Sunday, August 17, 2014

इस गणराज्य में (कविता संग्रह) : जीवन में बसती हैं कविताएँ

समीक्षा
इस गणराज्य में (कविता संग्रह)  

जीवन में बसती हैं कविताएँ
सुरेश उपाध्याय


‘इस गणराज्य में’ अभी तक व्यंग्य लेखक के रूप में अपनी पहचान रखने वाले श्री ब्रजेश कानूनगो का पहला कविता संग्रह है, जो दखल प्रकाशन,दिल्ली से इस साल (2014) आया है। संग्रह की अधिकाँश कविताएँ पढते हुए समकालीन कविता के मूल प्रवाह में रहते हुए हमारे समय से मुठभेड होती है। संग्रह पढते हुए लगता है कि ब्रजेश का कवि उनके व्यंग्यकार से थोडा-सा आगे निकलता दिखाई देता है। वे कवि के रूप में कहीं उन्नीस नही लगते।

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्रतिबद्ध विचारधारा का दर्शन उसी पृष्ठभूमि के कारण है, जिसके कारण उनके अपने रचनाकार का भी विकास हुआ है। अखबारों में सम्पादक के नाम कई वर्षों तक पत्र और जनरुचि के कॉलमों में लगातार लिखते हुए ब्रजेश की भाषा ऐसी भाषा बन जाती है जो आम पाठक तक बहुत सहजता से पहुंचती है। बच्चों के लिए कहानियाँ और गीत लेखन के अभ्यास के कारण उनकी कविताओं को सहृदय पाठकों के मन तक पहुंच जाने में कोई खास दिक्कत नही होती। व्यंग्य लेखन का लम्बा अनुभव उनकी कविताओं में भी तंज और कटाक्ष करता नजर आता है। बैंक कर्मियों और तंग बस्ती के बच्चों तथा साहित्य और समाज के क्षेत्रों में एक प्रतिबद्ध एक्टिविस्ट की तरह काम करते रहने से उनकी कविताओं में मनुष्य के प्रति प्रगतिशील विचारधारा का अंतरधारा की तरह समावेश दिखाई देता है।

ब्रजेश की कविताओं का फलक काफी व्यापक है, अपने घर-आँगन से लेकर वैश्विक तत्व व दृश्य और तमाम चिंताओं तक वह फैला हुआ है। पत्थर की घट्टी, पुरानी लोहे की आलमारी, मेरा मुहल्ला, रेडियो की स्मृति आदि कविताओं के माध्यम से वे हमारी परम्परा और अतीत की मधुर स्मृतियों की सैर करवाते हैं वहीं मानवीय अंतर्सम्बन्धों की महत्ता को भी रेखांकित करते हैं।

गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह

कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें

न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश
आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही

स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली
कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू 

(रेडियो की स्मृति)

इस गणराज्य में आजादी,नक्शे में केलिफोर्निया खोजता पिता,मनीप्लांट की छाया,क्विज, छुप जाओ कजरी,प्लास्टिक के पेड, राष्ट्रीय शोक,ग्लोबल प्रोडक्ट जैसी कविताओं के माध्यम से आर्थिक भूमंडलीकरण और उससे उपजी बाजारवाद व उपभोक्तावादी नीतियों की जटिलताओं, समाज और पर्यावरण पर पडने वाले विपरीत प्रभाव पर व्यंग्यात्मक लेकिन सजग काव्य टिप्पणियाँ की गई हैं।
कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

वे सुझा रहे हैं कि क्या  होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ
( इस गणराज्य में आजादी)


कैसे कहूँ कि घर अपना है, बिल्लियों का रोना,जिप्सी आदि कविताओं में कीट पतंगों, छिपकलियों, तितली ,चिडिया, कुत्ते, बिल्ली आदि पशु-पक्षियों को महत्व देते हुए इको सिस्टम का महत्व भी कवि रेखांकित करता है।

जिस घर में रहता हूं
कैसे कहूं कि अपना है

चीटियां कीट पतंगे और
छिपकलियां भी रहती हैं
यहां बड़े मजों से

उधर कोने में कुछ चूहों ने
बनाया है अपना बसेरा
ट्यूब लाइट की ओट में
पल रहा है चिड़ियों का परिवार

आंगन में खिले फूलों पर
मंडराती तितलियां और भौंरे
गुनगुनाते हुए चले आते हैं
घर के अंदर तक
( कैसे कहूँ कि घर अपना है)

