Sunday, February 5, 2012

फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता है जहाँ कोई,समझ लेना वो डगर अदम के गाँव जाती है


फटे कपड़ों से तन ढांके गुजरता है जहाँ कोई,समझ लेना वो डगर अदम के गाँव जाती है
ब्रजेश कानूनगो
जन कवि अदम गोंडवी को याद करना एक मायने में उस आवाज को याद करने जैसा है जिसके शब्दों में देश के गरीबों ,मजदूरों ,किसानों और आम लोगों की पीड़ा और उनके कष्टों की गूँज सुनाई देती थी.
वे ऐसे कवि और शायर थे जिनके चले जाने के बाद उस हिन्दुस्तानी जबान का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ऐसा साहित्यकार चला गया है जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े मुश्किलजदा आदमी के संघर्षों की भाषा रही है. कविता की इस भाषा में तो जैसे उनके बाद बहुत बड़ा शून्य सा महसूस होता है.
न महलों की बुलंदी से न लफ़्ज़ों के नगीने से
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

कि अब मर्क़ज़ में रोटी है,मुहब्बत हाशिये पर है
उतर आई ग़ज़ल इस दौर में कोठी के ज़ीने से

अदब का आइना उन तंग गलियों से गुज़रता है
जहाँ बचपन सिसकता है लिपट कर माँ के सीने से

बहारे-बेकिराँ में ता-क़यामत का सफ़र ठहरा
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफ़ीने से

अदीबों की नई पीढ़ी से मेरी ये गुज़ारिश है
सँजो कर रक्खें ‘धूमिल’ की विरासत को क़रीने से.

जिंदगी और मौत के बीच अनेक मुश्किलों का सामना और संघर्ष करते हुए हमारे दौर का यह महान जनकवि गत १८ दिसंबर २०११ को अपनी गजलों और कविताओं की पूंजी हमारे लिए छोडकर चला गया. अदम के जाने के बाद उस अलहदा काव्य परम्परा पर भी प्रश्न चिन्ह लगता दिखाई देता है जो दुष्यंत कुमार  के बाद रामनाथसिंह याने अदम गोंडवी ने आगे बढ़ाई थी.
काजू भुने प्लेट में,व्हिस्की गिलास में ,राम राज उतरा है आज विधायक निवास में .
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, यह बात कह रहा हूँ मै होशो हवास में.
अदमजी की समूची शख्शियत अनकी कविता के नायक के जीवन की तरह थी. सादा सा कुर्ता ,मटमैली सी धोती और गले में मफलर ,उन्हें देखकर लगता जैसे कोई किसान सीधे अपने खेतों से चला आ रहा हो. जैसे भीतर वैसे ही बाहर,एक दम रफ टफ से. वे असली धरती पुत्र थे ,लेकिन उनकी आवाज देश की आवाज बन गई थी.शायरी की गूँज देश की सीमा लांघकर पूरी दुनिया के कानों तक अपनी तरंगे पहुंचाने में कामयाब हो रही थीं. तमाम शोहरत के बावजूद वे इसका कोई निजी लाभ लेने का मानस कभी नहीं बना पाए. अपने गाँव ,अपनी मिट्टी ,अपने लोगों के मोह से सदा वे बंधे रहे,यही कारण रहा कि कभी वे समझौ़ता परस्ती के शिकार नहीं हुए. शायद यही बात थी जो उन्हें ताकत देती थी और वे बेबाक,दोटूक और सीधे सीधे अपनी खरी-खरी शायरी में अभिव्यक्त कर पाते थे.
वो जिसके हाथ में छाले हैं,पैरों में बिवाई है,उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है.
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का ,उधर लाखों में गांधीजी के चेलों की कमाई है.
 वे इस जमाने के कबीर थे. फक्कड मिजाज अदम अपनी कविताओं में भी खुरदरे दिखाई देते थे.कबीर की तरह वे अनपढ भले ही नहीं थे लेकिन उनकी प्राइमरी तक की  पढाई को आज के संदर्भों में पढ़े-लिखे के पैमाने पर भला कैसे फिट बैठाया जासकता है. उनकी शायरी में आज की स्थितियों और चालाकियों पर जो टिप्पणियाँ दिखाई देतीं हैं उनसे उनका व्यापक वैचारिक द्रष्टिकोण और विचारधारा स्पष्ट होती है. मतभेदों और साम्प्रदायिक विचारों को छोडकर अदम गरीबी के खिलाफ मिलजुलकर लड़ाई लड़ने  का आह्वान करते हैं.
हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये .
अदम गोंडवी की कविता में आलोचकों को कविता के व्यंजना धर्म का अनुशासन दिखाई नहीं दिया लेकिन  उन्होने  इस बात की कभी चिंता नहीं पाली. उनकी अभिधा ,व्यंजना पर भारी पडती है.सीधे-सीधे उनकी शायरी धधकते अंगारों की तरह आक्रमण करती है. किसी तरह के  मुगालते  या संकोच का वे अवसर नहीं देते बल्कि जो कुछ कहना होता है सीधे  शब्दों में सुना देते हैं. एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखेंगे ,
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे.
महज तनख्वाह में निबटेंगे ,क्या नखरे लुगाई के,
हजारों रास्ते हैं सिन्हा साहब की कमाई के
मिसेज सिन्हा के हाथों में जो बेमौसम खनकते हैं,
पिछली बाढ के तोहफे हैं ये कंगन कलाई के.
अंत में एक नजर ज़रा इस कविता पर भी डालें-

मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की
आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की ?
इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की
याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की

धीमी आंच पर विचारों का परिपाक तैयार करके  गरमागरम परोसने वाले इस कवि की शायरी का विद्रोही तेवर अब हमें दिखाई नहीं दे सकेगा. व्यवस्था फिलहाल भले ही थोड़ी राहत महसूस करे लेकिन कोई आश्चर्य नहीं  होगा जब अदम गोंडवी की कविता की गूँज  प्रतिरोध के नए सुरों का आधार बनकर कविता का कोई नया और सार्थक राग बन जाए.
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर-18








Tuesday, January 31, 2012

संवेदनहीनता की ठिठुरन


व्यंग्य
संवेदनहीनता की ठिठुरन
ब्रजेश कानूनगो

एक  झांकी ने उस शहर के चेहरे से ऐसा पानी उतारा कि हर संवेदनशील बाशिंदा चुल्लूभर पानी की तलाश में छुपता छुपाता शर्म से पानी पानी हुए जा रहा है. वैसे भी  पानी के मामले में वह  शहर दूसरे शहरों की ओर याचक दृष्टि से हमेशा से देखता रहा है. लेकिन इस देखा-देखी के बावजूद यह दिन भी देखना पडेगा, ऐसा तो कभी सोंचा ही नहीं था.
राष्ट्रीय महत्त्व के आयोजन जिनमे जिले के वरिष्ट अधिकारी,मंत्री और समाज के महत्वपूर्ण लोग मौजूद हों,तब कौन नहीं चाहेगा कि कुछ ऐसा किया जाए कि उन  सबकी निगाह में आ जाएँ और अपनी  झांकी जम जाए. झांकी जमाने की तमन्ना में कोई  झाँकीबाज गणतंत्र दिवस पर नगरनिगम की ऐसी झांकी जमाकर अंतर्ध्यान हो गए कि  अब जिले का सारा अमला हलकान हुए जा रहा है. हुआ यूं है कि बूँद-बूद पानी को तरसते देवास में गत गणतंत्र दिवस पर नगर निगम ने अपनी उपलब्धियों के प्रदर्शन की आकांक्षा से एक झाँकी बनाई .उस दिन लोगों को पर्याप्त पानी मिला या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन झाँकी में लगाए गए नल से पूरे जोश के साथ पानी की मोटी धारा बह रही थी. पानी का इस तरह दिखाई देना बहुत राहत का सन्देश दे रहा था,बल्कि यह और भी संतोषजनक तब हो गया जब लोगों ने एक छोटे से बच्चे को नंग-धडंग नल के नीचे स्नान का लुत्फ़ (?) उठाते देखा. बताते है उस दिन नगर का वातावरण शीतलहर के कारण बेहद  सुहावना हो गया था और कार्यक्रम में आनेवाले  वीआयपियों को सूट और कश्मीर-लद्दाख से लाई  गई शालों,पुलोवरों को धारण करने का अवसर भी मिल गया था. कुछ मेडमों ने तो इस अवसर पर झांकियों पर ध्यान देने की बजाए स्वेटरों और शालों की डिजाइन और उनकी गुणवत्ता पर चर्चा करके कार्यक्रम की बोझिलता से अपने को बचाए रखने में सफलता भी प्राप्त कर ली.
