Monday, July 9, 2012

मजे के साथ








मजे के साथ
ब्रजेश कानूनगो

बहुत इच्छा रहती है
जब चाहे छुटि्‌टयाँ मनाने की
मजे के साथ

कांपते हैं जब सूरज के हाथ पाँव
कुहरे को भेदता हुआ
ठंडी हवा के साथ आता है मजा

धूप के साथ गिरता है मजा पीठ पर सर्दियों में

निकलता हूँ मजे के साथ
शुरू होता है जब बूंदों का संगीत
पहुँच जाता हूँ वहाँ
खत्म हो जाते हैं जहाँ कांकरीट के पहाड़
गुलांट खाने के लिए बिछी होती है
हरी मखमली जाजम

फैंकता हूँ जब साधकर पत्थर
कत्तल के साथ उछलता है मजा सतह पर
कूद पड़ती है किनारे की बत्तखें घबराकर
एक के बाद एक पानी में

तैरने लगता है मजा तालाब में
कमल पंखों को गुदगुदाते हुए


बैठ जाता है उड़कर
बिजूके के माथे पर यकायक
हरी हो जाती हैं मजे की आँखें
पकी हुई बालियों की गंध
समा जाती है उसकी देह में


बरसती आग के बीच
आम की छाया में पड़ी खटिया पर
मेरे साथ सुनता है
बड़े मामा से कारनामें


उड़ जाता है न जाने कहाँ
गुलाबी अनंत में चिड़ियों के साथ
छुप जाता है किसी बछड़े की तरह
घर लौटते रेवड़ में

उड़ती हुई धूल के बीच
दिखाई देती है मजे की झलक

बहुत इच्छा रहती है
मजे के साथ छुट्‌टी बिताने की
की-बोर्ड और कम्प्यूटर पर ताला लगाकर
बहुत इच्छा रहती है मजा करने की।

ब्रजेश कानूनगो                                                                                                                                                                         503 ,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-18  


Saturday, June 30, 2012

सोयाबीन की फसल


कविता
सोयाबीन की फसल
ब्रजेश कानूनगो

धरती के आँगन में
उम्मीद के कण बिखेरने के बाद
बादलों की तरह आती जाती है चिन्ताएँ

बंगाल की खाडी से उठा चक्रवात
छत्तीसगढ को ही भिगोकर लौट न जाए कहीं
उडीसा में बना कम दबाव
हवा न हो जाये मालवा तक आते आते

अरब सागर की मेहरबानी से
फट पडे आसमान
बरस जाए प्रलय का पानी
सपनो की नई बस्ती पर
तो क्या होगा सोयाबीन की फसल का

नष्ट न करदे आतंकी इल्लियाँ सोयाबीन के परिवार को

सूरज की चमक और आकाश के अंधेरो के साथ
बदलते है हरिया किसान के चेहरे के रंग

बडा ही जीवट वाला है
मौसम के हर मिजाज मे
पिता की तरह पालता है अपनी फसल को

सोयाबीन नही
खुशियों की फसल उगाता है
धरती का  बेटा  ।

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड,इन्दौर-18 

Saturday, June 16, 2012

नक्शे में कैलिफोर्निया खोजता पिता


नक्शे में कैलिफोर्निया खोजता पिता

चालीस डिग्री अक्षांश और
एक सौ दस डिग्री देशांतर के बीच में
यहाँ इधर,थोडा हटकर,बस यहीं
यही है कैलिफोर्निया
ज्यादा दूर तो दिखाई नही देता नक्षे में!

उडने के छत्तीस घंटे बाद
फोन किया था बेटी ने
बहुत दूर है कैलिफोर्निया

ईंधन लेने के लिए
यहाँ उतरा होगा विमान
बेटी ने बिताए होंगे
पाँच घंटे अकेले

यहाँ से बदलना पडता है विमान
एक बैग भर ही तो था पास में
सामान तो शिफ्ट कर ही देते होंगे एयरवेज वाले

जरा देखें तो
कैसी है जलवायु कैलिफोर्निया की
बारिश होती है यहाँ कितनी
कितना रहता है सर्दियों में
न्यूनतम तापमान

समुद्री हवाएँ कब बहती हैं इस ओर
तपती तो होगी गर्मियों में धरती
मौसम होते भी हैं या नही
कैलिफोर्निया में

कौनसी फसलें बोते हैं कैलिफोर्निया के किसान
मिल ही जाता होगा बाजार में
गेहूँ और चावल

‘जितने कष्ट कंटकों में है...’
दसवीं कक्षा में पढी कविता की अनुगूंज में
घुल रही है बेटी की आवाज
नक्षे की रेखाओं से होता हुआ
पहुँच रहा है पिता का हाथ
बेटी के माथे तक !