कुछ कविताओं में करुणा,दया, ममता जैसे मानवीय मूल्यों की खूबसूरत अभिव्यक्ति हुई है। अस्पताल की खिडकी से,भरी बरसात में बेवजह मुस्कुराती लडकी,बच्चे का चित्र, बंटी की मम्मी मायके जा रही है,व्रत करती स्त्री, मदर टेरेसा आदि कविताएँ इसी श्रेणी की हैं।
रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग के जरिये समाज की असमानता और वर्ग विभाजन को देखा जा सकता है। सम्प्रभु वर्ग किस तरह जीवन से और उसकी सच्चाइयों से बेखर बना रहना चाहता है बहुत प्रभावी रूप से इस कविता में अभिव्यक्त हुआ है।

दिखाई नही दे रही है उन्हें
नीले आकाश में उडते पक्षियों की कतार
कच्चे रास्ते पर दौडती बैलगाडी
खेतों की हरी चादर और नदी में नहाते बच्चे
पेड की छाया में सुस्ताते मजदूर
बारिश के बाद की धूप, दूर तक फैला इन्द्रधनुष
और गोधूलि में घुलता हुआ सूरज

गहरे परदों से छनकर पहुँच रही है उन तक
उजली सुबह,सुनहरी दोपहर और गुलाबी शाम

जीवन के आसपास दीवारें खडी करने के बाद
पुस्तकों में खोज रहे हैं वे
जीवन।
(रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग) 

बचपन में लौटने के लिए, मजे के साथ, आदि कविताएँ दृश्य की बेहतरी के लिए कवि की छोटी-छोटी सुन्दर आकांक्षाएँ हैं, जिसका वह मजा लेना चाहता है।

यह बहुत संतोष की बात है कि तमाम विकृतियों, विद्रूपताओं और विषमताओं के बीच ब्रजेश की काव्य दृष्टि में बेहतरी की उम्मीद और विश्वास की सकारात्मक चमक स्पष्ट नजर आती है। अंत में भूकम्प के बाद कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए-

कविता ही है जो मलबे पर खिलाती है फूल
बिछुड गए बच्चों के चेहरों पर लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नई बस्ती की हवाओं में
सिकते हुए अन्न की खुशबू

अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करती
पुस्तकों में नही
जीवन में बसती हैं कविताएँ।

 (पुस्तक- इस गणराज्य में,  कवि-ब्रजेश कानूनगो,  मूल्य- रु.100/, प्रकाशक- दखल प्रकाशन,104, नवनीति सोसायटी,प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन,पटपडगंज, दिल्ली-110092)
समीक्षक- सुरेश उपाध्याय 





Tuesday, August 12, 2014

बचपन की बरसात

बचपन की बरसात
ब्रजेश कानूनगो

जब हम छोटे थे मौसम आने पर अक्सर बारिश लगातार सप्ताह-पखवाडे चलती रहती थी। कई-कई दिनों तक सूरज के दीदार नही हो पाते थे। लम्बे इंतजार के बाद धूप छिटकने के बाद क्षेत्र के अखबारों का पहले पृष्ठ पर ही शीर्षक बन जाता था कि एक पखवाडे बाद हुए सूर्य देवता के दर्शन!’  कोई तीस-पैंतीस बरस पहले ऐसी हेड लाइन आम हुआ करती थीं अखबारों में।

पर्यावरण का संतुलन अब इस तरह गडबडा गया है कि नए बच्चों को तो शायद याद ही नही है कि कभी लम्बे समय तक बादल छाए भी रहे होंगे। उन्होने खंड वर्षा को ही देखा है। पिछले वर्ष को ही लें तो भले ही एक साथ झमाझम बरसते हुए वर्षा ने औसत से अधिक का आंकडा पर कर लिया था लेकिन वर्ष के बारह महिनों में से नौ-दस महिने में टुकडे-टुकडे पानी हर महीने बरसा ही बरसा था।

बरसात के आते ही मन जैसे भीगा-भीगा सा हो जाता है। ऐसे में मुझे अपने कच्चे-कच्चे बचपन और बरसात के दिन बहुत तीव्रता से याद आने लगते हैं। बिल्कुल अभी अभी की बात लगती है जब तेज बरसात के बाद  हमारे मुहल्ले की गली से पानी ऐसे बहता था जैसे कोई छोटी-मोटी नदी बह रही हो। उस नदी के बहने का हम बहुत बेसब्री इंतजार किया करते थे। उसका बडा दिलचस्प कारण भी हुआ करता था। हमारी गली के ठीक आगे चौराहा था और उसके आगे पहाडी का ढलान। चौराहे पर अपनी बैलगाडिय़ों से गाँव से आकर किसान ककडियों और भुट्टों की दुकान लगाते थे। अचानक जब तेज बरसात होती और पहाडी का पानी बाजार में उतरता, किसानों के ककडी-भुट्टे गली में बहने लगते। कोशिश के बाद भी कई भुट्टों-ककडियों  को बचाने में वे नाकाम ही होते थे। मुहल्ले के बच्चों के लिए नदी बन गई गली जैसे भुट्टों और ककडियों की सौगात लेकर आती। हम सब अपने जोश और आनन्द की बंसी बजाते भुट्टों-ककडियों के शिकार में जुट जाते थे।