सब कुछ ठीक ही रहता यदि नल के नीचे नहाता बालक थोड़ी सी ठण्ड सहन कर लेता. ज़रा सी देर की तो बात थी यूं भी कहाँ वह गरम पानी से नहाता होगा. नहाता भी होगा या नहीं कौन जाने .अच्छे अच्छों  को पानी नहीं मिल रहा  शहर में, तो वह कौन सा राजा भोज रहा होगा. बहरहाल किसी को यह शानदार नजारा खल गया और उसने आपत्ति का दुशाला थरथराते नन्हे बदन पर डाल दिया.
बहुत पिछड़े  परिवार के मामूली सी कोठरी में रहनेवाले बालक सनी ने मासूमियत से बताया कि एक अंकल ने  झाँकी में नहाने से पहले उसे पांच रूपए दिए थे और एक समोसा भी खिलाया था. गरीबों के लिए सोंचने वाले बिरले ही मिलते हैं. अंकल को क्या पता था कि . गणतंत्र दिवस के अवसर पर किसी गरीब की मदद करना और जलसंकट से जूझते शहर में उसके लिए नहाने का इंतजाम करा देने पर इतना हो-हल्ला हो जाएगा.
यह भी एक संयोग ही है कि जहाँ हट्ठा-कट्ठा एक सनी (सनी देओल) पैसों के लिए अभिनय करते हुए हेडपंप उखाड फेंकता है वहीं  एक मासूम और कमजोर सनी को पैसे देकर अभिनय करने के लिए लालायित करा लिया जाता है.  यह अलग बात है कि बाद में वह कहता है कि झाँकी में नल के नीचे नहाते वक्त उसे 'भोत ठण्ड लग रही थी.' अब तो उसका बुखार भी उतर गया है,सर्दी खांसी भी ठीक हो गई है. लेकिन हमारे शहर का जो पानी उतर गया है उसका क्या होगा?  
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क ,कनाडिया रोड,इंदौर18  

Monday, January 30, 2012

घुलती पृथ्वी


लघुकथा
घुलती पृथ्वी
ब्रजेश कानूनगो


बहूमूल्य रत्नों के व्यापारी ने अपनी बिटिया के विवाह के उपलक्ष्य में भव्य आशीर्वाद समारोह का आयोजन किया था । ऐसा लग रहा था, रत्नों की सारी चमक पांडाल में उतर आई हो।

तथाकथित बडे लोग पांडाल  के अंदर अपने भरे हुए पेटों को और भरने की असफल कोशिश कर रहे थे। बाहर कुछ छोटे लोग भव्य समारोह के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।

इन बडे और छोटे लोगों से अलग बैठा छीतू यह समझ पाने में असमर्थ था कि बडे लोगों के  आयोजन पर ये छोटे लोग नारे क्यों  लगा रहे हैं। क्या  मिलेगा उन्हे ऐसा करके , क्यों  नहीं वे नारे लगाना छोडकर पांडाल के पीछे चले आते ? कम से कम आज तो उन्हें ऐसा लजीज खाना मिल जाएगा,जिसका स्वाद कई हफ़्तों तक जुबान पर बना रहेगा।