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, June 6, 2012

बरसात में याद


बरसात में याद
ब्रजेश कानूनगो

बरसात और याद का बड़ा गहरा संबंध रहा है। बरसात आतीहै तो बहुत सी भूली हुई बातें याद आने लगती हैं।प्रथम दृष्टया लगता है कि बरसात और याद के बीच बड़ा कोमल सा रोमांटिक संबंध है ,पर ऐसा नही है। बरसात को लेकर हम गहरे पूर्वाग्रहों के शिकार हो गए हैं जो हमारे कवियों तथा साहित्यकारों ने हम पर थोप दिए हैं।

अनेक गीत तथा कहानियाँ बरसात से शुरू होकर बरसात पर समाप्त होती रहीं हैं। विरहणी नायिका बरसात के आते ही इतनी प्रेममय हो जाती है और यादों में इस कदर जलने लगती है कि बकौल पंडित हरिशंकर परसाई,मोहल्ले का तापमान बढ़ जाता है,नायिका मन की तड़प और प्यार की गरमाहट से
इतनी भर उठती है कि रोटियाँ सिर्फ बेलना भर रह जातीं है,लोग चूल्हा जलाना भूलकर विरहणी की देह पर रोटियाँ सेकने लगते हैं।
बरसात और याद के इस मार्मिक रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने में हमारे फिल्मी गीतकारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है।हम बरसात का संबंध प्रिय और प्रियतम तक ही समेटकर रह जाते हैं लेकिन भावनाओं के इस दायरे से बाहर निकलकर व्यावहारिकता के धरातल पर बरसात का जायजा लिया जाए तो हम पाते हैं कि बरसात एक रोमांचकारी मौसम भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा झटका है जिससे हमें बहुत सी भूली हुई बातें याद आना प्रारंभ हो जाती है। छतें टपकती हैं तो हमें ठेकेदार की याद आने लगती है,उपचार के बावजूद छतों का टपकना नहीं रुकता।
बहते पानी की विशेषता होती है कि प्रवाह के मार्ग में बाधा आनेपर या तो वह फैल जाता है अथवा यदि वह छत पर हुआ तो टपक पड़ता है। फैलते हुए पानी को तो कलेकटर  महोदय अपने पूरे दल-बल के  साथ समेटने में  जुट जाते हैं किंतु टपकते पानी से तो स्वयं को ही जूझना होता है। लगातार टपकने के बाद मौसम खुलते ही लोग बाजार की ओर दौड़ पड़ते हैं तथा दुआ-सलाम के बाद पहला प्रश्न होता है-टपक रही है क्या ? हाँ, टपक रही है। क्या आपकी भी छत टपक रही है ? जी हाँ,वाटर प्रुफ सीमेंट ही लेने जा रहा हूँ।

लोग छतें बनवाते वक्त उतना उतना परेशान नहीं होते जितना उनके  टपकने पर होते हैं।कोई सीमेंट का राला कर रहा है तो कोई गुड़ और गोबर की पुताई करने लगता है।जितनी टपकती छतें ,उतने ही सलाहाकार तथा उतने ही इलाज,पर छत को टपकना होता है और वह टपकती ही है,यह एक ला इलाज मर्ज है जिसका कोई विश्वसनीय उपचार नहीं होता। हमारे मित्र ने तो परेशान होकर अंततः अपने कमरे की साइज का रेग्जीन खरीद लिया है। अब वे पलंग के  ऊपर तथा छत के  नीचे तंबू तानते हैं और चैन की नींद सोते हैं।पानी की टपकती बूंदें जब प्लास्टिक की अंतर छत पर गिर कर  टप-टप की मधुर लोरियाँ सुनाती हैं उन्हे टप से गहरी नींद आजाती है।