हमारी गली के एक ओर कायस्थों के घर थे और सामनेवाली पट्टी में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे। दोनो पट्टियों के बच्चे बहती गली का भरपूर मजा लिया करते थे। सामनेवाले इस्माइल भाई  की अम्मा जिन्हे हम आपा कहा करते थे ऐसी ही बहती नदी से गुजर कर पतंग बनाना छोडकर उस रात हमारे घर आईं थीं। मेरी चाची को तेज दर्द हो रहा था, पूरे नौ माह चल रहे थे। जैसे तैसे मेरी माँ और आपा उन्हे जच्चाखाने ले गए थे। जब तक चाची अस्पताल रहीं, आपा भरी बरसात में चाची और नवजात की खिदमत में जुटीं रहीं। हम बच्चे उनकी बकरियों और पतंगों को बरसात की बौछारों से बचाते रहे। जब वे नन्हे चचेरे भाई को गोद में उठाए जाफर भाई के तांगे से घर लौटी तब बरसात तो उस वक्त थम चुकी थी लेकिन पानी की कुछ बूँदों और नमी ने जैसे आपा और हम सब की आँखों में डेरा ही डाल लिया था।  

लम्बी लम्बी चलनेवाली बारिश की तरह लम्बी ही चलती थी कानडकर बुआ की कथा। दत्तमन्दिर में पूरे चौमासा में कुछ न कुछ चला ही करता था। पन्द्रह दिन तक कानडकर बुआ रोज सबेरे कथा सुनाते थे। संगीत मय कथा-कथन और प्रवचन के बाद अंत में देश प्रेम के गीत और कीर्तन का सामूहिक गान भी हुआ करता था। स्कूल की छुट्टी होते ही बारिश में भीगते-भागते हम भी दत्त मन्दिर में पहुँच जाया करते थे। कीर्तन और देश-प्रेम गान में हमे बहुत मजा आता था। कभी-कभी जल्दी पहुँच जाते तो बुआ को कथा सुनाते भी देख लेते। वे इतने भावुक होकर अभिनय के साथ बोलते थे कि न सिर्फ उनकी बल्कि श्रोताओं,श्रद्धालुओं की आँखों से भी आँसुओं की लडी लग जाती थी। प्रंगानुसार उनकी प्रस्तुति होती थी। बाहर बारिश होती थी और भीतर बुआ संवेदनाओं की बारिश करवा दिया करते थे। सब कुछ भीग भीग जाता था। हमारा लालच तो वस्तुत: आखिर में वितरित किया जानेवाला प्रसाद होता था। अद्भुत स्वादवाले उस विशेष प्रसाद को गोपाल काळाकहते थे। जुवार की धानी को दही में मथ कर वह बनाया जाता था,जिसमें नमक,हरी मिर्च, अदरख व हरे धनिए का स्वाद समाहित होता था। दोना भर कर मिलने वाले इस प्रसाद के जायके का स्वाद आज भी जबान पर कायम है।

पत्नी बरसात होते ही भले ही अलग-अलग तरह की पकौडियाँ परोसती रहती है लेकिन मेरा मन उस दौरान स्मृतियों की झडी के बीच बचपन के उस गोपाल काळा की ख्वाहिश लिए लगातार अन्दर से भीगता रहता है।    

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इन्दौर-452018



Saturday, June 28, 2014

सर्वव्यापी है ‘व्यापम’

सर्वव्यापी है ‘व्यापम’
ब्रजेश कानूनगो

हमेशा से कहा जाता है रहा है कि हमारे यहाँ कि ‘कण-कण में भगवान’ बसा होता है। भगवान सूक्ष्म रूप धर कर अणु-परमाणु प्रवेश के जरिए जल,थल, वायु सभी में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं। उनकी विराटता तभी दिखाई पडती है जब वे स्वयं उसका प्रदर्शन करते हैं। महाभारत के मैदान में जब अर्जुन को इस दर्शन का लाभ मिला, तो संसार को गीता का महान दर्शन मिला था।  

अब ऐसा कठिन समय आ गया है जब भगवान अपने कणों और परमाणुओं के निवास में कुछ तत्वों की घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे हैं। एक संघर्ष सा छिडा हुआ है। आदर्श जीवन मूल्यों और सदाचार की सम्पदा को बचाए रखना बहुत कठिन हो गया है। ऐसा नही है कि शत्रु ने आज ही सिर उठाना शुरू किया है, लेकिन अब उसने समाज की परम्परागत अच्छाइयों पर हमला बोलने के लिए अपना भी विराट रूप दिखाना शुरू कर दिया है। व्यापम का यह विराट रूप स्वार्थपूर्ति और कमाई का नया दर्शन लेकर आ गया है।