तभी एक व्यक्ति  पांडाल के  पिछवाडे आया और बाल्टी भर खाना वहाँ उँढेल गया । इससे पहले कि छीतू के पास बैठा कुत्ता भोजन पर झपटता उसने फैंके  गए भोजन से लड्‌डू उठाकर तुरंत मुँह में रख लिया।

छीतू को लगा जैसे उसनें लड्‌डू नहीं बल्कि पूरी पृथ्वी को अंपने मुँह में कैद  कर लिया हो और दुनिया भर की मिठास उसके  हलक से नीचे उतरती जा रही हो।

पांडाल के सामने  नारे बदस्तूर जारी थे। अंदर टेबलों पर पकवानों की नई प्लेटें सजाई जा रही थी। लेकिन छीतू के मुँह में कैद  पृथ्वी अब तक पूरी तरह घुल चुकी थी।

ब्रजेश कानूनगो
503 ,गोयल रिजेंसी ,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-18
मो.न.09893944294   

Wednesday, January 25, 2012

इस गणराज्य में आजादी

कविता
इस गणराज्य में आजादी 


एक

कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

वे सुझा रहे हैं कि क्या  होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ

दो
 
बर्गर और पिज्जा बेचने वाली
नईबहुराष्ट्रीय दुकान का विज्ञापन देखकर
उछल पडता है बच्चा
जैसे मिल गई आजादी
दुनिया भर के  भोजन को चबा डालने की

अभिव्यक्ति की आजादी का  मतलब है
दो वक्त की रोटी से मंहंगी कलम से
कर्ज के  दस्तावेज और पुरस्कार के चेकों पर
दस्तखतों का फिसलना

सबसे आगे रहने के  लिए
बाधाओं को छलांगते हुए दौड जाने की आजादी मिलती है
थकान और पसीने से बचानेवाले
बहुमूल्य जूतों के चयन के बाद

आजादी के लिए उपवास की बात
अब किताबों से हटा दी गर्ईं हैं
गर्व से ऊपर उठता है मस्तक
सनसनाते पेय के  हलक से उतरते ही

उत्साह और उमंग के  बाजारी जश्न में
बेडियों के  विस्तार को मिल गई है आजादी


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,
कनाडिया रोड,इंदौर-18 

Saturday, January 14, 2012

मेरा मुहल्ला


कविता  
मेरा मुहल्ला
ब्रजेश कानूनगो

कहाँ गया मेरा मुहल्ला
जो मै छोड़ गया था बीस बरस पहले यहीं कहीं

नहीं दिखाई दे रहा वह नुक्कड़ का हलवाई
रस से भरी मिठाइयाँ दूर दूर तक जाती थी जिसकी
चिढ़ती-झल्लाती जगत बुआजी
जिसके बरामदे में होली पर गंदगी फैंक आया करते थे हुड़दंगी
अंगूठा छाप टेलर मास्टर जिन्हे मैंने
चंद्रकांता संतति पढ़कर सुनाई थी रोज-रोज
अख्तरख़ान जिसे देखकर हम गली में छुप जाते थे इस डर से
कि कहीं वह हमारी किताबें न छीन ले

वह काला और मरियल सा नन्हा शायर
जो मधुर आवाज में गाया करता था फिल्मी गाने
क्रिकेट की गेंद जब्त कर लेने वाली कठोर महिला
जो पहले तो डांटती थी
फिर उढ़ेल देती थी स्नेह का पूरा समुद्र
न जाने कहाँ चले गए हैं सब

वह इमली का पेड़ जो दादी की कहानियों के प्रेत की तरह
हमारी पतंग को पकड़ लिया करता था अक्सर
वह टूटा पुराना ध्वस्त मकान भी दिखाई नही दे रहा
जिसकी सड़ी हुई लकड़ियाँ होली में जलाते रहने से
हमारा चंदा बच जाया करता था-सिनेमा देखने के लिए