बहरहाल, छतें भले ही टपकती रहें,बरसात का होना जीवन का होना है। बरसात का आना हमारी स्मृति के लिए बेहद जरूरी है।बरसात एक ऐसा झटका है जो भटके  हुए लोगों को राह पर ले आता है।वह चाहे साधारण नागरिक हो या प्रशासन अथवा सरकार , इसका लगते रहना पूरी समाज व्यवस्था के  लिए लाभकारी होता है।
काश !बरसात के कारणों पर कुल्हाड़ी चलाने वालों को यह बात समझ में आ सके ।

ब्रजेश कानूनगो
503 गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड, इंदौर-18

Wednesday, April 18, 2012

निराश आत्मा का संकट


निराश आत्मा का संकट
ब्रजेश कानूनगो 
मन भले ही मैला हो लेकिन आत्मा निर्मल होनी चाहिए । कहा भी गया है आत्मा सो परमात्मा याने आत्मा ही है जो परमात्मा तक पहुंचने का साधन बनती है। आत्मा की शुद्धता ईश्वर की प्राप्ति की अनिवार्य शर्त है। पहुंचे हुए बाबा लोग आत्मा की पवित्रता पर इसीलिए जोर देते आए हैं। आत्मा की पवित्रता का महत्व बताते बताते उनके भीतर ऐसी शक्तियों का उदय होता है  कि वे परमात्मा की अनुकृति से दिखाई देने लगते हैं। वे कृपा करते हैं अपने भक्तों पर। उनका कहा शक्तियाँ सुनती हैं और कष्टों पर बरस पडती हैं। उनकी आत्मा आज के गंगाजल की तरह पवित्र होती है।
आत्मा तो अनशन की हिमायती होती है लेकिन मन सुख सुविधाएँ चाहता है। मन कहता है, अच्छा पहनें, अच्छा खाएं, अच्छा  धन्दा चले, बंगला हो, अपनी खुद की कार हो । मन भ्रष्ट हो जाने को सदैव लालायित रहता है लेकिन आत्मा तो परमात्मा के प्रेम में बेसुध न जाने किस संसार मे विचरती रहती है। समझ ही नही आता कि क्या सही है क्या गलत है , बावली आत्मा मन की मुरादों को पूरा करने के चक्कर में परमात्मा मे लीन होकर विष का प्याला भी अमृत समझकर पी जाती है।परमात्मा की राह मे आत्मा क्या कुछ नही करती।  निर्मल आत्मा कभी कुत्ते को बिस्कुट खिलाने लगती है तो कभी महंगा मोबाइल फोन खरीद कर अपनी परेशानी को डिलिट करने की कोशिश करती है।
समस्या की जड ही ये कम्बख्त परेशानियाँ हैं। न ये परेशानियाँ होती न किसी समागम मे जाने की आवश्यकता रहती। कोई हमारी सुनता ही नही है। न सरकार को हमारी कोई चिंता है, न समाज हमारे कष्टों को समझता है। जाएँ तो जाएँ कहाँ। जो लूट रहा है वह भी परेशान है और जिसे लूटा जा रहा है वह भी परेशान है। क्या करें ये परेशान लोग। परमात्मा की कृपा चाहिए। आत्मा इतनी शुद्ध हो नही रही कि उन तक पहुंचा जा सके। एक यही रास्ता दिखाई देता है निराश आत्मा को कि परमात्मा की प्रतिकृति(?) के पास अपनी अर्जी लगाई जाए। 
अब यदि समस्याओं के निदान मे समोसे को हरी चटनी के साथ खाने के परामर्श से पीडित को लाभ पहुंचता है तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है। कृपा हो, चाहे जैसे हो लेकिन कृपा होनी ही चाहिए।  ईश्वर की सब पर समान कृपा होती है। पता नही मन्दिर मे एक रुपया चढाने वाले छीतू और चान्दी का छप्पर भेंट करने वाले सेठ छतरमल का निवेदन ईश्वर के पास पहुंचता है या नही लेकिन एक बडी राशि बाबाजी के पास जमाकर मुश्किलों से निजात पाई जा सकती है। अपने अकूत साम्राज्य के तथाकथित भगवान(बाबा) का मन मैला हो सकता है लेकिन आत्मा की पवित्रता बडी निर्मल होती है।पवित्र आत्मा निराश आत्माओं के दुख दर्द दूर करती रहतीं हैं।
हर तरफ से निराश व्यक्ति आखिर कहीं तो दो बून्द आशा की तलाश मे जाएगा। यही तो निराश आत्मा का असली संकट है। अब यह अलग बात है कि निराशा के इस विशाल समुद्र मे कुछ चतुर व्यापारी मोतियों का दोहन करने मे सफल हो रहे हैं।
ब्रजेश कानूनगो 503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क ,कनाडिया रोड, इन्दौर-18 

