतरी को सुखाने के लिए वरांडे में फैलाते हुए वे बोले.
‘अरे वाह! यह तो बड़ा अच्छा किया आपनें. मौसम भी बहुत अच्छा है. चाय-पकौड़े और संसद का सत्र. खूब मजा आयेगा. आइये-आइये.’ मैंने सोफे की ओर इशारा करते हुए उन्हें बैठने का आग्रह किया.
‘संसद की कारवाही भी पकौड़ों के आनंद से कम नहीं होती साधुरामजी.’ मैंने चुहुल की. ‘कैसे?’ उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा.  
‘मानसून सत्र की विशेषता ही यह होती है साधुरामजी कि सदन के बाहर बारिश की ठंडी फुहारें होती हैं और भीतर गरमा गर्म बहसों का पकौड़ों की तरह भीतर बैठे सदस्य लुत्फ़ उठाते रहते हैं.’ मैंने कहा.
टीवी चालू किया तो देखा जबरदस्त हंगामें के बाद अध्यक्ष महोदय ने नें सदन की कारवाही आधे घंटे के लिए स्थगित कर दी थी.
‘इस बार थोड़ा मुश्किल ही होगा सदन का सुचारू रूप से चलना.’ साधुरामजी ने आशंका व्यक्त की.
‘इस बार क्यों, सदन का चलना तो हर बार ही मुश्किल होता है. जब ये सत्ता में थे तब भी विपक्ष ने चलने नहीं दिया था. अब ये विपक्ष में हैं तो भी यही होगा, कौन सी नई बात है.’ मैंने कहा.
‘पर इस बार ललितगेट, व्यापम जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं.’ वे बोले.
‘तब भी कोयला, स्पेक्ट्रम आदि होते थे. बस नाम ही तो बदला है साधुरामजी. गठबंधन बदला है.  नाम बदलने से कुछ नहीं होता, सब पहले जैसा ही होता रहेगा.’ मैं निराशा में बोलता गया.
‘क्या करें भाई ! यही प्रजातंत्र है. किसी के माथे पर नहीं लिखा होता कि कोई  ठीक काम करेगा. अब देखिये अब उस संस्थान का नाम भी बदला जा रहा है.’ साधुरामजी आज मुझ से थोड़े सहमत दिखाई दिए.
‘केंद्र सरकार ने भी तो ऐसा ही कुछ किया था ‘योजना आयोग’ के साथ. वह भी अब ‘नीति आयोग’ हो गया है. अब देखिये आयोग-आयोग भर ही दिखाई देता है. पहले योजना रुकी रहती थी अब नीति लापता है.’ साधुरामजी ने सरकार पर तंज करते हुए कहा.
‘व्यापम की बिगड़ी छवि सुधारने के लिए उसका नाम ‘भरती एवं प्रवेश परीक्षा मंडल’ कर देने से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि अब वहां गडबडी नहीं होंगी. कपडे बदल लेने से आँखों का रंग नहीं बदला करता.’ मैंने अपनी बात बढाई.
‘बिलकुल तुम ठीक कहते हो. नागनाथ कह लो या सांपनाथ, दोनों एक ही हैं. दोनों में से कोई भी डस ले हमारा मरना स्वाभाविक ही है.’ साधुरामजी मुस्कुराए.
‘दरअसल, व्यापम संस्था नहीं, संस्कार है साधुरामजी! जैसे कभी कहा जाता था कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त है ,उसी तरह व्यापम तंत्र की रग-रग में समाविष्ट हो गया है. व्यापम में हम इतनें संस्कारित हो चुके हैं कि लगता है उसके बगैर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता. कुछ पाने के लिए व्यापम स्नान के बाद ही फल की आकांक्षा की जा सकती है अब.’ मेरा गुबार निकल रहा था.
‘ठीक है भाई, इतना गुस्सा भी ठीक नहीं. तुम्हारा ही बीपी बढेगा इससे, कहीं अस्पताल न जाना पड़ जाए.’ साधुरामजी ने वातावरण को थोड़ा सहज बनाना चाहा.
‘और वहां किसी व्यापम हितग्राही डाक्टर से सामना हो जाए तो और भी मुश्किल हो जायेगी.’ मैं हंसते हुए कहने लगा.‘ खैर, जाने दीजिये किसी ने कहा भी है ‘नाम में क्या रखा है’ कुछ भी रख लो, जयकिशन नाम बदलकर जैकी हो जाता है तो उसकी नाक छोटी नहीं हो जाती. बहुत समय हो गया है आप भी साधुरामजी ही बने हुए हैं अब तक, आपको भी अब ग्लोबलाइजेशन के दौर में ‘एस राम’ कहूं तो कोई आपत्ति तो नहीं है आपको?’
‘चलो अब टीवी लगाओ, शायद संसद की कारवाही फिर शुरू हो गयी होगी.’ साधुरामजी ने बात बदलते हुए टीवी की तरफ इशारा किया तो मैंने रिमोट का बटन दबा दिया. देखा कि संसद में फिर हंगामा हो गया था , अध्यक्ष ने दोबारा आधे घंटे के लिए कारवाही स्थगित कर दी थी.


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018     

Monday, July 6, 2015

डिजिटल के भरोसे में


डिजिटल के भरोसे में 
ब्रजेश कानूनगो  

साधुरामजी इन दिनों बहुत खुश हैं. बायपास पर बनी नई-नई टाउनशिप में आये थे तो अक्सर बहुत दुखी रहते थे. पुराने शहर और दोस्तों से दूर होकर उनका मन और तन कमजोर पड़ता जा रहा था. लेकिन जब से जन्मदिन पर अमेरिका में बसे ग्रीनकार्ड धारी सुपुत्र ने एक टेबलेट ऑनलाइन उनको भेंट कर दिया है उनके सारे दुःख दूर हो गए हैं. उनका अकेलापन देश के बुरे दिनों की तरह चला गया है . पूरी दुनिया उनकी हथेलियों में सिमट आईं है. उँगलियो के इशारे पर मनचाहे वातावरण, दोस्तों के बीच दिन भर बतियाते रहते हैं.