छोटे-छोटे व्यापम तो हमेशा से होते रहे हैं परंतु व्यापम की आज की भव्यता चमत्कृत करती है। व्यवस्था की नस नस में व्यापम व्याप्त हो गया लगता है। यह एक दिन में नही हो गया है। उसने पूरी तैयारी की है, पर्याप्त समय लिया है। यह धारणा बैठाना कोई आसान काम नही है कि व्यापम का होना ही विश्वास का होना है।  जहाँ व्यापम होगा वहाँ काम भी होगा। लोगों को शनै-शनै विश्वास दिला दिया गया कि काम कराना है तो खुद को भी व्यापम होना पडेगा। बगैर व्यापम हुए अपने कल्याण की कामना व्यर्थ है।

स्थिति यह है कि व्यवस्था के कण-कण में और जीवन के हर क्षेत्र में व्यापम अपने पैर मजबूती से जमा चुका है। व्यापम के विरोध में, उससे मुक्ति के लिए जितने आन्दोलन हुए, शायद उनकी नियति इतिहास हो जाने की ही रही है। व्यापम से मुक्ति की बजाए अक्सर लोगों ने इसके खिलाफ खडे होने और संघर्ष करने वाले लोगों से ही अपने को मुक्त करने को प्राथमिकता दी।  

व्यापम इतनी खूबसूरती और आकर्षक तरीके से प्रवेश करता है कि लोग मुग्ध हुए बिना नही रहते।  व्यापम तरक्की की गारंटी दिलाता दिखाई देता है।  संचार, सवास्थ्य, शिक्षा, खनन, नियुक्तियाँ, खरीद, कौनसा ऐसा क्षेत्र होगा, जहाँ व्यापम मौजूद नही है। बिना व्यापम की मदद के कोई काम सम्भव नही है। व्यापम से छुटकारे के लिए आप भले ही कितनी ही सरकारें बदलते रहें, नीतियों की कितनी ही तलवारें इस दानव के हजार सिरों पर चलाई जाती रहें, इसका वध करना बहुत मुश्किल है। निश्चित ही रावण की तरह व्यापम का भी कोई कमजोर हिस्सा जरूर होगा, जिस पर निशाना साध कर तीर चलाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए हमें इस लाभकारी ‘व्यवस्था पंगु मशीन’ के विरुद्ध लडने की इच्छाशक्ति भी तो होनी चाहिए। भला कौन उस डाली को काटेगा जिस पर मीठे फल लगते हों।

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड,इन्दौर-452018  

  

Monday, June 23, 2014

शकर का शोर

व्यंग्य
शकर का शोर
ब्रजेश कानूनगो

जैसे कोई अफसर बोतल खुलते ही खुलने लगता है, जैसे कोई मिनिस्टर कडकनाथ के बाद अपनी कडकता भूलकर ढीला पडने लगता है, जैसे कोई प्रेयसी बादल घिरते ही प्रियतम की याद में बेचैन होने लगती है वैसे ही साधुरामजी में मिठाई देखकर मिठास घुलने लगती है। मीठा उनकी कमजोरी है। लेकिन अब वह जमाना नही रहा कि मेहमान के आगमन पर मोतीचूर के लड्डू या गुलाब जामुन की महक अपने ड्राइंग रूम में फैलाई जा सके। साधुरामजी के पधारने पर अब उनके सत्कार में सिवाय चाय की चोट खाने के अब कोई चारा भी तो नही रह गया है। उनके आते ही मैने बिटिया को आज का अमृत लाने का आदेश दिया और उनसे मुखातिब हुआ- ‘कहिए कैसी चल रही है आपकी नई सरकार? सुना है इनके और उनके फैसलों में कोई अंतर नही दिखाई दे रहा।’

‘हाँ, यह तो है! न उनके पास कोई चमत्कारी छडी थी और न ही ये भी किसी पीसी सरकार के वंशज हैं कि जादू चला के महंगाई के दानव को कबूतर में बदल सकें।’ साधुरामजी ने पीडा व्यक्त की।
तभी चाय बनकर आ गई। चुस्की लेते ही प्रश्न भरी नजरों से मुझे घूरने लगे। प्याली के साथ उनकी यह मुद्रा खबरिया चैनलों के किसी ‘तीखी या सीधी बात’ जैसे कार्यक्रम के शातिर एंकर की तरह दिखाई दे रही थी। मैने भी चाय का स्वाद लिया तो पाया कि जैसे चाय में शकर थी ही नही। मैने पत्नी को पुकारा तो उन्होने बेटी को भेज दिया।
‘बेटे ,चाय में शकर  नही डाली क्या?’ मैने पूछा।
‘डाली तो है पापा, मगर रोज से कम। मम्मी कहती है अब ऐसी ही कम शकर वाली चाय पीना पडेगी।’ कह कर वह भीतर चली गई।
‘ओ-हाँ ,याद आया, साधुरामजी वह क्या है कि अब शकर हमारी औकात से दूर होती जा रही है,हमने सोंचा खुद ही इसके खर्च पर लगाम लगा लें। सरकार का रुख कुछ ठीक नही दिखाई देता।’ मैने संकोचभरी हकलाहट के साथ कहा।