शायद यही है मेरा मुहल्ला लेकिन
उग आया है एक बाजार हमारी गेंद पट्‌टी पर
होली के वृक्ष की स्थापना चिंता की बात हो गई है
टेलर की दुकान में खुल गई है एक नई दुकान
जो अंग्रेजी माध्यम में सिखा रही है त्यौहार मनाना

गर्म जलेबियों की खुशबू नही बिखरती अब नुक्कड पर
नई जमीन के नक्शे पर
सपने बेच रहा है हलवाई का बेटा

धराशायी मकान की भस्म पर खड़ी हो गई है ऊँची इमारत
जिसकी ओट में छिप गया है नीला कैनवास
पतंग के रंगों से बनते थे जिस पर स्मृतियों के अल्हड़ चित्र

वैसा ही हो गया है मेरा मुहल्ला
जैसे कोई कहे-कितना अलग है तुम्हारा छोटा बेटा ।


ब्रजेश कानूनगो                                                                                                                                                                         ५०३,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड,इंदौर-१८

Saturday, December 24, 2011

ग्लोबल प्रोडक्ट


कविता
ग्लोबल प्रोडक्ट
ब्रजेश कानूनगो


जाने कौन-सी तरंगे पहुँच रहीं हैं
और करती हैं एक्टिवेट उसे
निकलती रहती है लगातार
वॉइस आफ़ अमेरिका उसके मुख से

अपनी भाषा भी बोलता है कभी-कभी
लेकिन ऐसा लगता है जैसे
अभी-अभी आया कोई कोलम्बस
कोशिश कर रहा है बात करने की
हमारी  भाषा में

उसके बच्चे नहीं पहनते
कुर्ता,सलवार ,अचकन या चूडीदार
पहनावे से पता ही नहीं चलता
कि किस जलवायु का बाशिंदा है
डिजाइनर कपड़ों पर चिपकी
प्रसिद्ध मार्का की छोटी-सी कतरन
घोषित करती है कि वह
बाजार युग का ग्लोबल प्रोडक्ट है

भरा होता है उसका बटुआ
जादुई कार्डों की बहुमूल्य संपदा से
दुनिया खरीद लेने का विश्वास
चमकता है उसके चहरे पर

सरकारी करेंसी भी थोड़ी-बहुत होती है उसके पास
सत्कार,घूस और डोनेशन में
बड़ी सहूलियत रहती है इससे
और फिर देवालय के बाहर और भीतर
क्रेडिट कार्ड से पुण्य खरीदना
आसान नहीं हुआ है अभी 
  
बहुत पहले से छोड़ दिया है उसने
दकियानूसी पारंपरिक भोजन करना
फास्ट फ़ूड और बर्गर मिटाते है उसकी भूख
बहुराष्ट्रीय कंपनी के
प्रमाणित साफ्ट ड्रिंक से
बुझाता है अपनी प्यास को

बड़ा ही स्मार्ट है वह
जबानी याद है उसे सचिन के शतकों का आँकड़ा
और संवेदनशील इतना कि
शेयर मार्केट की तनिक-सी घट-बढ़ से
बढ़ जाती है उसके दिल की धडकन

यह बड़ा अच्छा है कि
कारखानों से निकाले गए मजदूरों का दुःख
नहीं करता उसे स्पंदित
जहर पीकर आत्म हत्या करनेवाले
किसानों की संख्या में व्यर्थ नहीं जाती उसकी मेमोरी
बाँध से प्रभावित विस्थापितों की पीड़ा
प्रभावित नहीं करती उसकी आत्मा को

विकास के इस महत्वपूर्ण समय में
और कई वर्जन आने हैं अभी
इस ग्लोबल प्रोडक्ट के .
 

ब्रजेश कानूनगो
503 ,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड ,इंदौर-18