Saturday, March 31, 2012

गर्व कीजिए मूर्खता पर


गर्व कीजिए मूर्खता पर
ब्रजेश कानूनगो
एक अप्रैल याने मूर्ख दिवस । एक दूसरे को तथाकथित मूर्ख बनाने की गलत परम्परा। मूर्खता या मूर्ख को परिभाषित करना भी बडा कठिन कार्य है । मूर्खता के प्रतीक के रूप में अक्सर गधे जैसे सीधे-सादे प्राणी को निशाना बनाया जाता रहा है। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या वाकई गधा या गधापन मूर्ख और मूर्खता का प्रतिनिधित्व सही रूप मे करते हैं। अगर गधे के बिना बोले बोझा ढोने के गुण से मूर्खता परिलक्षित होती है तो फिर वे सब भी मूर्ख हुए जिन्होने किसी न किसी तरह का भार अपने कन्धों पर उठाए रखा है। जो यह मानते हैं कि वे ही हैं जिनके कन्धों पर सवार होकर देश आगे बढ रहा है, वे भी गदर्भ राज की बिरादरी मे सम्मिलित किए जाने के योग्य हो जाते हैं। यह भार जो कन्धों पर बेताल की तरह सवार होकर जीवन की अनेक अच्छी-बुरी कहानियाँ सुनाते हुए हमसे प्रश्न पूछता रहता है ,वैचारिक हो सकता है, प्रशासनिक हो सकता है, राजनैतिक हो सकता है, व्यवस्थागत हो सकता है। अर्थात वे सब जिनके ऊपर किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी है वे सब मूर्ख हुए। न सिर्फ गधे के साथ अपितु हरे व्यक्ति के साथ मूर्खता के सन्दर्भ मे यह ज्यादती ही है। अगर समय असमय गधे के रैंकने की प्रवृति गधे को मूर्ख कहे जाने का कारण है तो यह प्रवृत्ति तो आदमजात मे भी पाई जाती है,
अंतर सिर्फ इतना है कि यहाँ इसे भाषण,प्रतिक्रिया,गुस्सा,दहाडना,हसंना,गुनगुनाना आदि कहा जाता है।  कुछ लोग उल्लू जैसे चतुर और अन्धेरे मे भी देखने की क्षमता रखने वाले तेज नजरोंवाले पक्षी को मूर्ख का प्रतिरूप मनते हैं,जबकि लक्ष्मी का वाहन ही उल्लू को कहा गया है। इसका मतलब वे सब लोग जो नियमों और कानून के सुराखों को अपनी तेज नजरों से तलाश करके लक्ष्मीपति बने हैं ,क्या मूर्ख कहे जाने योग्य हैं?
दरअसल मूर्खता का रिश्ता किसी पशु या पक्षी की बजाय समकालीनता से ज्यादा करीब का होता है। जिस काम को किए जाने के लिए समय का आग्रह हो और आप उसके लिए प्रतिकूल कार्य करें तो वह मूर्खता कही जाएगी। मसलन परीक्षाएँ चल रही हों, नकलपट्टी जोर शोर से जारी हो,लेकिन आप बहती गंगा मे हाथ नही धोना चाहते और स्वज्ञान से प्रश्नपत्र हल करते हैं। जरा से सेवा शुल्क के भुगतान से आप को मन चाही पोस्टिंग मिल सकती है लेकिन आप जमाने के दस्तूर से दूर रहते हैं। चुनावों मे आपको लगता है कि आप ने सही प्रतिनिधि को चुना है लेकिन बाद मे महसूस करते हैं कि वह आपकी एक मूर्खता ही थी , वोट का ठप्पा किसी भी निशान पर पडे ,आपके द्वारा भेजा गया व्यक्ति संसद में जो करता है, वह किसी से छुपा नही रह गया है।
सच तो यह है कि समझदारी एक ऐसी तलवार है जो मूर्खता की पारदर्शी म्यान मे रखी होती है।जिस डाली पर महाकवि कुल्हाडी चलाकर मूर्ख कहलाए, उसी डाली के फूल महाकवि की विद्वता पर न्यौछावर हो गए। मूर्ख और मूर्खता के महत्व को कभी भी कम नही आँका जाना चाहिए ।
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड,इन्दौर-18                                                  