साधुरामजी अपने मुख को थोडा विकृत ज्यामितीय रूप देते हुए बोले- ‘लगता है राजनीति में फिर कुछ न कुछ घटेगा, मँहगाई की मार वैसी ही बनी हुई है जैसी नई सरकार के आने के पहले थी.. और अब यह शकर के दामों का किस्सा.. शकर के कारण लोगों के दिलों में बडती कडुवाहट का मूल्य कहीं सरकार को न चुकाना पड जाएँ, देश की राजनीति पर इसका गहरा असर पड सकता है।’ साधुरामजी के भीतर के नेता को चिंता सताने लगी।
‘लेकिन हमें राजनीति से क्या? हमे तो शकर मिलनी चाहिए सस्ते दामों पर।’ मैने कहा तो उनका सत्ता समर्थित राजतीतिज्ञ जाग गया- ‘क्या शकर का इस्तेमाल इतना जरूरी है तुम्हारे लिए?’ ऐसा लगा जैसे मधुमक्खी गुलाब पर अपनी मिठास की आवश्यकता के लिए प्रश्नचिन्ह  लगा रही हो।
‘हाँ,मिठास भी आवश्यक है मनुष्य के लिए, और अगर आप सोचते हैं कि खाने में हम मिठास को त्याग दें तो चलिए आप हमें अपनी व्यवस्था से, तंत्र से ‘मीठा-व्यवहार’ दिलवाइए। हम शकर का उपयोग छोड देंगे। जब हर तरफ कडुवाहट फैली हुई है तो वहाँ शकर के चन्द दाने कौनसी मिठास घोल देंगे जीवन में। मैं तो कहता हूँ, आप घरेलू बाजार में शकर उपलब्ध ही मत कराओ बल्कि समूची शकर को निर्यात करके कुछ हेलिकाप्टर और तोपें खरीद लो, वक्त बेवक्त आपका और विपक्ष का समय संसद में कट जाया करेगा बहसों में।’ रक्तचाप ग्रसित मेरा चेहरा तमतमा उठा।

‘तुम तो ख्वामखाह नाराज हो गए, मेरा मतलब यह थोडे था। ये तो तात्कालिक स्थितियाँ हैं, कभी प्याज तो कभी तेल, कभी दूध तो कभी शकर, महंगी-सस्ती होती रहती हैं। जरा जीना सीखो। ये छोटे-छोटे अभावों से क्यों प्रभावित होते हो। तुम तो एक महान देश के समझदार और राष्ट्रवादी नागरिक हो। जरा उन अमर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करो, जिन्होने भारी अभावों और कष्टों के बीच देश को आजाद कराया....और आज भी तुम एक नई आजादी के दौर से गुजर रहे हो...।’ साधुरामजी का राजनीतिज्ञ शब्दों में निरंतर शकर घोल रहा था...और हम तुम्हे क्या नही दे रहे.. थोडा-सा इंतजार तो करो..इतना अधीर भी मत बनों..अच्छी चीजें आसानी से नही मिल जाती..यकीन रखो अच्छे दिनों के लिए थोडा-बहुत सेक्रिफाइज और त्याग तो हरेक को करना पडेगा.. तुम भी क्या यह तुच्छ-सा शकर का रोना लेकर बैठ गए।’ 

‘मैं आपकी मीठी-मीठी बातों में आने वाला नही हूँ, साधुरामजी। सरकार को चाहिए कि वह शकर को सस्ते दामों में हमेशा उपलब्ध कराए,बस।’ मैने सीधे-सीधे कहा तो वे क्रोधित हो गए-‘तुम भी अजीब आदमी हो,एक मामूली सी चीज के लिए अड रहे हो, माँगना ही है तो महंगाई भत्ते की किश्त माँगो, जो दिया जा सके वह माँगो।’ इतना कहकर साधुरामजी आँखे लाल किए पैर पटकते लौट गए। मैं सोचने लगा- वास्तव में एक तरफ शकर का उपयोग बन्द करके मधुमेह और मोटापे के डर से निर्भय होकर दूसरी तरफ महंगाई भत्ते की अतिरिक्त किश्त झटक लेने में क्या समझदारी नही होगी?