‘साधुरामजी आजकल घूमने के लिए आप मुझे लेने नहीं आते, बल्कि मुझे आपके घर आना पड़ता है..कहाँ व्यस्त रहते हैं?’ रोज की तरह शाम को जब हम टहलने निकले तो मैंने चर्चा शुरू करते हुए कहा.
‘अरे भाई , इन दिनों एक कविता कार्यशाला में नवलेखकों को लिखने के सूत्र समझाने में लगा रहता हूँ. छोड़ते ही नहीं देर तक. आप लेने आते हैं तब पता चलता है कि शाम हो गयी है, सैर को जाना है.’ साधुरामजी ने मुस्कुराते हुए कहा.
‘लेकिन आप तो अपने फ्लेट से निकलते ही नहीं और नहीं किसी को आपके यहाँ आते-जाते देखा है, तब ‘कविता-कार्यशाला’ की बात कुछ समझ में नहीं आई!’ मैंने जिज्ञासा व्यक्त की.
‘ये नई चीज है. ओन लाइन कविता कार्यशाला है. वाट्स एप समूह पर चलती है. कविता पर बात होती है, रचना प्रक्रिया से लेकर साहित्य के सरोकारों तक बात होती है यहाँ. इसी में लगा रहता हूँ. तुम भी इस के सदस्य बन जाओ.. मैं एडमिन को तुम्हारा नंबर भेजता हूँ.’ साधुरामजी ने उत्साह से कहा.
‘नहीं-नहीं!  साधुरामजी, मैं तो वैसे ही मस्त हूँ. अखबार और किताबें ही बहुत हैं मेरे लिए. मुझसे यह सब नहीं होगा.’ अपनी अरुचि दर्शाई तो उन्होंने मेरे पिछड़ेपन पर हिकारत से मुंह बिचकाया और बोले- ‘अरे भैया जरा जमाने के साथ चलो..ऐसे तो वहीं के वहीं रह जाओगे..देखो देश ‘डिजिटल इंडिया’ बनने की राह पर चल पडा है और तुम अभी तक पुरानी पीढी के मोबाइल को कान से लगाए बैठे हो. स्मार्ट बनों और स्मार्ट फोन और टेबलेट के रास्ते अपना विकास करो..अपने और देश के सपने पूरे करो..इसी रास्ते से होकर खुशहाली आयेगी..हम विकसित देश की पंक्ति में आ खड़े होंगे !’
‘क्या होगा डिजिटल हो जाने से ? यह सब जुमले बाजी है बस और कुछ नहीं.’ मैंने कहा तो वे चिढ गए.
‘हर अच्छी चीज का विरोध करने की तुमको आदत हो गयी है. जब हमने सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेजा था तब भी तुमने विरोध किया था.अब वही देखो कितनी मदद कर रहा है हमारी. हजार चैनल हैं हमारे घर में. मौसम की जानकारी है. सबको लाभ मिल रहा है.’ साधुरामजी खबरिया चैनल पर आये पीएम के उद्बोधन को दोहराने लगे.
‘हाँ, मैं मानता हूँ मोबाइल क्रान्ति से परिवर्तन आया है, डिजिटल होने से एक छोटे से मोबाइल में पूरा भारत सिमट जाएगा..सरकारी तंत्र आपके इशारों पर काम करने लगेगा...  लेकिन प्रश्न तो करना ही पड़ेंगे साधुरामजी.’ मैंने कहा.
‘करिए ना प्रश्न कौन मना कर रहा है. यह एक ऐसी बात है जिससे चुटकियों में आपकी कठिनाइयां दूर हो जायेगी. अस्पताल में आपको लाइन में नहीं लगना होगा, डॉक्टर आपकी बीमारी की दवाई घर बैठे लिख भेजेगा. किसान को खेती की सारी जानकारियाँ खेत खलिहान में ही उपलब्ध हो जायेगी..बीज खाद और तकनीक की जानकारी मिल जायेगी..बहुत सी सुविधाएं मिलेंगी इससे...!’ साधुरामजी टीवी बहस के किसी प्रवक्ता की तरह जोश में बोल रहे थे.
‘साधुरामजी, डिजिटल हो जाने से समय पर बारिश होगी इसकी कोई गारंटी नहीं मिल जाती. मोबाइल लगाने से डॉक्टर अस्पताल में फोन उठा लेगा और गाँव में दवाइयाँ उपलब्ध रहेंगी ही, मुझे विश्वास नहीं हो रहा.’ मैंने आशंका व्यक्त की.
‘भरोसा करना सीखो भाई ! दुनिया हम पर भरोसा कर रही है तुम भी करो ज़रा.’ उन्होंने आश्वस्त करना चाहा.
मैं दुनिया के साथ हो गया. पूरे भरोसे के साथ घर लौटकर बत्ती का स्विच दबाया, बिजली गुल थी. शिकायत दर्ज करने के लिए फोन उठाया..वह शवासन में लीन था . मोबाइल में देखा..सिग्नल शून्य में विलीन हो गए थे. ब्राडबेंड मेरे यहाँ नहीं था.  उम्मीद है साधुरामजी लिंक की मंथर गति से जूझते हुए दुनिया को अपने ड्राइंग रूम में लाने में सफल हो गए होंगे.

ब्रजेश कानूनगो
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