Monday, March 19, 2012

सुन्दर ही सेक्सी है


व्यंग्य
सुन्दर ही सेक्सी है
ब्रजेश कानूनगो

भाषा का भी ठीक उसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ है जैसे भ्रष्टाचार का हुआ है. जब पहली बार किसी ने स्वार्थसिद्धी के लिए रिश्वत ली और दी होगी तब उसे  कुछ भी कहा गया होगा 'भ्रष्टाचार ' तो शायद नहीं ही कहा गया होगा. किसी अधिकृत काम को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पैसे लेकर काम कर दिए जाने को बुराई के रूप में  'दलाली' कहा जाता था लेकिन अब दलाली ही अधिकृत हो गया है. कमीशन कहें या फ्रेंचाइसी क्या फर्क पडता है.  है तो वह दलाली ही. असल में भाषा अभिव्यक्ति को दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम होती है और शब्द वे संकेत होते हैं जो उस क्रिया या अनुभूति को प्रमाणित करते हैं. सूरज को पृथ्वी कहने से वह आग उगलना बंद नहीं कर देगा. पहली बार किसी ने पृथ्वी को पृथ्वी तथा सूरज को सूरज कहा होगा. यदि सूरज को सबसे पहले  'जहाज'  कह दिया होता तो जहाज से ही हमारे पास रोशनी और धूप पहुँचती.

सुबह का नजारा देखिए. भोर की कैसी सुन्दर बेला होती है. इधर पक्षियों का कलरव शुरू हुआ कि  पूरब से सूरज की किरणें हल्का हल्का प्रकाश बिखेरने लगती हैं .पहाडियों के पीछे से धीरे धीरे गुलाबी गोला ऊपर उठने लगता है. मन में अनोखा  अहसास या अनुभूति पैदा होती है तो मुँह से निकल पडता है..सुन्दर..अतिसुन्दर ..! सुन्दर शब्द तो मात्र उस अनुभूति को पहचान दिलानेवाला संकेत है. यह प्रमाणीकरण यदि 'नमकीन' शब्द से प्रारम्भ में कर दिया  गया होता तो हम सुन्दर या अतिसुन्दर की अनुभूति के लिए 'नमकीन' शब्द का संकेत चुनते और आज सुबह-सुबह का नजारा देखकर हमारे मुँह से निकलता...अहा..! क्या नमकीन नजारा है.

भाषा विकास की इस अवधारणा को हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष के एक वक्तव्य से भी बल मिला है. उन्होंने कहा कि यदि कोई सौन्दर्य प्रेमी व्यक्ति लडकियों को 'सेक्सी' कहे तो उसे सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए. क्योंकि 'सेक्सी' का अर्थ होता है  ' ऐसी सुंदरता जो आकर्षित करे '.  महिला आयोग के बयान पर बेवजह बहस चल पडी है .वस्तुत: उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा था.   सुन्दर कहो या सेक्सी कहो, क्या फर्क पडता है .जो सुन्दर है वह सुन्दर है. जो सेक्सी है वह सेक्सी है. जो सुन्दर है वह अपनी सुंदरता पर गर्व करे,जो सेक्सी है वह अपनी सेक्सियत पर गर्व करे.  अरे भाई इस कहने सुनने से भी कोई फर्क पडता है भला.  पता नहीं भंवरी देवी को कोई सुन्दर कहता था या कुछ और कहता था लेकिन  जो होना था सो हुआ. बेटमा में या भोपाल में या लसूडिया में या हर कहीं मनुष्य की मादा प्रजाति के साथ  जो हो रहा है उसमे इस 'सेक्सी' संकेत या शब्द का क्या दोष या भूमिका रही है, ज़रा बताएं ?  भैया पहले उन उपभोक्तावादी बाजारू संकेतों को पहचानने की कोशिश करो जो अपनी तहजीब और मूल्यों को प्रदूषित करके  हमारे  चरित्र और आचरण को सेक्सी अथवा नमकीन (जो कहना चाहें) बनाने का षड़यंत्र रच रहे हैं.

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर-18