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इन्दौर-452018




        

Sunday, June 8, 2014

हमारा फुटबॉल दर्द

हमारा फुटबॉल दर्द
ब्रजेश कानूनगो

ग्रंथों मे उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण अपने बचपन में गेन्द खेला करते थे। वह कुछ और नही फुटबॉल ही था। गोविन्द अपने मित्रों के साथ फुटबॉल खेलते थे और यही खेलते हुए एक जबर्दस्त किक खाकर जब गेन्द जमुनाजी में जा गिरी थी तब वह चर्चित पौराणिक प्रसंग उपस्थित हुआ था, जिसमें शेषनाग के सिर पर उस जमाने का होनहार फुटबॉल खिलाडी गोविन्दा ने सवार होकर इतिहास रच दिया था।
हॉकी का विश्व गुरु होने के वर्षों पूर्व भारत दुनिया का फुटबाल गुरु भी हुआ करता था। कालांतर में जिस तरह भारतीय हॉकी का हश्र हुआ उसी तरह फुटबाल में यह परम्परा उससे भी काफी पहले हम निभा चुके थे। प्रतियोगिता में जीत के लिए हमारी ‘पहले आप’ की विनम्र नीति के चलते हम फुटबॉल के मैदान में इतना पिछड गए कि हमारा फुट्बॉल समय की जमुना में सदा के लिए समा गया।
बहरहाल हुआ यह कि फुटबॉल भारत का होकर भी बाहर का हो गया, बेगाना हो गया। ब्राजील,इटली, अर्जेंटीना और स्पेन जैसे देश फुटबॉल खेलते हैं और भारत उन्हे खेलते हुए देखता है। फुटबॉल के जनक होकर भी आज हम फुटबॉल खेलते नही सिर्फ देखते हैं। हमारी नियति ही हो गई है कि हम दूसरों को जीतते हुए देखें। स्पर्धाएँ होती रहतीं हैं और जमुना के देश के लोग फुटबॉल की तरह आँखें फैलाए नजारा देखते रह जाते हैं।

बेशक मैं भी उन्ही में से एक हूँ। जब-जब मैं फुटबॉल देखता हूँ,उसमें डूब जाता हूँ। जब आदमी डूब जाता है तो वह सपने देखने लगता है। मुझे महसूस होने लगता है कि मेरा स्वरूप गोलाकार हो गया है और मैं एक फुटबॉल में तब्दील हो गया हूँ। पूरी व्यवस्था जैसे फ़ुटबॉल का मैदान बन गई है। कोई किक मारकर कहीं भेज देता है तो कोई किसी ओर दिशा मे लतिया देता है जहाँ पहले से ही कोई किक प्रहार के लिए तैयार खडी होती है। मछली पानी से प्यार करती है क्योंकि वह पानी में जीती है, मैं फुटबॉल से प्यार करता हूँ क्योंकि यही मेरा जीवन है।

फुटबॉल और मुझमे काफी समानता है। मुझे यकीन है अपना काम निकलवाने के लिए इधर से उधर धक्के खाते हुए जो अनुभूति मुझे होती है, वही शायद फुटबॉल को भी मैदान के एक छोर से दूसरे छोर के बीच लुडकते हुए होती होगी। मेरा और फुटबॉल का दुख-दर्द, सुख–चैन एक सा है। वह बोल नही सकता, इसलिए उसकी कोई नही सुनता, मैं बोल सकता हूँ फिर भी मेरी व्यथा अनसुनी रह जाती है। वह कुछ नही कर सकता, मैं भी कुछ नही कर सकता। हमारी नियति ही है कि ठोकरें खाते रहें।
बहरहाल, फुटबॉल तो चलता रहेगा लेकिन खेल के आनन्द की यह अनुभूति शायद हमारे भीतर कष्टों से जूझने की असीम शक्ति पैदा करने में सफल हो सके।
ब्रजेश कानूनगो

503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इन्दौर-18 

Saturday, May 24, 2014

जीवन के स्वीकार की कविताएँ

‘इस गणराज्य में’  
जीवन के स्वीकार की कविताएँ 


ओम वर्मा 

हाल ही में व्यंग्यकार व स्तंभकार ब्रजेश कानूनगो का कविता संग्रह 'इस गणराज्य में' दखल प्रकाशन दिल्ली से आया है।  कविता से गद्य की और जानेवाले अनेक रचनाकार देखे जा सकते हैं। लेकिन जब व्यंग्य लिखते-लिखते कोई कविताएँ लिखने लगता है तो यह एक निश्चित ही ध्यान देनेवाली घटना कही जा सकती है।  एक व्यंग्य सग्रह 'पुनः पधारें'  के बाद कविता संग्रह 'इस गणराज्य में' की कविताएँ पढ़कर समकालीन कविता के मूल प्रवाह में रहकर लिखने वाले कवि की रचनाओं के माध्यम से इस समय के मूल प्रश्नों से मुठभेड़ की जा सकती है।  जो प्रासंगिक भी है। इन कविताओं का वस्तुतत्व वही है जो हमारे आस-पास ,बहुत निकट घट रहा है। ये कविताएँ एक और जहाँ कवि की दृष्टि और विचारधारा को स्पष्ट करती हैं,वहीं उनकी अनुभूतियों,चिंताओं के साथ कवि के कोमल मन और संबंधों की ऊष्मा से भी हमें रूबरू करातीं हैं। इन कविताओं में यथार्थ के धरातल पर घटित घटनाओं पर कवि की विशिष्ठ और कहीं कहीं व्यंग्यात्मक दृष्टि  हमारे समय से साक्षात्कार कराती हैं।   इन कविताओं को पढ़कर महसूस होता है कि कवि का रचनात्मक फलक बहुत व्यापक है। उसका एक छोर हमारे नगरीय मध्यवर्ग में है तो दूसरा छोर उस जातीय/ग्रामीण/जनपदीय जीवन में है ,जहां  जीवन की सुन्दरता के अनेक स्रोत आज भी प्रवाहित हैं।  कवि मनुष्य के सौंदर्य की नहीं बल्कि मनुष्यता के सौंदर्य की तलाश करता है। शायद इसीलिए उनकी कजरी सौंदर्य प्रतियोगिता में शामिल नहीं है।  'छुप जाओ कजरी/सावधान कजरी/ तुम्हे सुंदरी घोषित करने का षडयंत्र प्रारम्भ हो गया है/छुप जाओ कहीं ऐसी जगह/जहां सौदागरों की दृष्टि न पहुंचे।'  
कवि की दृष्टि अपने  बहुत निकट घट रही छोटी-छोटी गतिविधियों पर भी सदैव बनी रहती है यहां तक कि मनुष्यों के मन पर भी ,जिसमें पिता, पत्नी, पड़ोसी और  पालतू प्राणी ;जिप्सी' के साथ-साथ  व्रत करती स्त्री का मन भी  शामिल होता  है जो संबंधों के धरती-आकाश को एक करता  है।  मनुष्य का मन बहुत विचित्र है।  वह अज्ञानता और अंध विश्वावासों  के कुटिल मार्गों से भी सम्बन्ध भावना की सरल मंजिलों तक पहुँचाने की कोशिश करता है।  खुशियों का इन्द्रधनुष, टेलीफोन की घंटी ,नक़्शे में कैलिफोर्निया खोजता पिता,बंटी की मम्मी आदि कविताएँ इसी सम्बन्ध भाव के विस्तृत आयाम हैं।  'पड़ोसी के घर में बज रही है घंटी/ शायद बेटे का फोन होगा/ पड़ोसी के घर पर पड़ा है आज ताला /और बंद घर में गूँज रही है बेटे की आवाज'। एक सशक्त रचना है। 
'इस गणराज्य में'  की कविताएँ जीवन के स्वीकार की कविताएँ है। कवि ने निषेध और नकार से हटकर जीवन के चित्रों को उकेरकर दुनिया के कागज़ पर जीवन की तस्वीर बनाने की कोशिश की है।  'बच्चे का चित्र' में देखिए- 'निकल पड़े हैं कुछ लोग कुदाली फावड़ा लिए/ निकाल लाएंगे अब शायद सूरज को बाहर/ पहाड़ियों को खोदते हुए/ चढ़ जाएंगे खजूर के पेड़ के ऊपर/और बिखेर देंगे धरती पर मिठास के दाने/ नन्हा बच्चा बना रहा है चित्र/ जैसे बनती है जीवन की तस्वीर/दुनिया के कागज़ पर।  
रेल गाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग,मनी प्लांट की छाया,इस गणराज्य में आजादी,ग्लोबल प्रोडक्ट गांधी मार्ग, और सुबह जैसी कविताएँ कवि की विचारधारा को स्पष्ट करती हैं। धूल और धुएं के परदे में सुनाई पड़ती है झाड़ूओं की आवाज जैसी पंक्तियों में कवि  'सुबह' को अलग दृष्टि से देखता है,जहां महापुरुषों की प्रतिमाओं के नीचे जमी धूल  भी बुहारनेवालों को परखता है और उनके गुनगुनाने के साथ चिड़ियों की चहचहाट सुनता है।  
अस्पताल की खिड़की से कवि का मन जहां मंदिर,दीपस्तंभ,घंटे और नगाड़ों की परम्परागत दुनिया में पहुंचता है तो वहीं रोड रोलर के इंजीन के शोर के बीच बबूल की छाया में बंधी झोली में सोये बच्चे की नींद में भी उतरता है।  कवितायेँ कवि के सामाजिक सरोकारों और कलात्मक दृष्टि से परिचित कराती हैं।  कुल मिलाकर यह संग्रह कविताओं में ब्रजेश कानूनगो से सकारात्मक उम्मीद जगाता है।  
(पुस्तक- इस गणराज्य में,  कवि-ब्रजेश कानूनगो,  मूल्य- रु.100/, प्रकाशक- दखल प्रकाशन,104, नवनीति सोसायटी,प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन,पटपडगंज, दिल्ली-110092) 



Tuesday, May 13, 2014

नसतरंग के स्वर

नसतरंग के स्वर
ब्रजेश कानूनगो  
कुछ समय पहले एक लेख पढ़ने मे आया था जिसमें बरेली से बाँसुरी की बिदाई पर चिन्ता प्रकट की गई थी। लेख पढ़कर मुझे एक और दुर्लभ वाद्य 'नसतरंगऔर संभवतः उसके आखिरी 'उस्ताद वादक श्री बशीर खाँ की याद हो आई। जिस प्रकार बाँसुरी के निर्माण और स्वरों से न सिर्फ बरेली बल्कि समूचा संगीत संसार दूर होता जा रहा है उसी तरह नसतरंग के साथ ऐसा काफी अर्सा पहले घटित हो चुका है।

नसतरंग एक ऐसा वाद्ययंत्र रहा है जिसे बजाने के लिए वादक अपने गले की विशिष्ठ नसों पर इसे रखकर धमनियों में कंपन करता हैयही कंपन वाद्य में आवाज पैदा करता है। देवास मध्य प्रदेश के  उस्ताद बशीर खाँ एक ऐसे फनकार थे जो नसतरंग के  अस्तित्व  के  लिए पूरी उम्र जूझते रहे और अंततः दमे का शिकार होकर संगीत संसार से कूच कर गए। स्व़ बशीर खाँ के पुत्र के अलावा अजमेर के लोक कलाकार मनीराम पथरोड के चंद प्रदर्शनों को छोड़ दें तो अब न बशीर खाँ हैं और  नसतरंग का दुर्लभ वाद्य और न ही उसकी शास्त्रीय संगीत आधारित स्वर लहरियां कहीं सुनाई देती हैं।

जलतरंगनसतरंग या बाँसुरी जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों और उनकी ध्वनियों का भारतीय संगीत से लोप होते जाना क्या  हम गंभीरता से ले पाए हैंक्या  बशीर खाँ जैसे वादकों के जाने के  बाद भारतीय संगीत संसार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि नसतरंग जैसे दुर्लभ वाद्ययंत्र का संरक्षण तथा इसके  वादन की कष्टसाध्य साधना करने वाले कलाकारों को प्रोत्साहन के समुचित प्रयास कि जाएँ एवं नई पीढी के साधकों की तलाश और उन्हें शिक्षित करने की व्यवस्था के उपाय किए ाना चाहिए.

अपने जीवन काल में बशीर खाँ निरंतर इस प्रयास में थे कि उनसे यह कला कोई ग्रहण कर ले लेकिन वे सफल नहीं हो सके । उगते सूरज को पूजने की हमारी परंपरा ने बशीर खाँ की बूढ़ी नसों का महत्व नहीं समझा। नसतरंग की कष्टसाध्य एवं लंबी साधना की बजाए संगीत शिष्यों को लोकप्रियता का शार्टकट अधिक भाता रहा।वैसे भी इसके वादन में कलाकार की धमनियों और नसों के प्रभावित होने का खतरा भी बना रहता है।

कर्नाटक के श्री रामअप्पा के शिष्य उस्ताद बशीर खाँ ने अपनी कला का प्रदर्शन पंडित नेहरू से लेकर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मंडलोई के समक्ष तथाअविभाजित भारत  कलकत्तालाहोर तथा इंदौर की अनेक संगीत सभाओं में तथा स्वतंत्र भारत के  अनेक संगीत जलसों में करके  प्रशंसा पाई थी।उनकी नसतरंग से भैरवीअहीर भैरव,तोडी सारंग,यमन,भीम पलासी जैसी कई स्वर लहरियां पूत्र्ट पड़ती थीं। लेखक सौभाग्यशाली रहा है  कि उनके अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम  जो पूर्व 'इन्दौर बैंककी देवास शाखा में वर्ष 1984 में हुआ था में उपस्थित था। बाद के वषों में वे अपनी बीमारी का इलाज अनेक सामाजिक संस्थाओं तथा व्यक्तियों की मदद से करवाते रहे।
उम्मीद की जाना चाहिए कि संगीत-संसार का कोई महर्षी नसतरंग की सुधि लेगा।  काश्मीर के लोकवाद्य संतूर के कल्याण के  लिए तो पं शिवकुमार शर्मा मिल गए हैं। नसतरंग तक पहुँचना किसी पंडित या उस्ताद के  लिए उसके  वादन की तरह ही शायद दुःसाध्य हो लेकिन संकल्प से क्या  नही हो सकता ।
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इन्दौर-452018